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प्रोजेक्ट्स को ‘बैक डेट’ मंज़ूरी नहीं दे सकेगी सरकार, जानिए कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट के फैसले से लेकर मप्र के किसान आंदोलन तक जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ

सरकार ने माना एथेनॉल वाले पेट्रोल से बीएस-3 वाहनों को नुकसान, भारी बारिश और बाढ़ से ओडिशा में 3 की मौत, जलवायु परिवर्तन से धान की उपज होगी कम, मप्र में किसानों का आंदोलन ख़त्म। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।


मुख्य सुर्खियां

केंद्र सरकार ने माना कि 20% एथेनॉल वाले पेट्रोल से BS-3 वाहनों के रबर पार्ट्स खराब हो सकते हैं। सर्विसिंग के दौरान इस पर 2000 से 8000 रुपये का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। हालांकि केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया कि इंजन में किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं होगी।


भारी बारिश और बाढ़ से ओडिशा में तीन लोगों की जान चली गई है। 6 जिलों के 748 गांवों में लगभग 2 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। वहीं करीब 8,000 हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हो गई है।


डाउन टू अर्थ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वैश्विक तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि होने पर भारत में धान की औसत उपज करीब 6.6% तक घट सकती है। शोध में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर पड़ेगा।


दिल्ली हाई कोर्ट ने HPV वैक्सीन अभियान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। फरवरी से अब तक इसकी 55.9 लाख खुराक दी गई हैं। प्रतिकूल प्रभाव के केवल 120 मामले आए हैं और किसी की मौत नहीं हुई है।


केंद्र सरकार के अनुसार 2023 से जून 2026 के बीच लम्पी स्किन डिज़ीज़ की वजह से देश में 29 हज़ार से भी अधिक मवेशियों की मौत हुई है। एक स्टडी के मुताबिक, 2022 और 2023 के दौरान इससे अनुमानित आर्थिक नुकसान Rs 20,200 करोड़ से भी अधिक था।


मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मूंग खरीद की सीमा 25% से बढ़ाकर 60% करने पर आंदोलन खत्म हुआ। ई-टोकन व्यवस्था को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। बुधवार रात 11 बजे किसानों ने अपना प्रदर्शन समाप्त किया।

विस्तृत चर्चा

आज की चर्चा में हमारे असिस्टेंट एडिटर चंद्रप्रताप तिवारी से जानिए विकास परियोजनाओं को बैक डेट में मंज़ूरी देने पर कोर्ट ने क्या कहा? 

कोर्ट ने रद्द किया 2021 का ऑफिस मेमोरेंडम

कानूनी बहस का मुख्य केंद्र केंद्र सरकार द्वारा जारी 2021 का एक ऑफिस मेमोरेंडम था। यह मेमोरेंडम उन परियोजनाओं को काम शुरू होने के बाद पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) लेने का रास्ता प्रदान करता था। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के इस ऑफिस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया है, और यह स्पष्ट किया है कि इस तरह का प्रावधान केवल एक प्रशासनिक आदेश के जरिए लागू नहीं किया जा सकता।

“जनहित” का अपवाद

हालांकि अदालत ने मेमोरेंडम को रद्द कर दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसी सभी परियोजनाओं पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। चर्चा में कुछ महत्वपूर्ण शर्तों पर प्रकाश डाला गया है:

जनहित की आवश्यकता: यदि यह साबित हो जाता है कि कोई परियोजना वास्तव में जनहित से जुड़ी है, तो उसे बाद में मंजूरी दी जा सकती है।

कानूनी प्रक्रिया: सरकार प्रशासनिक शॉर्टकट का सहारा नहीं ले सकती। इसके बजाय, उसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत स्थापित औपचारिक कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।

मामले-दर-मामले जांच: प्रत्येक परियोजना की अलग से जांच की जानी चाहिए ताकि यह उचित ठहराया जा सके कि उसे छूट क्यों दी जानी चाहिए।

भविष्य के प्रभाव और कार्यान्वयन

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला आगे (prospective) लागू होगा। इसका अर्थ है कि जिन परियोजनाओं को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है, उन पर इसका असर नहीं पड़ेगा। भविष्य के लिए अदालत ने एक सख्त सिद्धांत स्थापित किया है:

नियम नहीं, अपवाद: पिछली तारीख से मंजूरी को एक मानक “नियम” के बजाय एक दुर्लभ अपवाद के रूप में माना जाना चाहिए। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसी व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकती जहां पहले जानबूझकर नियम तोड़े जाएं और बाद में उन्हें आसानी से वैध बना दिया जाए।

प्रभाव का आकलन: भविष्य में देरी से मिलने वाली किसी भी मंजूरी के लिए अब परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव और जनता को होने वाले लाभ की गंभीर जांच अनिवार्य होगी।

अंततः, यह फैसला विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का एक प्रयास है। पोस्ट-फैक्टो (बाद में मिलने वाली) मंजूरी की प्रक्रिया को कड़ा करके, अदालत का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि पर्यावरणीय कानूनों का सम्मान किया जाए और कानूनों का उल्लंघन एक सामान्य औद्योगिक मानक न बन जाए।

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We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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