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उत्तराखंड के जंगलों में आग, पर्यटन और पर्यावरण पर क्या असर होंगे?

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-204 है। बुधवार, 29 अप्रैल को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए उत्तराखंड में आग की घटनाओं के बारे में और इससे लोगों, पर्यटन और पर्यावरणों पर होने वाले प्रभावों के बारे में।


मुख्य सुर्खियां

अनंत अंबानी ने कोलंबिया सरकार को पत्र लिखकर वहां मारे जाने वाले 80 दरियाई घोड़ों को बचाने और उन्हें जामनगर स्थित वंतारा केंद्र में लाने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने इन जानवरों की पूरी देखभाल और उनके प्राकृतिक आवास जैसा वातावरण प्रदान करने का आश्वासन दिया है।


गुजरात के कच्छ में लापता हुए ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के चूजे को लेकर अधिकारियों का अनुमान है कि वह उड़ना सीख गया है और इसीलिए दिखाई नहीं दे रहा। हालांकि वह अभी बहुत छोटा है और जियो-टैग नहीं किया गया है, इसलिए 50 से अधिक वनकर्मी 1,600 हेक्टेयर क्षेत्र में उसकी खोज कर रहे हैं।


दिल्ली सरकार ने अपनी नई क्लाइमेट एक्शन प्लान का ड्राफ्ट केंद्र को सौंप दिया है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना और शहर को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाना है।


हरियाणा सरकार गुरुग्राम और फरीदाबाद में इलेक्ट्रिक वाहन (EV) अपनाने की गति बढ़ाने के लिए रिहायशी और व्यावसायिक भवनों में चार्जिंग पॉइंट अनिवार्य करने हेतु नियमों में बदलाव कर रही है। इन नए नियमों के तहत अब पुरानी और नई सोसायटियों में पार्किंग क्षमता के अनुसार चार्जिंग स्टेशन बनाना अनिवार्य होगा।


सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के हौज खास स्थित ए.एन. झा डियर पार्क से सैकड़ों चित्तीदार हिरण (Spotted Deers) को राजस्थान और मध्य प्रदेश के वन्यजीव अभयारण्यों में स्थानांतरित करने के फैसले को मंजूरी दे दी है। पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए अब पार्क में केवल 38 हिरणों को ही रहने की अनुमति दी जाएगी।


मध्य प्रदेश के पशुपालन विभाग ने पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘गोरस’ ऐप लॉन्च किया है, जो बिना इंटरनेट के भी काम करेगा। यह ऐप पशुओं की नस्ल और स्थिति के अनुसार वैज्ञानिक डाइट प्लान उपलब्ध कराएगा जिससे दूध उत्पादन 20-30% बढ़ सकता है।

विस्तृत चर्चा 

उत्तराखंड के जंगलों में आग: जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप का संकट

उत्तराखंड के जंगलों में आग से न केवल प्राकृतिक संपदा को भारी नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि राज्य की पर्यटन अर्थव्यवस्था पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

आग की वर्तमान स्थिति और सांख्यिकी

15 फरवरी से 27 अप्रैल के बीच उत्तराखंड में जंगल की आग की 226 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिससे लगभग 144 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो चुके हैं। क्षेत्रवार वितरण इस प्रकार है:

गढ़वाल क्षेत्र: यहां स्थिति सबसे गंभीर है, जहां 177 घटनाओं में 110 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ है।

कुमाऊं क्षेत्र: यहां 28 घटनाएं हुईं और 21 हेक्टेयर जंगल जला।

वाइल्ड लाइफ ज़ोन: वन्यजीव क्षेत्रों में भी आग की 21 घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं।

जैव विविधता और पर्यटन पर प्रभाव

जंगल की इस आग ने उत्तराखंड की बहुमूल्य वन संपदा को भारी चोट पहुंचाई है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, ओक (बांज), बुरांश, काफल और देवदार के घने जंगल इसकी चपेट में आए हैं। इसके अलावा:

पर्यटन: यह पीक समर सीजन है जब पर्यटक पहाड़ों पर आते हैं। चारधाम यात्रा मार्ग पर भी कई जगह आग लगने से पर्यटन उद्योग प्रभावित हो सकता है।

ट्रैकिंग: आग के कारण कई ट्रैकिंग रूट्स को बंद करने की नौबत आ सकती है।

मौसम का पूर्वानुमान और राहत की उम्मीद

मौसम विभाग ने राहत की उम्मीद जताते हुए 28 और 29 अप्रैल को तापमान में गिरावट की संभावना जताई है।

ऑरेंज अलर्ट: नैनीताल, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जैसे जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है।

संभावित स्थिति: इन क्षेत्रों में गरज-चमक के साथ बारिश, ओलावृष्टि और 40 से 50 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने का अनुमान है। यदि बारिश होती है, तो आग पर काबू पाने में बड़ी मदद मिल सकती है।

आग लगने के प्रमुख कारण

जलवायु परिवर्तन: यह आग लगने का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। उत्तराखंड में जंगल की आग की आवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है। जहां 2002 में 922 घटनाएं हुई थीं, वहीं 2019 में यह संख्या बढ़कर 41,600 तक पहुंच गई।

बढ़ती गर्मी और ड्राई विंटर: इस वर्ष विंटर सीजन समय से पहले खत्म हो गया और उसके बाद तीव्र हीट वेव (Heat Wave) की स्थिति देखी गई। तापमान सामान्य से अधिक होने के कारण जंगलों की सूखी पत्तियाँ बहुत जल्दी आग पकड़ लेती हैं।

मानवीय गतिविधियां और चीड़ के पेड़: अधिकारियों के अनुसार, कई कारण मानवीय भी हैं। चीड़ (Pine) की पत्तियां (नीडल्स) आग के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। स्थानीय लोग अक्सर इन नीडल्स को साफ करने के लिए आग लगाते हैं, जो बाद में अनियंत्रित होकर बड़े जंगल की आग का रूप ले लेती है। इसके अलावा लापरवाही (जैसे जलती माचिस फेंकना) भी एक बड़ा कारण है।

यह स्थिति दर्शाती है कि हिमालयी क्षेत्रों में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और मानवीय गतिविधियों पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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