मध्य प्रदेश खाद्य विभाग ने 7 जुलाई, 2026 को एक आदेश जारी किया। इसके क्लॉज 3 में राशन दुकानों के कमीशन की गणना का तरीका बदल दिया गया है।
अब 200 से कम राशन कार्ड वाली ग्रामीण दुकानों, जहां पूर्णकालिक विक्रेता है, को हर महीने केवल ₹5,515 मिलेंगे। 1 अप्रैल, 2022 के बाद आवंटित दुकानों को भी ₹5,515 ही मिलेंगे, भले ही उनके पास 200 या उससे अधिक राशन कार्ड हों और स्वतंत्र विक्रेता हो।
राजगढ़ में आजीविका मिशन (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का हिस्सा) से जुड़ीं राधा चौहान ने बताया कि उनके समूह को 2024 तक हर महीने ₹10,500 मिलते थे। 2025 में यह राशि घटकर ₹8,500 हो गई, हालांकि विभाग के रिकॉर्ड में यह राशि ₹8,900 थी।
आंखखेड़ी कला ग्राम पंचायत में राशन दुकान चलाने वाली रामश्री शर्मा ने भी इसी तरह की स्थिति बताई। उन्होंने 2018 में करीब ₹5,000 की कमाई से काम शुरू किया था। यह बढ़कर ₹8,400 और फिर 2022 के आसपास ₹10,500 हो गई। इसके बाद यह फिर घटकर करीब ₹8,400 रह गई।
वह तीन गांवों के 400 परिवारों को राशन देती हैं। दुकान के किराए पर करीब ₹2,000 और बिजली व तौल के खर्च पर ₹4,000 खर्च होते हैं। इसके बाद उनके पास लगभग ₹2,000–3,000 ही बचते हैं।
जब शर्मा और अन्य महिलाओं ने इस मुद्दे को उठाया, तो अधिकारियों ने उनसे कहा कि केंद्र सरकार इस अंतर की भरपाई करेगी। हालांकि, अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है।
राजगढ़, शाजापुर, देवास और बड़वानी जिलों में राशन दुकानें चला रहीं सैकड़ों महिलाओं ने जिला कलेक्टरों को ज्ञापन सौंपे और विरोध प्रदर्शन शुरू किए। प्रशासन से बातचीत के बाद इन प्रदर्शनों को फिलहाल रोक दिया गया है।

“लखपति दीदी” और विरोधाभास
मध्य प्रदेश के राशन मित्र पोर्टल के 2026 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 27,377 सक्रिय उचित मूल्य की दुकानें हैं। इन दुकानों के नेटवर्क से 1.25 करोड़ परिवार और 5.35 करोड़ लाभार्थी जुड़े हैं।
राजगढ़ की जिला आपूर्ति अधिकारी स्वाति वैकर ने बताया कि जिले में 695 उचित मूल्य की दुकानें हैं, जिनमें से 231 स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित हैं। राजगढ़ में विभिन्न योजनाओं के तहत करीब 2.96 लाख पात्रता कार्ड हैं, जिनसे लगभग 12 लाख लाभार्थी जुड़े हैं।
अप्रैल 2022 के बाद राशन दुकान पाने वाले स्वयं सहायता समूहों में से केवल 2–5% को ही सरकारी भवन मिला है। बाकी समूह किराए के परिसरों से काम करते हैं। शर्मा ने बताया कि दुकान के लिए आवेदन करते समय उन्हें भी किराए का समझौता पत्र जमा करना पड़ा था।
जिला खाद्य एवं आपूर्ति अधिकारी स्वाति वैकर ने कहा कि उन्हें नए आदेश के पीछे का कारण पता नहीं है। उन्होंने कहा कि किराए के समझौते यह सुनिश्चित करने के लिए होते हैं कि राशन सही पते पर पहुंच रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुकान का किराया सरकार नहीं देगी।
“इन महिलाओं को राशन दुकान देने का उद्देश्य यही है कि ग्रामीण महिलाएं मुख्यधारा का हिस्सा बनें और आर्थिक रूप से मजबूत हों,” वैकर ने कहा।
कमीशन में यह कटौती ऐसे समय हुई है जब मध्य प्रदेश में “लखपति दीदियों” की संख्या बढ़ने को राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान मिला है। राज्य स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने को भी बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में कमीशन में कटौती इस प्रयास के उलट दिखाई देती है: इससे राशन दुकान चलाने वाली महिलाओं की आय कम हो रही है, जबकि राज्य महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने की बात कर रहा है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के जिला कार्यक्रम प्रबंधक संदीप सोनी ने इस विरोधाभास को समझाते हुए कहा कि लखपति दीदी का दर्जा परिवार की आय के आधार पर तय होता है, केवल महिला की व्यक्तिगत आय के आधार पर नहीं।
उन्होंने कहा, “पीडीएस की दुकान स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत है। विक्रेता महिलाएं ही हैं और उनके परिवार के सदस्य भी उनका सहयोग करते हैं।”
सोनी ने बताया कि अधिकांश ग्रामीण परिवार खेती भी करते हैं। यदि किसी परिवार की खेती से होने वाली आय सालाना कम से कम ₹1 लाख है, तो वह राशि स्वयं सहायता समूह की सदस्य महिला की पारिवारिक आय में शामिल होती है। जब परिवार की शुद्ध वार्षिक आय, सभी खर्चों को निकालने के बाद, ₹1 लाख से अधिक हो जाती है, तो महिला को लखपति दीदी के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
सोनी ने कहा कि राशन दुकानों का कमीशन खाद्य विभाग तय करता है, एनआरएलएम नहीं। उन्होंने कहा, “हमारा काम केवल स्वयं सहायता समूहों का प्रबंधन करना है। उनकी नियुक्ति के समय वेतन और अन्य मामलों में जो विसंगतियां हैं, उनके बारे में हमें आप [मीडिया] के जरिए ही जानकारी मिली है।” उन्होंने कहा कि एनआरएलएम इस मामले को राज्य के अधिकारियों के सामने उठाएगा।
भोपाल संभाग के आयुक्त कर्मवीर शर्मा के निजी सहायक सुरभित ने कहा कि कमीशन में कटौती केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद की गई है और विभाग के लिए उच्च अधिकारियों के निर्देशों को लागू करना जरूरी था।

अनाज की बोरियों का वजन
राधिका सिसोदिया करीब 2018 से राशन की दुकान चला रही हैं और लगभग 650 राशन कार्डधारकों को राशन वितरित करती हैं।
“राशन बांटने में मुझे करीब 15 दिन लगते हैं,” उन्होंने कहा। इन 15 दिनों के दौरान तौलने में मदद के लिए वह मजदूरों को काम पर रखती हैं और उन्हें कम से कम ₹400 प्रतिदिन देती हैं।
महिला विक्रेताओं ने गोदामों से आने वाली अनाज की बोरियों के वजन में गड़बड़ी का आरोप भी लगाया। उनके ज्ञापन में कहा गया है कि खरीद समिति द्वारा 50 किलो 500 ग्राम वजन की पैक की गई बोरियों में दुकान तक पहुंचने के समय 3–5 किलो तक की कमी रह जाती है।
फिलहाल प्रति क्विंटल 5 किलो तक की कमी को सामान्य माना जाता है। महिला विक्रेता संघ चाहता है कि इस सीमा को घटाकर 50 किलो पर 1 किलो किया जाए।
वैकर ने कहा कि दुकान संचालकों को अनाज की डिलीवरी स्वीकार करने से पहले खुद उसका वजन करने के निर्देश दिए जाते हैं।
राजगढ़ वेयरहाउस सेंटर के प्रभारी राशिद खान ने इन आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि भोपाल खाद्य विभाग द्वारा आवंटित अनाज को भेजने से पहले परिसर में ही तौला जाता है और दुकान पर भी उसका दोबारा वजन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पूरे परिसर में, जिसमें तौल कांटा भी शामिल है, कैमरे लगे हैं, इसलिए अनाज के वजन में हेरफेर करना “संभव ही नहीं है।”

आगे का रास्ता
मध्य प्रदेश सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2015 की धाराएं 8 और 9 राशन दुकानों के संचालन के लिए सख्त शर्तें तय करती हैं।
जमुनिया घाटा गांव के श्री राम जानकी स्वयं सहायता समूह की दुकान एक महिला के नाम पर पंजीकृत है, लेकिन पर्दा प्रथा और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण रोजमर्रा का काम पुरुष परिवार के सदस्य संभालते हैं।
दुकान संचालक कुमेर सिंह ने बताया कि नेटवर्क कनेक्टिविटी खराब होने के कारण विक्रेताओं को घर-घर जाना पड़ता है और ई-पीओएस मशीन पर फिंगरप्रिंट के जरिए लाभार्थियों से प्रमाणीकरण करवाना पड़ता है, ताकि राशन वितरण का रिकॉर्ड पूरा किया जा सके।
राज्य सरकार स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित राशन दुकानों को ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक मुख्यधारा में लाने के एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत करती है। साथ ही, वह बढ़ती पारिवारिक आय पर आधारित लखपति दीदी मॉडल को भी बढ़ावा देती है। लेकिन इन दुकानों को चला रहीं महिलाएं अपनी घटती आय की कहानी बता रही हैं। उनके कमीशन का बड़ा हिस्सा किराए, बिजली, तौल और स्टेशनरी के खर्च में चला जाता है। कई बार अनाज की कमी की भरपाई भी उन्हें अपनी जेब से करनी पड़ती है।
अप्रैल 2022 के बाद राशन दुकान पाने वाली महिलाओं को अब करीब 200 राशन कार्ड होने के बावजूद लगभग ₹5,500 महीने ही मिलते हैं। कई महिलाओं का कहना है कि वे अपने स्वयं सहायता समूहों के प्रति प्रतिबद्धता के कारण ही यह काम जारी रखे हुए हैं।
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