मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले का पचमढ़ी हिल स्टेशन, पचमढ़ी बायोस्फीयर रिज़र्व के अंतर्गत स्थित है, जिसमें सतपुड़ा अभयारण्य, बोरी अभयारण्य और सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान आते हैं। यह कस्बा और इसके आस-पास के पर्यटन स्थल संरक्षित क्षेत्र के भीतर स्थित हैं, जिसे सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व के नाम से जाना जाता है।
पर्यटन स्थल होने की वजह से यहां होटल और रिसॉर्ट्स की डिमांड है, लेकिन साथ ही प्रोटेक्टेड एरिया होने की वजह से वन्य प्राणी और पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखते हुए ईको टूरिज़्म गतिविधियां ही संभव हैं। आलीशान कंक्रीट भवनों और होटलों के निर्माण की इजाज़त यहां नहीं है। 27 जनवरी 2026 को हुई मध्य प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक में पचमढ़ी की इसी स्थिति को बदलने के लिए कस्बे की 395.939 हेक्टेयर भूमि को अभयारण्य सीमा से बाहर कर दिया है।
मध्य प्रदेश जनसंपर्क विभाग की वेबसाईट पर मौजूद रिपोर्ट के मुताबिक ‘मंत्रीपरिषद द्वारा पचमढ़ी नगर के SADA (स्पेशल एरिया डेवलपमेंटअथॉरिटी) के नियंत्रण वाली नजूल क्षेत्र भूमि को पचमढ़ी अभयारण्य क्षेत्र से बाहर कर राजस्व नजूल घोषित करने की स्वीकृति दी गयी है।’
नजूल की जमीन वह भूमि होती है, जो सरकारी स्वामित्व में होती है। जिसे आमतौर पर लीज (पट्टे) पर किसी व्यक्ति, संस्था या संगठन को दिया जाता है, लेकिन वह भूमि बेची नहीं जा सकती।
पंचमढ़ी में अब यह भूमि वन विभाग के आधिकार क्षेत्र से निकलकर राजस्व विभाग के अंतर्गत आ जाएगी।
इसका फायदा यह होगा कि यहां रहने वाले 1200 परिवार अपने घरों की मरम्मत कर इन्हें जी+3 चार मंज़िला मकान में तब्दील कर पाएंगे। इसके साथ ही 395 हेक्टेयर एरिया में सरकार विकास कार्य करवा सकेगी।

सरकार इसे विकास का नया सवेरा बता रही है। वहीं पर्यावरण कार्यकर्ता इसे डेथ वारंट मान रहे हैं। उनका आरोप है कि स्थानीय निवासियों को राहत महज एक बहाना है। असल में प्रभावशाली लोगों और बड़े होटल कारोबारियों के लिए जंगल के दरवाजे खोले जा रहे हैं।
पर्यावरणविद् सुभाष सी. पांडे इस फैसले की वजह से अनियोजित शहरीकरण होने की चेतावनी देते हैं। उनके मुताबिक निर्माण को मंजूरी के बाद मरम्मत के नाम पर यहां तेज़ी से होटलों का निर्माण होगा।
सुभाष सी. पांडे की आशंकाओं को सही इसलिए भी माना जा सकता है क्योंकि यहां रोक के बावजूद भी अवैध होटल निर्माण हुए हैं। मई 2025 में सेशन कोर्ट ने यहां मरम्मत के नाम पर अवैध रुप से होटल बनाने के जुर्म में 6 होटल संचालकों पर कुल 22 करोड़ का जुर्माना लगाया था। कोर्ट में यह याचिका पचमढ़ी कंटोनमेंट बोर्ड द्वारा लगाई गई थी।
पंचमढ़ी में शासन मुख्य रूप से पचमढ़ी छावनी परिषद के अधीन काम करता है, जो रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आती है। यह एक प्रमुख सैन्य छावनी और छावनी परिषद (केंटोनमेंट बोर्ड) वाला शहर है, जो स्थानीय नागरिकों और पर्यटन गतिविधियों का प्रबंधन करती है। साडा (Special Area Development Authority) पचमढ़ी में शहरी विकास, निर्माण, और बुनियादी ढांचे के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। साडा प्रशासनिक कार्य, छावनी परिषद के साथ समन्वय से करती है।

पचमढ़ी का साडा मध्य प्रदेश सरकार के अंतर्गत, विशेष रूप से नगरीय विकास एवं आवास विभाग के तहत कार्य करता है। इसके साथ ही, वन विभाग भी यहाँ की व्यवस्था में शामिल हैं, क्योंकि यह क्षेत्र सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है।
सरकार द्वारा कस्बे की 395.939 हेक्टेयर भूमि को अभयारण्य सीमा से बाहर कर राजस्व नजूल घोषित करने की वजह से अब कस्बे पर साडा के अधिकार बढ़ जाएंगे और यहां वन विभाग की अनुमति की ज़रुरत नहीं होगी।
कोर्ट से मिली घर मरम्मत करने की राहत, सरकार ने पूरा क्षेत्र ही खोला
पचमढ़ी में निर्माण पर प्रतिबंध की जड़ें आधी सदी पुरानी हैं। जून 1977 तत्कालीन सरकार ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत पचमढ़ी अभयारण्य अधिसूचित किया। इसमें आबादी वाले क्षेत्रों और छावनी को अलग नहीं किया गया। तकनीकी रूप से पूरा पचमढ़ी शहर अभयारण्य का हिस्सा बन गया। इसके बाद से घर मरम्मत से लेकर विकास कार्यों के लिए वन विभाग की अनुमति अनिवार्य हो गई।
साल 2000 में, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में पचमढ़ी वन्यजीव अभयारण्य में होटलों और अन्य इमारतों के खिलाफ याचिका दायर हुई। हाईकोर्ट ने पचमढ़ी में नए निर्माण और मरम्मत पर पूर्ण रोक लगा दी थी। इस वजह से करीब 1200 परिवार प्रभावित हुए। जो अपने जर्जर मकानों की मरम्मत तक नहीं कर पा रहे थे।
छोटे-छोटे 300 वर्ग फीट के भूखंडों पर रहने वाले स्थानीय निवासियों का जीवन कठिन हो गया था। दशकों के संघर्ष के बाद सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने रहवासियों के पक्ष में फैसला दिया।
इस फैसले से छावनी और साडा क्षेत्र के 1200 स्थानीय परिवारों को राहत मिली। उन्हें अपने जर्जर मकानों की जगह जी+3 (चार मंजिला) मकान बनाने की छूट दी गई।
लेकिन पर्यावरणविदों का कुछ और ही आरोप है। उनका कहना है कि सरकार ने इस आदेश का मनमाना अर्थ निकाला है। पूरे 395.939 हेक्टेयर क्षेत्र को ही बड़े व्यावसायिक निर्माण के लिए खोल दिया गया है।
कार्यकर्ताओं ने नियम का हवाला दिया। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने 9 अगस्त 2017 को ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) अधिसूचना जारी की थी। इसके मुताबिक, संरक्षित सीमा के 1 किलोमीटर के दायरे में नए व्यावसायिक निर्माण की सख्त मनाही है। इस जमीन पर रिसॉर्ट्स और सड़कें बनाना हरित नियमों की सीधी अनदेखी है।
सरकार के 27 जनवरी 2026 के फैसले के खिलाफ वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे है। वे कहते हैं,
“इस फैसले से पचमढ़ी का नाजुक ईको-सिस्टम तबाह हो जाएगा। जल स्रोत सूख जाएंगे। यह नियमों का सीधा उल्लंघन है। इसका मकसद कुछ प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाना है।’
वहन क्षमता का संकट, अगला शिमला या नैनीताल ?

हर पहाड़ का भार सहने की एक सीमित क्षमता होती है। पर्यावरणविद् सुभाष सी. पांडे ने चिंता जताते हुए कहा,
” संवेदनशील पहाड़ी तलहटी में आबादी और वाहनों का दबाव भयानक रूप से बढ़ेगा। इसे वायु गुणवत्ता खराब होगी। निर्माण के शोरगुल से वन्यजीवों की शांति भंग हो जाएगी।”
यह डर निराधार नहीं है। राष्ट्रीय शहरी कार्य संस्थान (NIUA) ने ” अ फ्रेमवर्क फॉर अस्सेस्सिन्ग अर्बन कैरिंग कैपेसिटी एंड इट्स इम्पैक्ट एंड सैनिटेशन सर्विस डिलीवरी इन अ हिल सिटी” नामक अध्ययन किया था। जो कि रिसर्चगेट पर सितंबर 2025 में प्रकाशित हुआ है। इसके मुताबिक, उत्तराखंड के नैनीताल की प्रभावी वहन क्षमता मात्र 8,422 पर्यटक प्रतिदिन है। लेकिन पीक सीजन में वहां भीड़ कई गुना बढ़ जाती है। इसी कारण शहर जल संकट और भूस्खलन झेल रहा है।
हालांकि हिमाचल प्रदेश के शिमला का भी यही हाल है। वह 8 लाख से अधिक लोगों का भार ढो रहा है। वहां की पारिस्थितिकी चरमरा गई है।
मध्य प्रदेश टूरिज़्म बोर्ड के मुताबिक वर्ष 2024 में पचमढ़ी में 2.87 लाख पर्यटक आए थे।
राष्ट्रीय शहरी कार्य संस्थान के सैनिटेशन कैपेसिटी बिल्डिंग प्लेटफॉर्म में तान्या अहमद बतौर प्रोग्राम ऑफिसर काम करती है। वह एक आर्किटेक्ट और अर्बन रिजेनरेशन (शहरी पुनरुद्धार) पेशेवर भी हैं। अध्ययन की सह लेखिका भी है। कहती हैं,
”पचमढ़ी का भूविज्ञान मुख्य रूप से कठोर बलुआ पत्थर ( Sandstone) का है। यह भारी कंक्रीट और गहरी खुदाई के लिए कतई उपयुक्त नहीं है।”
गहराता जल संकट: सूखती देनवा नदी और गिरता भूजल
पचमढ़ी पठार की प्राकृतिक जीवनरेखा देनवा नदी (Denwa River) है। मानवीय हस्तक्षेप और जंगलों की कटाई से यह नदी भारी दबाव में है। देनवा नदी पर एक वैज्ञानिक शोध हुआ है। इसके अनुसार जल निकासी बेसिन में प्रदूषण बढ़ रहा है। गर्मियों में नदी का प्रवाह बेहद क्षीण हो जाता है।
देनवा नदी पर शोध करने वाली बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विज्ञान एवं लिम्रोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. अभिलाषा भावसार कहती है,
”पचमढ़ी का इलाका कठोर चट्टानों वाला है। जहां पानी का प्राकृतिक पुनर्भरण वैसे भी बहुत धीमा होता है। इलाकें में कंक्रीट का जाल बिछाने से बारिश का पानी जमीन में नहीं जाएगा। भविष्य में जल संकट की विकराल समस्या के रूप में सामने आएगा।”
वहीं पचमढ़ी में कचरा और सीवेज निपटान का ढांचा न के बराबर है। शहर में अभी तक कोई केंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित नहीं हो सका है। इसके कारण अधिकतर होटल और घर पूरी तरह सेप्टिक टैंकों के भरोसे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता ने चेताया कि चार मंजिला इमारतों के निर्माण से निकलने वाला हजारों लीटर सीवेज जमीन में रिसेगा, जो देनवा नदी और झरनों को जहरीला कर सकता है।

वहीं छावनी बोर्ड द्वारा बिना वैध अनमुति के सालों से वन भूमि पर कचरा डंप किया। इसके खिलाफ वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने एनजीटी में केस (OA48/2018) दायर किया था। इस पर बोर्ड को कड़ी फटकार लग चुकी है।
सरकार का तर्क
प्रशासन इस फैसले का बचाव कर रहा है। वह इसे 1 जून 1977 की एक प्रशासनिक भूल का सुधार बता रहा है। पचमढ़ी अभयारण्य की अधिसूचना 1977 में जारी हुई थी। सरकार का तर्क है कि तब सीमाओं का सही सीमांकन नहीं हुआ था। इसी वजह से पूरा शहर गलती से वन क्षेत्र में आ गया था।
लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ता इस तर्क को खारिज करते हैं। अजय दुबे सवाल करते है,
”अगर यह कदम सिर्फ स्थानीय आबादी की राहत के लिए है, तो लिखित गारंटी क्यों नहीं दी गई ? सरकार को बताना चाहिए कि बाहरी कॉर्पोरेट कंपनियाें और भू-माफियाओं को यहां व्यावसायिक प्रोजेक्ट लगाने की अनुमति नहीं मिलेगी।”
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने 1200 स्थानीय परिवारों को घर सुधारने का अधिकार दिया था। यह किसी सरकार को बायोस्फीयर रिजर्व नीलाम करने का लाइसेंस नहीं था। अब पचमढ़ी का भविष्य SADA के जोनल मास्टर प्लान-2031 पर टिका हुआ है। वाहन क्षमता और ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) के नियम बहुत कड़े हैं, इनमें वर्षा जल संचयन अनिवार्य है, ढलानों पर निर्माण की सख्त मनाही है। अगर इन नियमों को ताक पर रखकर अंधाधुंध निर्माण हुआ तो पचमढ़ी के पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच सकता है।
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