इस वर्ष मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसानों के चेहरे खिले हुए हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार उपज तो बेहतर है ही, मंडी में भी भाव सरकार द्वारा 2026-27 के लिए तय एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) 5,708 रुपए प्रति क्विंटल से अधिक मिल रहे हैं। ऐसे में कई किसान भावांतर योजना पर खरीद शुरु होने से पहले ही अपनी फसल, मंडी में व्यापारियों को बेच रहे हैं।
सोयाबीन नगदी फसल है; इसमें मुनाफा बाज़ार की चाल और सही समय पर विक्रय पर निर्भर करता है। सीहोर की उपज मंडी में जहां 18 अक्टूबर को सोयाबीन का औसत भाव 5,500 रुपए प्रति क्विंटल रहा तो 21 अक्टूबर को यह 7,064 रुपए पर पहुंचा और 31 अक्टूबर को 6,900 रुपए पर आ गया। ऐसे में वो किसान जिन्होंने अपनी फसल काट तो ली है लेकिन रबी की बुवाई की व्यस्तता में अभी तक उपज लेकर मंडी नहीं पहुंचे हैं, वो लगातार बाज़ार में चढ़ते उतरते भावों पर नज़र रख रहे हैं। क्योंकि कई किसानों के लिए यह पिछले वर्ष का घाटा कम करने का सबसे अच्छा मौका है।
किसानों की उम्मीद

देवास के बावड़ीखेड़ा गांव के किसान विपुल जैन बताते हैं कि इस वर्ष उनकी 14 एकड़ ज़मीन पर कुल 80 क्विंटल सोयाबीन की उपज हुई है। यह पिछले वर्ष केवल 20 क्विंटल थी। उन्होंने पिछले वर्ष अपनी फसल 4 हज़ार रुपए प्रति क्विंटल के भाव में बेची थी।
इस वर्ष मंडी भाव देखकर विपुल की आंखों में चमक है। वो कहते हैं “मुझे लगता है यह 8 हज़ार रुपए तक जाएगा, मैंने तो बस इसीलिए अपनी फसल अभी तक रोककर रखी है।”
विपुल बताते हैं कि पिछले वर्ष उनकी सोयाबीन की फसल अनियमित बारिश के चलते खराब हो गई थी, वो लागत भी नहीं निकाल पाए थे और उन्हें 2 से 3 लाख रुपए का घाटा हुआ था। इस वर्ष अगर उनकी फसल 8 हज़ार के भाव में बिकती है तो उन्हें लागत काटकर 4 लाख रुपए का मुनाफा हो जाएगा, जो पिछला कर्ज चुकाने के बाद भी बचत देकर जाएगा।
भावांतर से दूरी

कई वर्षों से राज्य में किसानों को सोयाबीन के उचित दाम नहीं मिल रहे थे। ऐसे में किसानों ने लगातार घाटा होने पर सरकार से एमएसपी पर सोयाबीन की खरीद की अपील की थी और इसके लिए आंदोलन भी किए थे। किसानों के विरोध को देखते हुए राज्य में वर्ष 2024 में पहली बार सरकार ने एमएसपी पर सोयाबीन का उपार्जन किया था। वर्ष 2025 में सरकार ने सीधे उपार्जन न करके, भावांतर योजना लागू की थी। इस योजना के तहत निर्धारित एमएसपी से अगर कम भाव पर किसान अपनी फसल मंडी में बेचता है तो नुकसान (भाव के अंतर) की भरपाई सरकार करती है। यह राशि किसान के खाते में ट्रांस्फर की जाती है।
वर्ष 2026-27 के लिए भावांतर पर सोयाबीन विक्रय के लिए मध्य प्रदेश में किसानों को 3 अक्टूबर से 24 अक्टूबर के बीच पंजीयन करवाना था।
राजगढ़ जिले के मनोहरपुरा गांव के लाखन सिंह परमार कहते हैं “मैने तो भावांतर योजना में पंजीयन ही नहीं करवाया है, मंडी में भाव बढ़िया मिल रहा है।” वो बताते हैं कि उनके खेत में इस वर्ष 55 क्विंटल सोयाबीन पैदा हुई है। इसमें से उन्होंने 27 क्विंटल 6,300 रुपये, 16 क्विंटल 6,900 रुपये और बाकी 22 क्विंटल 6,875 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेची है, यानी प्रति क्विंटल उन्हें 500 से 1000 रुपए का फायदा हुआ है।
कई किसानों ने रबी की बुवाई के लिए नगद पैसों की ज़रूरत के चलते अपनी उपज का एक हिस्सा बेच दिया है और बाकी भाव बढ़ने के इंतज़ार में स्टॉक कर रख लिया है।
ब्यावरा मंडी के सचिव भंवर सिंह सोलंकी बताते हैं कि खुली मंडी में सोयाबीन 7,300 रुपये तक पहुंच चुकी है। इसलिए किसान भावांतर योजना में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।
राजगढ़ कृषि विभाग के सहायक उप संचालक वीके नहायाता के अनुसार जिले में इस साल सिर्फ 766 भावांतर पंजीयन हुए हैं, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 11 हजार के पार था। हरदा जिले की सिराली उपज मंडी के सचिव अशोक ठाकुर बताते हैं कि जिले में भावांतर के तहत करीब 2,300 पंजीयन ही हुए हैं।
राजगढ़ अनाज व्यापारी राजेंद्र साहू के मुताबिक किसानों ने फसल रोक रखी है और महाराष्ट्र में फसल कमजोर बताई जा रही है, ऐसे में मध्य प्रदेश के किसान को इसका फायदा मिलने की उम्मीद है। “हम जितनी फसल खरीद रहे हैं उसका आधा आगे बेच रहे हैं और आधा स्टॉक कर रहे हैं, क्योंकि आगे दाम और बढ़ने की उम्मीद है।” साहू कहते हैं।
मध्य प्रदेश सोयाबीन उत्पादन में टॉप पर

घरेलू वनस्पति तेल उद्योग और व्यापार का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रमुख संस्था, ‘द सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ (SOPA) ने अनुमान लगाया है कि 2026-27 मार्केटिंग सीजन (अक्टूबर-सितंबर) में देश का कुल सोयाबीन उत्पादन, 2025-26 सीजन की तुलना में 2.11% घटकर 107.93 लाख टन रह जाएगा। मध्य प्रदेश और राजस्थान में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है, जबकि सूखे के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना में इसमें गिरावट आने का अनुमान है।
SOPA के अनुसार खरीफ 2026 में पूरे देश का सोयाबीन उत्पादन 107.93 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल से करीब 2 प्रतिशत कम है। महाराष्ट्र में सोयाबीन उत्पादन लगभग 33 प्रतिशत घटकर 34.88 लाख टन रह सकता है, जबकि कर्नाटक में करीब 44 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। मध्य प्रदेश में स्थिति उलट है। यहां उत्पादन 32 प्रतिशत बढ़कर 57.16 लाख टन पहुंचने का अनुमान है, जिससे मध्यप्रदेश फिर से देश का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य बन जाएगा।
अनुमान है कि क्षेत्रीय स्तर पर फसलों को हुए नुकसान, मजबूत औद्योगिक मांग जैसे कारणों की वजह से अभी बाजार किसानों के पक्ष में दिख रहा है और वे उत्साहित भी हैं हालांकि बारिश कम होने की वजह से रबी की फसल को लेकर वो चिंता में भी हैं।
रबी की चिंता
विपुल के मुताबिक सबसे बड़ी चिंता रबी की फसल को लेकर है। गांव के जलाशय खाली हैं, बोरवेल और कुओं में पानी कम है। “कुएं की मोटर अमूमन दो घंटे चल जाया करती थी, वो अब मुश्किल से एक घंटा पानी दे पा रही है।”
वो आगे जोड़ते हैं “मैं हर वर्ष 14 एकड़ खेत में गेहूं लगाता था। इस वर्ष पानी कम होने की वजह से 7 एकड़ में गेहूं और 7 एकड़ में रायड़ा (सरसों) की फसल लगाई है। क्योंकि सरसो कम पानी की फसल है।”
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