रहवासी कॉलोनियों में व्यावसायिक गतिविधियां करने के खिलाफ भोपाल में प्रदर्शन का आयोजन किया गया। रविवार, 9 अगस्त को भोपाल की संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति ने लगभग 2 किमी लंबे एक टॉर्च मार्च का आयोजन किया। इस दौरान कोलार, ई-8, ई-7 और अन्य क्षेत्र के निवासियों ने 7 नंबर बस स्टॉप से वंदे मातरम चौराहे तक पैदल मार्च किया।
मार्च में शामिल लक्ष्मीकांत पांडेय कहते हैं कि उनके इलाके में व्यावसायिक गतिविधियां होने के चलते रहवासियों की शांति भंग हो रही है। उन्होंने बताया, “(घर के सामने) वाहन खड़े रहते हैं, असामाजिक तत्वों की आवाजाही बढ़ी है और लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है।”
इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु के एक रिहाइशी प्लॉट पर अनाधिकृत रूप से इमारत के निर्माण से संबंधित एक केस की सुनवाई चल रही थी। बाद में इस मामले का दायरा पूरे देश तक बढ़ गया। भोपाल के 2 लोगों द्वारा भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गईं।
एक अगस्त को भोपाल नगर निगम (BMC) ने शहर के बावड़ियां कला सहित कई इलाकों में दुकाने बंद करवा दीं। मगर 2 दिन बाद ही यह दुकानें खुल गईं। रहवासी इन दुकानों को पूरी तरह बंद करने की मांग कर रहे हैं। जबकि दुकानदारों का कहना है कि जब वो कॉमर्शियल रेट पर बिजली बिल, दुकान का किराया और टैक्स दे रहे थे तो अब यह दुकानें अवैध कैसे हो सकती हैं?

वर्षों की शिकायतें, लेकिन कार्रवाई नहीं
अरेरा कॉलोनी के निवासी विवेक त्रिपाठी ने 2021 से अब तक इस मामले पर 20 से ज्यादा शिकायतें और आवेदन दिए हैं। यह आवेदन मुख्यमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव, नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव, भोपाल नगर निगम (BMC), जिला कलेक्टर और नगर तथा ग्राम निवेश विभाग को लिखे गए हैं।
त्रिपाठी ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “पहले एक मॉल बना, फिर दो और उसके बाद एक साथ पांच-छह मॉल बनने लगे। इससे कॉलोनी की पार्किंग व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और दिनभर बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ गई।”
शिकायतों के साथ लगाए गए दस्तावेजों में नगर निगम के बिल्डिंग परमिशन सर्टिफिकेट भी हैं। इनमें इन संपत्तियों का उपयोग रिहायशी बताया गया है। वहीं इन्हीं जगहों की तस्वीरों में बैंक, कॉफी चेन, होटल और रिटेल कॉम्प्लेक्स चलते हुए दिखाई देते हैं। इन सभी दस्तावेजों के बावजूद रहवासियों का कहना है कि कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
इसी मुद्दे पर त्रिपाठी की एक अलग रिट याचिका मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में लंबित है।
अगस्त 2025 में पूर्णेंदु शुक्ला की एक याचिका पर मप्र हाई कोर्ट ने राज्य सरकार सहित, बीएमसी, डिस्कॉम और अन्य सरकारी संस्थानों को नोटिस जारी करते हुए कहा कि अरेरा कॉलोनी में केस के निपटारे तक कोई भी अवैध निर्माण न हो।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा
फरवरी 2026 में ‘लोगनाथन बनाम तमिलनाडु राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि तमिलनाडु में एक रिहायशी प्लॉट पर बिना मंजूर नक्शे के डेढ़ मंजिल की अनधिकृत इमारत बनने दी गई। कोर्ट ने माना कि सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं बल्कि पूरे देश में ऐसी अनधिकृत गतिविधियों की बड़ी समस्या है।
मार्च 2026 में कोर्ट ने सभी राज्यों की राजधानियों और केंद्र शासित प्रदेशों के नगर निकायों को निर्देश दिया कि वे ऐसे रिहायशी इलाकों की पहचान करें, जहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं और अपनी अनुपालन रिपोर्ट जमा करें।
कोर्ट अपने 17 दिसंबर 2024 के, राजेंद्र कुमार बड़जात्या बनाम यूपी आवास एवं विकास परिषद, फैसले को भी लागू करने की बात कही। इसमें कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ समय बीत जाने या पैसा खर्च हो जाने के कारण अनाधिकृत निर्माण को जारी नहीं रहने दिया जा सकता। ऐसे निर्माण की अनुमति देने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
सीलिंग अभियान और उसका कमजोर पड़ना
सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद बीएमसी ने भोपाल में संपत्ति मालिकों को 1,000 से ज्यादा नोटिस जारी किए। अरेरा कॉलोनी और बावड़िया कलां में सबसे ज्यादा नोटिस दिए गए।
सीलिंग अभियान 1 अगस्त 2026 को शुरू हुआ। पहले रोहित नगर में कार्रवाई की गई और इसके बाद अरेरा कॉलोनी में अभियान पहुंचा। लेकिन रहवासियों का कहना है कि यह कार्रवाई प्रभावी नहीं थी।
त्रिपाठी और दूसरे निवासी लोवनीश भाटी की ओर से मामले में एमिकस क्यूरी (‘न्यायालय का मित्र’) अजीत कुमार सिन्हा को दाखिल शिकायत के अनुसार, जब बीएमसी की टीमें पहुंचीं तो कई दुकानदारों ने सिर्फ शटर गिरा दिए और बाहर ‘बंद’ के बोर्ड लगा दिए।
अधिकारियों ने इसे कार्रवाई का पालन मान लिया और आगे बढ़ गए। कई जगहों पर न तो सील लगाई गई और न ही जरूरी दस्तावेज ठीक से तैयार किए गए।

व्यापारियों का क्या कहना है?
रोहित नगर में टैटू स्टूडियो चलाने वाले शिवम भोपाली कहते हैं कि कारोबारी सालों की मेहनत से अपना व्यवसाय खड़ा करते हैं, ऐसे में अचानक उसे हटाने की कार्रवाई मुश्किल पैदा करती है।
वहीं फ़ोटोकॉपी की दुकान संचालित करने वाले लकी मीना अब भी नहीं जानते कि उन्हें दुकान बंद करनी है या नहीं। उन्हें भी 1 अगस्त को नगर निगम ने दुकान बंद करके के लिए कहा था। मगर वो अपने व्यापारी संघ के एक व्हाट्सग्रुप को दिखाते हुए कहते हैं कि फ़ोटोकॉपी सहित कुछ दुकानों को कार्रवाई से छूट दी गई है।
हालांकि मीना अपनी दुकान हटाने को तैयार हैं उनका कहना था कि इसके लिए पहले से नोटिस दिया जाए।
जबकि भोपाली कहते हैं, “अगर हमारा बिजनेस हटाया जा रहा है तो बेहतर है कि हमें कहीं और जगह अलॉट कर दी जाए, जहां हम सुरक्षित तरीके से कारोबार चला सकें और हमें भरोसा हो कि अब हमें वहां से नहीं हटाया जाएगा।”
फिर खुल गई दुकानें
7 अगस्त को जब रिपोर्टर ने बावडिया कलां और रोहित नगर का दौरा किया तो यह दुकानें/प्रतिष्ठान संचालित होते हुए दिखाई दिए। इसका कारण समझाते हुए पूर्णेंदु शुक्ला ने बताया कि कुछ दुकानदारों ने हाईकोर्ट से निगम की कार्रवाई के खिलाफ स्टे ऑर्डर ले लिया।
हालांकि इस बात की पुष्टि के लिए जब रिपोर्टर द्वारा संबंधित प्रतिष्ठानों से संपर्क किया गया तो उन्होंने किसी भी टिप्पणी से इनकार कर दिया।
5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान बीएमसी की ओर से एडिशनल सोलिसिटर जनरल केएम नटराज ने भी इस बात की पुष्टि की।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी से कोऑर्डिनेट बेंच द्वारा पास किए गए ऐसे ऑर्डर की एक लिस्ट तैयार करने के लिए कहा है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से कहा कि जिन मामलों में उसने स्टे या अंतरिम राहत दी है, उन्हें छह सप्ताह के भीतर तय करने की कोशिश की जाए। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
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