अगस्त-सितंबर में कम बारिश का अनुमान, तेल-गैस के लिए 84 हज़ार करोड़ रु का ‘समुद्र मंथन’, तमिलनाडु को कावेरी का पानी देने का विरोध, मप्र में शुरू हुई सांपों की गणना। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
IMD ने अगस्त और सितंबर में सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान लगाया है। इन दो महीनों में बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के 94% से कम रह सकती है। जून-जुलाई में कुल बारिश सामान्य से 13% कम रही है।
केंद्रीय कैबिनेट ने गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज के लिए 84,000 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ योजना को मंजूरी दी है। सरकार गहरे समुद्र में प्रत्येक कुएं की ड्रिलिंग के लिए 650 करोड़ रुपये तक की सहायता देगी। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 10,000 करोड़ रुपये अलग से रखे गए हैं।
कर्नाटक में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) द्वारा तमिलनाडु को 3,500 क्यूसेक पानी देने के आदेश के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। इसके बाद तमिलनाडु मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की प्रस्तावित यात्रा स्थगित कर दी गई है। 13 अगस्त को ‘कर्नाटक बंद’ का आह्वान किया गया है।
राजस्थान हाई कोर्ट ने उदयपुर की अरावली पहाड़ियों पर धड़ल्ले से हो रहे निर्माण पर सरकार को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि 2018 की हिल पॉलिसी निजी एजेंसियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। कोर्ट ने उन अधिकारियों के नाम मांगे हैं जिन्होंने इन नीतियों को मंजूरी दी।
मध्य प्रदेश के मंडला में 21 वर्षीय युवक की एम्बुलेंस में ऑक्सीजन खत्म होने के कारण मौत हो गई। युवक किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित था। जिला कलेक्टर ने इस मामले की जांच के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की है।
WII ने सतपुड़ा और कान्हा टाइगर रिजर्व में सांपों की गणना का काम शुरू किया है। इस परियोजना के लिए 110 वन अधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया है। इसका उद्देश्य सांपों के घनत्व, प्रजातियों और सड़क दुर्घटनाओं में उनकी मृत्यु का डेटा जुटाना है।
विस्तृत चर्चा
आज की चर्चा में हमारे असिस्टेंट एडिटर चंद्र प्रताप तिवारी से जानिए कि उन्होंने बरेठी में सोलर पॉवर प्रोजेक्ट कवर करते हुए क्या देखा?
रिपोर्टर डायरी: ‘अक्षय ऊर्जा’ के सपने और मुआवज़ा ताकते ग्रामीण
जून के महीने में जब मैं छतरपुर से खजुराहो की भीषण गर्मी (हीट वेव) को कवर करने के लिए निकला था, तब मुझे अंदाज़ा नहीं था कि हाईवे के किनारे लगे बड़े-बड़े बोर्ड एक बड़ी मानवीय कहानी बयां कर रहे हैं- 630 मेगावाट बरेठी सोलर पावर प्रोजेक्ट, एनटीपीसी।
खजुराहो से लौटते समय मैंने मुख्य हाईवे छोड़कर गांवों के अंदरूनी रास्तों से जाने का फैसला किया। वहां का मंजर अलग था। सड़क के दोनों तरफ लंबी फेंसिंग थी, खंभों पर सोलर प्लेट्स कसी जा रही थीं और काम जोरों पर था। लेकिन उसी फेंसिंग के अंदर कुछ ग्रामीण अपने मवेशी चरा रहे थे। जब मैं उनसे बात करने अंदर गया, तो विकास की उस चमक के पीछे छिपा दर्द उभरकर सामने आया। ग्रामीणों का अनुभव इस प्रोजेक्ट के साथ बिल्कुल भी सुखद नहीं था।
थर्मल से सोलर तक का सफर:
यह कहानी साल 2014 में शुरू हुई थी। केंद्र की यूपीए–2 सरकार में मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इसे एक एनटीपीसी थर्मल प्रोजेक्ट के रूप में उद्घाटित किया। उस वक्त एनटीपीसी ने प्रभावितों को रोजगार और सुविधाओं की एक लंबी लिस्ट दिखाई थी।
लेकिन 2016 में थर्मल प्रोजेक्ट निरस्त हो गया और 2024 में इसे अचानक सोलर प्रोजेक्ट में बदल दिया गया। इस बदलाव ने ग्रामीणों की उम्मीदों को अधर में लटका दिया।
सांदनी गांव: मुआवज़े पर शिकायतें
जब मैं सांदनी गांव पहुंचा और लोगों से मिला, तो सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर साफ नजर आया। प्रेमलाल कुशवाहा जैसे किसानों की कहानी सुनकर मन भारी हो गया। उनके दो कुओं में से केवल एक को ही सर्वे में शामिल किया गया, और उनका खसरा नंबर 98 का पूरा भूखंड 2010 की अवार्ड लिस्ट से गायब है। गांव के लगभग हर दूसरे व्यक्ति की यही शिकायत है—किसी की संपत्ति का हिस्सा छूट गया है, तो किसी को उचित मुआवजा नहीं मिला।
तिरपाल के नीचे कटी रातें और कानूनी जंग
सबसे दुखद दृश्य तब देखने को मिला जब मैंने देखा कि सोलर प्लांट का काम आगे बढ़ाने के लिए लोगों के मकान गिरा दिए गए हैं। आज भी कई परिवार अपनी ही जमीन पर तिरपाल (tripal) लगाकर रहने को मजबूर हैं। उनकी जिद है कि वे तब तक नहीं हटेंगे जब तक उन्हें ‘उचित मुआवजा’ नहीं मिल जाता।
विवाद अब कानूनी पेचीदगियों में फंसा है। ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें 1894 के पुराने कानून के बजाय 2013 के नए भूमि अर्जन कानून के तहत मुआवजा दिया जाए।
ऊर्जा, आवास और आजीविका का सवाल
एक तरफ देश को ‘ग्रीन एनर्जी’ की जरूरत है और यह सोलर प्रोजेक्ट उसी दिशा में एक कदम है, लेकिन क्या इसकी कीमत उन ग्रामीणों के घर और हक को छीनकर चुकानी चाहिए?। फिलहाल, मुआवजे के इस विवाद ने प्रोजेक्ट के काम को धीमा कर दिया है और मानवीय संकट को बढ़ा दिया है।
यह रिपोर्ट मेरी ग्राउंड जीरो की पड़ताल पर आधारित है, जिसका उद्देश्य उन आवाजों को सामने लाना है जो विकास के शोर में कहीं दब गई हैं।
आप यह ग्राउंड रिपोर्ट यहां देख सकते हैं –
NTPC Solar से विस्थापित बरेठी गांव को एक दशक से मुआवज़े का इंतज़ार
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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