“मेरे पास दो कैन पानी था जो पूरा खत्म हो चुका था। लेकिन फिर भी ट्रेन से उतरकर यात्री मेरे पास अपनी खाली बोतलें लेकर आ रहे थे… मैं उन्हें आगे संगठन की दूसरी महिलाओं की तरफ भेज रही थी, लेकिन साथ में ये भी सोच रही थी कि काश मेरे पास और भी पानी की कैन होती, तो मैं उन्हें खाली हाथ कभी न भेजती।
यह बात उदास मन से कहने वाली अनीता भारद्वाज हैं, जो यात्रियों की प्यास को खुद महसूस कर रही हैं और महिला संगठन के साथ हर वर्ष ब्यावरा रेलवे स्टेशन पर अपनी सेवाएं दे रही हैं।
लेकिन यह सिर्फ एक दिन की कहानी नहीं है, बल्कि हर रोज की हकीकत है, जो रेलवे सिस्टम की निष्क्रियता पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। ब्यावरा की रचना भार्गव और उनकी टीम पिछले 8 वर्षों से इस भीषण गर्मी में ट्रेन के मुसाफिरों को जल सेवा प्रदान कर रही है, और यह उनका नौवां वर्ष है जिसमें भी उनकी सेवा निरंतर जारी है।
गुना से देवास तक सब सूखा है

गुना से लेकर देवास तक के इस पूरे रूट पर किसी भी रेलवे स्टेशन पर पानी उपलब्ध नहीं होता, और न ही वॉटर कूलर चालू हालत में हैं। यदि कहीं लगे भी हैं तो वे सूखे पड़े हैं, उनमें ठंडा पानी नहीं आता। जब हम खुद भी ट्रेन में सफर करते हैं तो यही मुश्किलात हमें भी झेलनी पड़ती है। हर गरीब यात्री सफर में 20 रुपये की पानी की बोतल खरीदने में सक्षम नहीं है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे महिला संगठन ने ब्यावरा स्टेशन को इस सेवा के लिए चुना है। यह कहना है रचना भार्गव का जो अपना अनुभव साझा कर रही थीं।
इसी संगठन के साथ सेवा देने वाले श्रीनाथ गुप्ता हाल ही के दिनों में रेल के अपने सफर को याद करते हुए बताते हैं कि बीते दिनों मैं खुद इंदौर से सफर करते हुए ब्यावरा की ओर आ रहा था। इंदौर से पचोर तक मुझे कहीं भी रेलवे प्रशासन की ओर से ठंडे पानी की व्यवस्था नहीं मिली। शाजापुर स्टेशन पर जब पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया, तो वो खौलता हुआ गर्म पानी था, जो पीने लायक नहीं था। आज ब्यावरा रेलवे स्टेशन पर हम यात्रियों को ठंडे जल की सेवा दे रहे हैं, यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है।
शनिवार दोपहर का आँखों देखा हाल

शनिवार को हमारी GROUND REPORT की टीम ब्यावरा रेलवे स्टेशन पर मौजूद थी। हमने देखा कि दोपहर की चिलचिलाती धूप में ठंडे पानी की कैन से भरी एक मैजिक गाड़ी रेलवे स्टेशन पर आती है, और पानी उतारकर चली जाती है। कुछ ही देर बाद संगठन की महिलाएं और अन्य समाजसेवी लोग वहाँ पहुंचते हैं और प्लेटफॉर्म पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पानी की कैन, मग और चुंगी लेकर मुस्तैद खड़े हो जाते हैं।
यह नजारा पहली नजर में बड़ा ही अजीब लगता है, क्योंकि कागजी दावों में हमने हमेशा सुना है कि ट्रेनों के भीतर पीने के पानी की मुकम्मल व्यवस्था होती है और रेलवे बेहद सस्ते दाम में यात्रियों को ठंडा पानी उपलब्ध कराता है।
लेकिन जैसे ही पहली पैसेंजर ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर एक पर आकर रुकी, दावों के सारे महल ढह गए। ट्रेन में बैठे लोग दरवाजे और खिड़कियों से आधे बाहर लटके हुए थे, उनके हाथ में खाली बोतलें थीं जो वे हवा में लहरा रहे थे। वे हाथ किसी को बाय-बाय नहीं कर रहे थे, बल्कि बोगी के भीतर की उस भयंकर स्थिति को बयां कर रहे थे, जहां 44 डिग्री के इस टॉर्चर में भी पीने के लिए ठंडा पानी मौजूद नहीं था। वे खिड़कियां चीख-चीख कर पूछ रही थीं कि क्या बाहर कोई है, जो उनकी इस बेबसी की आवाज को सुन रहा हो?
अधिकारी का दावा: प्राइवेट लोग पानी भरकर दे ही देते हैं

जब इन बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर हमारी टीम ब्यावरा रेलवे स्टेशन के ऑफिस में मौजूद उप स्टेशन प्रबंधक सतीश चंद्र वर्मा के पास पहुंची, तो उनका तर्क अलग था। वर्मा ने कहा कि रेलवे स्टेशन पर IOW द्वारा पानी की टंकी रखी हुई है, उसी से सभी जगह पानी की सप्लाई होती है। रही बात प्राइवेट लोगों की, तो वे यात्रियों को ठंडा पानी पिलाने के लिए आ रहे हैं।
जब हमने उनसे तीखा सवाल किया कि ट्रेन सिर्फ दो मिनट रुकती है, ऐसे में हड़बड़ी में उतरने वाला यात्री हर जगह वॉटर कूलर कैसे तलाशेगा? और अगर ट्रेन छूट गई तो वो क्या करेगा? तो उप स्टेशन प्रबंधक ने बड़ी सहजता से अपनी जिम्मेदारी समाज पर डालते हुए कहा कि प्राइवेट लोग पानी भरकर दे देते हैं। कैंटीन के बगल में वॉटर कूलर लगा हुआ है, वहां से भी वे पानी ले सकते हैं। जब हमने स्टेशन पर आधिकारिक जल बंधुओं की नियुक्ति पर सवाल किया, तो उन्होंने साफ माना कि यहाँ कोई भी जल के लिए नियुक्त नहीं है।
रेलवे स्टेशन को मॉडिफाई करने और गर्मी में ठंडा जल जैसी मूलभूत सुविधाएं देने के सवाल पर वर्मा ने कहा कि अभी काम चल रहा है, पूरा नहीं हुआ है। हमारे यहाँ दो नंबर प्लेटफॉर्म पर अभी पानी की व्यवस्था नहीं है, वहां काम जारी है। प्लेटफॉर्म नंबर एक पर दो जगह वॉटर कूलर लगे हुए हैं। ट्रेन के अंदर पानी की बोतल वाले वेंडर होते ही हैं।
दो घंटे बाद ही खुल गई दावों की पोल

लेकिन रेलवे अधिकारी के इस ऑल इज़ वेल वाले बयान को लगभग दो घंटे बाद ही प्लेटफॉर्म नंबर एक पर आई ट्रेन के एक यात्री ने पूरी तरह खारिज कर दिया। यह यात्री कोई आम मुसाफिर नहीं, बल्कि खुद रेलवे में एक प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर के रूप में अपनी सेवाएं देते हैं।
लखनऊ से अहमदाबाद की लंबी यात्रा कर रहे इस यात्री ने कैमरे पर बताया कि ट्रेन के भीतर जो पानी की बोतल उपलब्ध कराई जा रही है, उसके बदले हमसे पूरे 20 रुपये वसूले जा रहे हैं, और वो पानी भी ठंडा नहीं होता। इस भीषण गर्मी में ट्रेन के अंदर कोई पूछने वाला नहीं है। उन्होंने ब्यावरा रेलवे स्टेशन पर पानी पिला रही महिलाओं और समाजसेविओं के जज्बे की तारीफ की और भरे गले से उनका आभार व्यक्त किया।
सरकारी दस्तावेज़ बनाम ऑन-ग्राउंड लूट
यात्री का यह आरोप केवल एक वेंडर की मनमानी नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर एक बड़े नीतिगत उल्लंघन की ओर इशारा करता है। रेलवे बोर्ड के आधिकारिक दस्तावेज कमर्शियल सर्कुलर संख्या 18 (2025) के अनुसार, किसी भी यात्री से पानी की बोतल के लिए 20 रुपये वसूलना नियमों के सख्त खिलाफ है। रेल मंत्रालय द्वारा 20 सितंबर 2025 को जारी इस सरकारी आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रेल नीर और अन्य ख्याल प्राप्त ब्रांडों की 1 लीटर वाली बोतल की कीमत घटाकर 14 रुपये और 500 मिलीलीटर की बोतल की कीमत 9 रुपये कर दी गई है।
यह संशोधित दरें 22 सितंबर 2025 से पूरे भारतीय रेलवे में प्रभावी हैं। ऐसे में ब्यावरा आने वाली ट्रेनों में मुसाफिरों से 20 रुपये की वसूली करना न सिर्फ यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाना है, बल्कि खुद रेलवे बोर्ड के इन सख्त निर्देशों का सीधा और खुला उल्लंघन है।
आर्थिक सच, संवैधानिक मूल्य और कड़े सवाल

दावों और हकीकत का यह अंतर केवल व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा आर्थिक सच भी है। यह महिला संगठन मुख्य रूप से केवल भीषण गर्मी के इन महीनों में यह सेवा देता है, क्योंकि मुसाफिरों को ठंडे जल की सबसे ज़्यादा ज़रूरत इसी मौसम में होती है। जन सहयोग के माध्यम से यह संगठन हर रोज़ लगभग 100 कैन ठंडा पानी यात्रियों में मुफ्त बांटता है, जिसका अनुमानित खर्च प्रतिदिन लगभग 2,000 रुपये आता है। यानी गर्मी के सीज़न में हर महीने करीब 60 हजार रुपये का यह आर्थिक बोझ ब्यावरा का समाज चंदा जुटाकर उठा रहा है, ताकि कोई मुसाफिर प्यासा न रहे।
यह बात सही है कि ब्यावरा रेलवे स्टेशन पर वॉटर कूलर लगे हैं, लेकिन उसके कनेक्शन को हर जगह डिस्ट्रीब्यूट नहीं किया गया। ऐसे में अन्य जगह दिए गए पानी के कनेक्शन सीधे खौलता हुआ पानी ही सप्लाई करते हैं। कोई यात्री यदि जल्दी में हो और उसे ट्रेन छूटने का डर हो, तो वह गरम पानी पीने के लिए ही विवश होगा। इस भीषण उमस और तपती गर्मी में एक मुसाफिर को पीने के साफ और ठंडे पानी के लिए भी तरसाना, व्यवस्था की सबसे बड़ी संवेदनहीनता है। यह देश के नागरिकों को मिलने वाले बुनियादी अधिकारों और सम्मान से जीने के अधिकार के बिल्कुल खिलाफ है। सामाजिक संस्था का काम काबिले तारीफ है, लेकिन तकनीकी रूप से यह उनका काम नहीं है।
अब सवाल सीधा और साफ रेल मंत्रालय और प्रशासन से है कि जब ब्यावरा स्टेशन को अपग्रेड करने के नाम पर करोड़ों के बजट पास हो रहे हैं, तो दो बूंद ठंडे पानी जैसी मूलभूत व्यवस्था के लिए काम चल रहा है का बहाना कब तक चलेगा? पिछले 9 सालों से जो काम ब्यावरा का यह महिला मंडल अपने दम पर कर रहा है, उसे आधिकारिक तौर पर करने के लिए रेलवे यहाँ जल बंधुओं की पक्की नियुक्ति क्यों नहीं करता? और क्या स्टेशनों पर केवल टाइल्स चमका देने से ही स्टेशन अमृत भारत बन जाएंगे, या फिर जनरल बोगी में बैठे देश के सबसे गरीब नागरिक को ठंडे पानी का और सरकारी तय दरों का अधिकार देना असली विकास कहलाएगा?
ट्रेनें आती रहेंगी, बदलती रहेंगी और प्लेटफॉर्म फिर सूने हो जाएंगे। लेकिन जब तक इस तंत्र की नींद नहीं टूटती, तब तक ब्यावरा स्टेशन की ये तपती पटरियां और खिड़कियों से लहराते वो खाली हाथ, रेलवे के दावों पर ऐसे ही कड़वे सवाल खड़े करते रहेंगे।
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