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तमाम इंडेक्स में आगे होने पर भी भारत पर्यावरण सूचकांक में फिसड्डी क्यों है?

2026 ईपीआई में भारत 176वें स्थान पर है, लेकिन दूसरे इंडेक्स में ऊपर चढ़ रहा है। एक्सपर्ट्स ने विस्तार से बताई रैंकिंग्स की कहानी।
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2026 के एनवायरनमेंट परफॉर्मेंस इंडेक्स (ईपीआई) में भारत 177 देशों में से 176वें नंबर पर था। लाओस से बस एक पायदान ऊपर। इसी इंडेक्स में क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन की कैटेगरी में भारत को 130वां स्थान मिला।

वहीं क्लाइमेट चेंज परफॉर्मेंस इंडेक्स (सीसीपीआई) में भारत की रैंकिंग 63 देशों और यूरोपियन यूनियन के बीच 23वें नंबर पर है। 2025 में भारत “हाई परफॉर्मर” था, इस बार उसे “मीडियम परफॉर्मर” की श्रेणी में रखा गया है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 रिपोर्ट के मुताबिक भारत नौ में से सात प्लैनेटरी बाउंड्री पार कर चुका है। प्लैनेटरी बाउंड्री एक ऐसा फ्रेमवर्क है जिससे वैज्ञानिक धरती के सिस्टम को स्थिर रखने की सुरक्षित सीमा तय करते हैं, इसमें जलवायु परिवर्तन, बायोस्फ़ीयर इंट्रेगिटी और ताज़े पानी की कमी जैसे पैमाने शामिल हैं।

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यानी दो अलग-अलग क्लाइमेट इंडेक्स में भारत के प्रदर्शन को बिल्कुल अलग तरीके से आंका गया। एक में भारत की स्थिति ठीक-ठाक बताई गई तो दूसरे में वह लगभग सबसे नीचे था। तब सवाल है कि आखिर इतना बड़ा फर्क क्यों?

Fisher women paddle their small boats through the heavily weeded and shallow parts of Wular Lake. Photo credit: Wahid Bhat 
कश्मीर के बांदीपुरा में वुलर झील का सूखा हुआ हिस्सा, प्लास्टिक कचरे और फंसी हुई नावों से भरा हुआ | फोटो: वाहिद भट

ईपीआई क्या मापता है, और भारत कहां पिछड़ा?

येल यूनिवर्सिटी के येल सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉ एंड पॉलिसी और कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल के रिसर्चरों ने ईपीआई के लिए 177 देशों को 12 कैटेगरी में बंटे 47 इंडिकेटर्स पर परखा। इन्हें तीन बड़े हिस्सों में बांटा गया है: एनवायरनमेंटल हेल्थ (25% वेटेज), इकोसिस्टम वाइटैलिटी (45% वेटेज) और क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन (30% वेटेज)।

भारत को एनवायरनमेंटल हेल्थ में 174वां, इकोसिस्टम वाइटैलिटी में 171वां और क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन में 130वां स्थान मिला है।

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भारत की ईपीआई रैंक गिरी है (Line chart)

येल यूनिवर्सिटी में ईपीआई के रिसर्च डायरेक्टर जकारी वेंडलिंग के मुताबिक भारत की सबसे कमज़ोर कैटेगरी हैं—जल संसाधन, जंगल और जैवविविधता एवं रहवास। उन्होंने बताया कि जैवविविधता के मामले में सबसे ज़्यादा नुकसान खराब तरीके से संभाले जा रहे समुद्री संरक्षित क्षेत्रों की वजह से हुआ है। 

वहीं ज़मीन आधारित संरक्षित क्षेत्र के संकेतक भी बहुत अच्छे नही हैं। समुद्री संरक्षित क्षेत्रों की प्रभावशीलता के मामले में भारत का स्कोर घटकर शून्य पर आ गया है। यह संकेतक बताता है कि संरक्षित समुद्री इलाकों में ओवरफिशिंग (सीमा से ज्यादा मछलियां पकड़ना) रुक पा रही है या नहीं।

पिछले एक दशक में प्रदूषण से जुड़े कई इंडिकेटर और बिगड़े हैं। जिनमें पार्टिकुलेट मैटर (PM) से होने वाली मौतें व बीमारियां और कार्बन मोनोऑक्साइड व सल्फर डाइऑक्साइड के संपर्क में आना शामिल है।

मध्य प्रदेश के भोपाल में एक ग्रामीण सड़क पर ट्रक धूल उड़ा रहा है | फोटो: शिशिर अग्रवाल

ईपीआई रिपोर्ट के मुताबिक भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अब भी अपेक्षाकृत कम है लेकिन तेज़ी से बढ़ रहा है, ऐसे में जैसे-जैसे करोड़ों लोगों को आधुनिक ऊर्जा सेवाएं मिल रही हैं, देश को विकास और प्रदूषण के बीच गहरे तनाव का सामना करना पड़ रहा है—इसकी कीमत शहरी वायु प्रदूषण और तेज़ी से बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के तौर पर चुकानी पड़ रही है।

सीएसई की किरण पांडे ने ऐसी रिसर्च का हवाला दिया जिससे पता चलता है कि भारत में वायु प्रदूषण लगातार बिगड़ रहा है। पांडे द्वारा लिखी गई सीएसई की रिपोर्ट स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026: इन फिगर्स के मुताबिक 2023 में वायु प्रदूषण की वजह से 5.94 करोड़ हेल्दी लाइफ इयर्स (डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ इयर्स यानी DALY) का नुकसान हुआ। इसमें PM2.5 सबसे बड़ी वजह बनकर उभरा, जबकि 2014 में यह जगह घरेलू वायु प्रदूषण की थी।

इस साल ईपीआई में एक नया इंडिकेटर भी जोड़ा गया है—ग्रासलैंड कन्वर्जन यानी घास के मैदानों का दूसरे इस्तेमाल में बदलना। इसमें भारत को 43.99 अंक मिले हैं और दक्षिण एशिया के आठ देशों में वह छठे नंबर पर है। वहीं पाकिस्तान को इसमें 73.95 अंक मिले और वह क्षेत्र में चौथे स्थान पर रहा।

दूसरे इंडेक्स क्या कहते हैं, और ईपीआई में क्या छूट जाता है

सीसीपीआई का दायरा ईपीआई जितना बड़ा नहीं है। यह सिर्फ जलवायु पर केंद्रित है, जबकि ईपीआई पर्यावरण की पूरी तस्वीर को समेटने की कोशिश करता है।

सीसीपीआई किसी देश को चार पैमानों पर आंकता है—प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (40% वेटेज), रिन्यूएबल एनर्जी (20%), एनर्जी यूज़ (20%) और क्लाइमेट पॉलिसी (20%)। इस साल भारत को इनमें से तीन में मीडियम रेटिंग और रिन्यूएबल एनर्जी में लो रेटिंग दी गई है।

भारत के पास अब भी कोयले से बाहर निकलने की कोई राष्ट्रीय समय-सीमा नहीं है, वह लगातार नए कोयला ब्लॉक की नीलामी कर रहा है और कार्बन प्राइसिंग की स्थिति भी कमज़ोर है—भले ही उसने 2030 के लक्ष्य से पांच साल पहले ही नॉन-फॉसिल पावर कैपेसिटी का 50% हिस्सा हासिल कर लिया हो।

नर्मदापुरम-बुधनी के बीच डंपिंग साइट पर कचरे का पहाड़ जमा हो गया | फोटो: पल्लव जैन

क्रिया यूनिवर्सिटी में एनवायरनमेंटल स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफेसर और आईपीसीसी की छठी असेसमेंट रिपोर्ट के सह-लेखक डॉ. चिराग धारा ने इस बात पर लंबे समय से रिसर्च की है कि ईपीआई जैसे इंडेक्स अपने नंबर किस तरह तय करते हैं। अक्टूबर 2025 में जर्नल क्लाइमेट पॉलिसी में छपे अपने पेपर में, जिसका शीर्षक है “इंटरप्रेटिंग क्लाइमेट परफॉर्मेंस इंडाइसेज़: इम्प्लीकेशंस फॉर इक्विटेबल एंड इफेक्टिव पॉलिसी“, धारा और उनके सह-लेखकों ने ईपीआई की तुलना सीसीपीआई और क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर से की है।

धारा ने ईमेल पर ग्राउंड रिपोर्ट को बताया कि ईपीआई अपनी बनावट में ही समृद्ध देशों के पक्ष में झुका हुआ है, जिनका सालाना उत्सर्जन अब घट रहा है, जबकि भारत जैसे कम समृद्ध देश इसमें पिछड़ जाते हैं।

उन्होंने बताया कि ईपीआई मुख्य रूप से इस बात को देखता है कि किसी देश का कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन समय के साथ कैसे बदला है, जबकि सीसीपीआई ज़्यादातर देश के मौजूदा उत्सर्जन पर फोकस करता है, चाहे उसका कुल उत्सर्जन कितना भी बड़ा या छोटा क्यों न हो। इसके अलावा सीसीपीआई रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी यूज़ और क्लाइमेट पॉलिसी को भी अपने आकलन में शामिल करता है। दोनों इंडेक्स के इस अलग-अलग तरीके का मतलब है कि वे क्लाइमेट परफॉर्मेंस के जटिल सामाजिक-आर्थिक सवाल के अलग-अलग पहलू टटोल रहे हैं।

धारा के मुताबिक भारत के रिन्यूएबल एनर्जी विस्तार से मुख्य रूप से पावर सेक्टर में ही उत्सर्जन कम हुआ है, इंडस्ट्री या ट्रांसपोर्ट सेक्टर में नहीं। यही वजह है कि एनर्जी ट्रांज़िशन तेज़ होने के बावजूद देश का कुल और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बढ़ता ही रहा।

उन्होंने यह भी बताया कि इलेक्ट्रिक व्हीकल अपनाने के मामले में भारत चीन से पीछे रह गया है, और लो-कार्बन मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी अब भी काफी हद तक दूसरे देशों के पेटेंट के दायरे में बंद है।

पिछली बार सरकार ने क्या कहा था

ईपीआई, 2022 में भारत को 180 देशों में सबसे आखिरी पायदान पर रखा गया था। तब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कुछ ही दिनों में इसे खारिज कर दिया था। मंत्रालय ने कहा कि वह इस विश्लेषण और इसके निष्कर्षों को “स्वीकार नहीं करता” और इसकी पद्धति को “अनुमान और अवैज्ञानिक” बताया।

मंत्रालय की खास आपत्ति एक नए क्लाइमेट इंडिकेटर को लेकर थी—2050 तक अनुमानित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन। मंत्रालय के मुताबिक यह इंडिकेटर सिर्फ दस साल के एक साधारण औसत पर आधारित था, न कि रिन्यूएबल एनर्जी, कार्बन सिंक और एफिशिएंसी में हो रहे सुधार को शामिल करने वाले किसी पूरे मॉडल पर।

मंत्रालय ने यह भी कहा था कि ईपीआई भारत के जंगलों और वेटलैंड्स को नज़रअंदाज़ करता है, जो कार्बन सोखते हैं, साथ ही देश के ऐतिहासिक रूप से कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को भी अनदेखा करता है।

उस वक्त ईपीआई के प्रमुख वैज्ञानिकों ने भी अपनी बात रखी थी। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट को बताया था कि यह इंडेक्स हमेशा पर्यावरण की मौजूदा स्थिति मापता है, न कि ऐतिहासिक उत्सर्जन या नीतिगत मंशा को। सदस्यों ने कहा था कि उनकी टीम भविष्य के संस्करणों को बेहतर बनाने के लिए मंत्रालय के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।

A worker cuts down a tree trunk with a chainsaw. Photo: Ground Report
भोपाल के पास एक मज़दूर चेनसॉ से पेड़ का तना काट रहा है | फ़ोटो: पल्लव जैन

अब तक केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 2026 की रैंकिंग पर कोई नया बयान जारी नहीं किया है।

वेंडलिंग ने बताया कि ईपीआई ने पुराने डेटा को दोबारा जांचने के लिए नए स्कोरिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया और उसकी तुलना मौजूदा संस्करण से की। इस तुलना से पता चलता है कि भारत की पर्यावरणीय स्थिति में सुधार हुआ है, भले ही उसकी कुल रैंकिंग अब भी नीचे है।

वेंडलिंग ने ईमेल पर ग्राउंड रिपोर्ट को बताया, “कार्बन डाइऑक्साइड और कुछ दूसरी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अब भी बहुत ज़्यादा है और बढ़ भी रहा है, लेकिन जिस रफ्तार से यह पहले बढ़ रहा था, उतनी तेज़ी से अब नहीं बढ़ रहा।”

पांडे ने आगाह किया कि ईपीआई के साल-दर-साल स्कोर में होने वाले उतार-चढ़ाव को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। उनके मुताबिक कुल रैंकिंग के बजाय भारत के अलग-अलग इंडिकेटर पर मिलने वाले स्कोर को ट्रैक करना ज़्यादा उपयोगी है।

धारा कहते हैं, “किसी भी इंडेक्स को अंतिम सच नहीं माना जाना चाहिए। भारत ईपीआई जैसे इंडेक्स पर अपने कमज़ोर प्रदर्शन के आधार पर यह मान सकता है कि उसे अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की दिशा बदलनी होगी, और साथ ही सीसीपीआई जैसे फेयरनेस-आधारित इंडेक्स पर अपने बेहतर प्रदर्शन के आधार पर क्लाइमेट फाइनेंस पर अपने हक का दावा भी कर सकता है।”


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  • Wahid Bhat is an environmental journalist with a focus on extreme weather events and lightning. He reports on severe weather incidents such as floods, heatwaves, cloudbursts, and lightning strikes, highlighting their growing frequency and impact on communities.

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