देश में 15% तक बारिश की कमी, खरीफ चावल का रकबा घटा, NTCA की आपत्ति के बावजूद कोयला खदान को मंज़ूरी, सुप्रीम कोर्ट देखेगा भोपाल मास्टर प्लान। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
मंगलवार को देश भर में 3.2 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य 5.2 मिमी से 39% कम है। 1 जून से 22 सितंबर तक कुल संचयी वर्षा 706.9 मिमी दर्ज की गई, जो सामान्य की तुलना में 15% की कमी दर्शाती है। उत्तर-पश्चिम भारत में सबसे ज्यादा 93% की कमी दर्ज की गई।
कम व असमान बारिश के कारण वर्ष 2026-27 में भारत का खरीफ चावल उत्पादन 5-7% घटकर 116–118 मिलियन टन रहने का अनुमान है। यह पिछली बार 124.8 मिलियन टन था। धान का रकबा 4% घटकर 42.9 मिलियन हेक्टेयर रह गया है; सबसे अधिक गिरावट कर्नाटक और तेलंगाना में दर्ज की गई।
राजस्थान सरकार यूरिया और डीएपी खाद की लंबी लाइनों को खत्म करने के लिए मोबाइल ऐप, ई-मित्र और डोरस्टेप डिलीवरी प्रणाली शुरू कर रही है। ‘फार्मर फर्टिलाइजर सिस्टम’ (FFS) के पायलट प्रोजेक्ट के तहत 8.31 लाख किसानों ने QR कोड जनरेट कर लगभग 1.20 लाख मीट्रिक टन खाद खरीदी।
NTCA और WII की चेतावनियों के बावजूद केंद्रीय एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी (EAC) ने उमरिया में अंडरग्राउंड कोल माइन को सशर्त मंजूरी दी है। यह बांधवगढ़-अचानकमार टाइगर कॉरिडोर से केवल 6 किमी दूर है। यह पिछले 4 महीनों में इस संवेदनशील कॉरिडोर के पास मंजूर की गई चौथी कोयला खदान है।
मध्य प्रदेश कैबिनेट ने बिजली की कमी को देखते हुए बिजली खरीद की नई मंज़ूरी दी है. दावा है कि 2037 तक 1,900 मेगावॉट बिजली की अनुमानित कमी हो सकती है. इससे निपटने के लिए 2,800 मेगावॉट थर्मल पावर खरीदने की मंजूरी दी है।
मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल के नए मास्टर प्लान का ड्राफ्ट तैयार कर सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया; कोर्ट ने ड्राफ्ट पर दावे-आपत्तियां मांगने की अनुमति दी, लेकिन स्पष्ट किया कि अंतिम मास्टर प्लान कोर्ट की मंजूरी के बाद ही लागू होगा।
विस्तृत चर्चा
विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में पेश रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण ह्रास से भारत को हर साल जीडीपी के ~5.7% के बराबर आर्थिक नुकसान हो रहा है। इस बारे में विस्तार से जानिए अब्दुल वसीम अंसारी से।
पर्यावरण ह्रास से भारत का आर्थिक नुकसान
हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ सम्मेलन से दो बहुत ही महत्वपूर्ण ख़बरें सामने आई हैं। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से जो रिपोर्ट्स और बयान सामने आए हैं, वे भारत के लिए एक ही समय पर एक बड़ी चेतावनी भी हैं और एक बड़ी उपलब्धि भी।
आर्थिक नुकसान
सबसे पहले हमें उन गंभीर आंकड़ों पर ध्यान देना होगा जो दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरण की बिगड़ती हालत के कारण भारत को हर साल अपनी जीडीपी (GDP) के करीब 5.7% के बराबर का भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।
यह नुकसान हमारी अर्थव्यवस्था और लोगों की सेहत पर बहुत भारी पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अकेले वायु प्रदूषण के कारण देश की जीडीपी को 1.36% की चपत लग रही है और भारतीयों की औसत उम्र 5.2 साल तक घट रही है। हर साल 10 लाख से भी ज्यादा मौतें सीधे तौर पर इससे जुड़ी हुई हैं।
इसके अलावा, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 लागू होने के बाद से अब तक 10.26 लाख हेक्टेयर वन भूमि को दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल किया जा चुका है, जो पर्यावरण असंतुलन को बढ़ाता है।
वैश्विक मंच पर सराहना
लेकिन जब हम इन घरेलू चुनौतियों से जूझ रहे हैं, वहीं वैश्विक मंच पर भारत का प्रदर्शन बेहद सराहनीय रहा है। इसी सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन का जो आरोप मढ़ा जाता है, वह पूरी तरह अनुचित है। भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। पीएम मोदी ने रेखांकित किया कि भारत इकलौता G20 देश है जिसने पेरिस समझौते (COP-21) के अपने सभी संकल्पों को समय से बहुत पहले पूरा कर लिया है।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारत में गैर-जीवाश्म स्रोतों (non-fossil sources) से बिजली उत्पादन का हिस्सा 54.18% तक पहुंच चुका है, जो 2030 के लक्ष्य से 9 साल आगे है। हम सालाना वन क्षेत्र बढ़ाने में भी दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं।
दोहरे मोड़ पर खड़ा देश
लेकिन अगर हम पूरी स्थिति का एक निष्पक्ष आकलन करें, तो हम एक दोहरे मोड़ पर खड़े हैं। एक तरफ, सरकार की नीतियों, रिन्यूएबल एनर्जी और अंतरराष्ट्रीय वादों को निभाने में भारत की वैश्विक लीडरशिप और सफलता पर कोई संदेह नहीं है—हम दुनिया के लिए एक उदाहरण बन रहे हैं।
लेकिन दूसरी तरफ, स्थानीय स्तर पर प्रदूषण की मार और पर्यावरण से होने वाला आर्थिक-मानवीय नुकसान एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सच्चाई यह है कि जब तक वैश्विक मंच की ये बड़ी सफलताएं हमारे शहरों की हवा को साफ करने और आम नागरिक की सेहत सुधारने में नहीं बदलतीं, तब तक यह लड़ाई अधूरी है। भारत आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ लेकर चल तो रहा है, लेकिन घरेलू स्तर पर लागू होने वाले कड़े नियमों और जमीनी सुधारों की गति को और तेज करना होगा, तभी हम एक वास्तविक और टिकाऊ संतुलन बना पाएंगे।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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