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कपास का उचित मूल्य, चार गुना मुआवजा और प्रशासनिक कार्रवाई के लिए किसानों का प्रदर्शन

खरगोन के किसानों की मांग है कि उन्हें सड़क परियोजना में दोगुना के बजाय चार गुना मुआवजा दिया जाए साथ ही कृषि अनियमितताओं को दूर किया जाए

कृषि उपज मंडी, खरगोन के एक हिस्से में बड़ा सा मंच सजा था जिसके सामने 1000 से भी ज्यादा किसान इकठ्ठा थे। मंडी के दूसरी ओर युवा किसान सजे हुए ट्रैक्टर लेकर एक कतार में खड़े थे। 16 सितंबर को ज़िले भर से आए ये किसान अपने नेताओं के भाषण सुन रहे थे। इन भाषणों में स्थानीय स्तर पर मुआवजे से लेकर भारत-अमेरिका ट्रेड डील तक का ज़िक्र था।

किसानों ने राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के बैनर अंतर्गत हफ्ते भर पहले से ही इसके लिए ब्लॉक स्तर पर मीटिंग की थी। फिर सभी ब्लॉक के किसान जिले में कलेक्टर को ज्ञापन देने के लिए इकट्ठा हुए थे। इस दौरान उन्होंने मंडी से लेकर कलेक्ट्रेट तक ट्रैक्टर रैली का आयोजन भी किया। 

किसानों का कहना था कि चूंकि बीते कुछ सालों में कपास की लागत तेज़ी से बढ़ी है इसलिए इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य भी उसी के अनुसार तय होना चाहिए। वो गुणवत्ता के आधार पर भारतीय कपास निगम लिमिटेड (CCI) के द्वारा माल रिजेक्ट किए जाने का भी विरोध कर रहे थे। इसके अलावा केंद्र की देशगांव-जुलवानिया सड़क परियोजना में चार गुना मुआवजा की मांग भी की गई। साथ ही कृषि से जुड़ी तमाम अनियमितताओं जैसे अमानक बीज, ई-टोकन से असुविधा और शिकायत के बाद भी कार्रवाई न होने की स्थिति को दूर करने की बात किसानों ने कही। 

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कृषि उपज मंडी खरगोन में प्रदर्शन में शामिल किसान | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

कपास का एमएसपी बढ़ाने की मांग

केंद्र सरकार ने मई 2026 में चालू खरीफ सीजन के लिए कपास के मीडियम स्टेपल (24.5 से 25.5 मिमी लंबे रेशे वाला कपास) के लिए 8267 रु प्रति क्विंटल और लौंग स्टेपल (रेशे की लंबाई 29.5 से 30.5 मिमी) के लिए 8667 रु प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित किया। 

गोगावां तहसील के अंतर्गत आने वाले घुघरिया खेड़ी के शंकरलाल यादव 18 एकड़ में कपास की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि प्रति एकड़ कपास उगाने की लागत 35 हज़ार से 40 हज़ार तक आती है। शंकरलाल ने कहा कि बीते साल जो खाद 1300 रुपये की थी, वह अब 2400 रुपये तक हो गई है। इसी तरह मज़दूरी और अन्य खर्च भी बढ़े हैं। मगर पहले बारिश की कमी और अभी अचानक होने वाली बारिश के चलते (प्रति एकड़) 5 से 6 क्विंटल से ज्यादा नहीं होगा। इस तरह एमएसपी पर खरीद होने के बावजूद उन्हें (प्रति एकड़) केवल 15 हज़ार रुपये तक का ही मुनाफा होगा। 

शंकरलाल ने कहा कि एमएसपी केवल न्यूनतम मूल्य है मगर लाभकारी मूल्य नहीं है। इसलिए वो एमएस स्वामीनाथन आयोग की शिफारिश के अनुसार एमएसपी तय करने की मांग करते हैं। आयोग ने फसल की औसत लागत से 50% अधिक दाम एमएसपी के रूप में तय करने की सिफारिश की थी। हालांकि नेशनल फार्मर पॉलिसी, 2007 में यह सिफारिश शामिल नहीं की गई।

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कलेक्टर कार्यालय की ओर ट्रैक्टर रैली निकालते किसान | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

शंकरलाल ने यह भी शिकायत की के सीसीआई द्वारा कपास में नमी की अधिकता बताकर माल रिजेक्ट कर दिया जाता है जिससे उनको अपना माल व्यापारियों को कम भाव में बेचना पड़ता है। 

गौरतलब है कि पिछले साल भी राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ ने 25% नमी वाले कपास की खरीदी की मांग की थी। जबकि सरकारी सीमा 12% की है। इससे ज्यादा नमी वाला कपास सीसीआई नहीं खरीदती। 

ज़मीन के 4 गुना मुआवज़े की मांग

केंद्र सरकार ने बीते जून में 4,415.60 करोड़ रुपये के बैतूल-खंडवा-वडोदरा कॉरिडोर के कुल 233.65 किमी लंबे सड़क प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दी थी। इसमें 108.64 किमी लंबी देशगांव-जुलवानिया सड़क को 2 लेन से 4 लेन करना भी शामिल है। 

इस परियोजना के लिए शंकरलाल की 5 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण होना है। उन्होने कहा कि इस ज़मीन का बाज़ार भाव 1.5 करोड़ रू प्रति एकड़ है, जबकि 6.88 लाख प्रति एकड़ के मान से दोगुना मुआवजा यानी 13.74 लाख रुपये दिया जा रहा है। इसके अलावा इस भूमि में 4 ट्यूबवेल, 2 कुएं और 90 मिमी की 7 पाइपलाइनों भी हैं। 

वो कहते हैं कि उनका विरोध सड़क रोकने के लिए नहीं है। मगर सरकार को 4 गुना मुआवजा देना चाहिए। यहां आए कई किसानों ने इस मांग को दोहराया। 

वो अपनी इस मांग के समर्थन में प्रदेश कैबिनेट का फैसला दोहराते हुए नज़र आए। 22 अप्रैल 2026 को प्रदेश कैबिनेट ने यह तय किया कि किसी भी प्रोजेक्ट के लिए यदि कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जाता है तो संबंधित भूमि मालिक को दोगुना के बजाए चार गुना मुआवजा दिया जाएगा। 

राष्ट्रीय किसान मज़दूर महासंघ के खरगोन जिलाध्यक्ष रामेश्वर गुर्जर ने कहा कि किसानों को न सिर्फ मुआवजा दिया जाए बल्कि ज़मीन के बदले ज़मीन और बच्चों की पढ़ाई लिखाई एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की भी गारंटी ली जाए।

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खरगोन उद्यानिकी विभाग के उप संचालक को मिर्च के सूखे पौधे दिखाकर शिकायत करते दुर्गापुर के किसान | फ़ोटो: अमित भटोरे

मानक बीजों पर लगी रोक

कसरावद तहसील के दुर्गापुर के केशव यादव ने 2.5 में एक स्थानीय नर्सरी से मिर्च के पौधे खरीद कर रोपाई की थी। मगर कुछ दिनों की वृद्धि के बाद ये पौधे सूख गए। मगर वो अकेले नहीं थे। गणपति यादव ने तीन एकड़ में 55 हज़ार रूपए खर्च कर पौधे लगाए थे। मगर बाद में पौधे सूखने के कारण उनके सारे पैसे डूब गए।   

हमने अपनी एक अन्य खबर में बताया था कि इस गांव के कई किसानों के पौधे इसी तरह सूख गए थे। इसे लेकर किसानों ने मांगरुल स्थित अद्वैत नर्सरी पहुंचकर अपनी शिकायत भी दर्ज करवाई थी। इस दौरान किसानों को खरगोन उद्यानिकी विभाग उपसंचालक केके गिरवाल ने फसलों का वैज्ञानिक सर्वे करवाने का आश्वासन दिया था। 

मगर केशव के अनुसार प्रदर्शन के दिन तक भी कोई वैज्ञानिक उनके खेत नहीं पहुंचा था। किसानों की मांग थी कि नर्सरी संचालक और उससे जुड़ी हुई कंपनी पर कार्रवाई की जाए। इन किसानों का कहना है कि मिर्च के ख़राब पौधों की तरह जिले में कपास के अमानक बीज भी बेचे जा रहे हैं। 

जून माह में की गई अपनी एक पड़ताल में हमने पाया था कि यहां ‘5जी’ नाम से गैरक़ानूनी तरीके से हार्बिसाईट टोलेरेंट कपास बीज बेचे जा रहे थे। किसानों ने कहा कि कृषि अधिकारीयों को भी इस बारे में पता होता है मगर वो कुछ नहीं करते। किसानों ने मांग की कि इन बीजों पर कार्रवाई हो और बिक्री पर रोक लगाई जाए। साथ ही किन बीजों पर रोक लगाई गई है, इसकी सूचना भी किसानों को मिले ताकि वो ऐसे बीज खरीदने से बच सकें।

इन मुद्दों के अलावा मंच से किसान नेताओं ने भारत-अमेरिका के बीच हो रही ट्रेड डील को भी किसानों के विरुद्ध बताते हुए इसे रद्द करने की मांग रखी। साथ ही यह कहा गया कि प्रदेश में ई-टोकन जैसी व्यवस्थाओं को हमेशा के लिए रद्द किया जाना चाहिए।। मंच के कार्यक्रम के बाद किसानों ने ट्रैक्टर रैली निकाली और कलेक्ट्रेट पहुंच कर अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा। उनका कहना है कि जब तक मांग नहीं मानी जाती, सत्याग्रह जारी रहेगा।


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Authors

  • Shishir Agrawal is the Hindi Editor of Ground Report. However he identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers environment and development affairs from the tribal landscape of central India.

    He has also covered issues related to agrarian crisis, wildlife, water, waste and urban development. He has been a recipient of several fellowships and grant. This includes Gandhi Fellowship, Vikas Samvad Media Fellowship and Earth Journalism Network Grant.

    Apart from having long conversations he indulges himself in reading books, watching theater and gazing at flying objects for leisure. He can be reached at shishiragrawl007@gmail.com.

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  • A journalist with over 16 years of experience in the field. Has served as Bureau Chief at Nai Duniya and Patrika, and has also worked with Raj Express, BSTV, and Punjab Kesari. Author of two poetry collections and one travelogue.

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