सविता देवी शादी के पांच-छह साल बाद वह मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के सिंहपुर गांव आई थीं। उनके घर के बगल में ईंट और सीमेंट से बना एक सोख्ता गड्ढा है। इसे उन्होंने इसी साल बनाया है।
“जितना भी पानी बचता है, वह सीधे जमीन में चला जाता है,” वह कहती हैं। इस गड्ढे में उनके रसोईघर और बर्तन धोने से निकलने वाला पानी जाता है। पहले यह पानी आंगन में बहता रहता था।
ऐसे सोख्ता गड्ढे डिंडोरी में बड़ी संख्या में बनाए गए हैं। केंद्र सरकार के जल संचय जन भागीदारी अभियान के तहत डिंडोरी में 8,27,684 जल संरक्षण कार्य दर्ज किए गए हैं। इनमें से 8,03,979 काम पूरे हो चुके हैं, जबकि 23,705 अभी चल रहे हैं। जिला देश में तीसरे स्थान पर है।
लेकिन सविता जैसे गड्ढों से वास्तव में भूजल स्तर बढ़ रहा है या नहीं, इस सवाल का जवाब देना ज्यादा मुश्किल है।
पैसे नहीं, श्रम

सविता देवी बताती हैं कि सरपंच और पंचायत सचिव ने उन्हें बताया था कि गड्ढा कितना चौड़ा और कितना गहरा खोदना है। घर बनाने के बाद बची हुई ईंट और सीमेंट से उन्होंने इसे बनाया। इसमें उनका लगभग कोई खर्च नहीं आया। उनके पास बोरवेल नहीं है और उन्हें यह भी नहीं पता कि जमीन के अंदर पानी कितनी गहराई पर है। जब उनसे पूछा गया कि क्या इस गड्ढे से उन्हें कोई फायदा हुआ है, तो उन्होंने कहा, “अभी तो नहीं।” हालांकि, अब उनके आंगन में पानी जमा नहीं होता और वहां मच्छर भी नहीं पनपते।
कलेक्टर अंजु पवन भदौरिया के मुताबिक, घरों में बनाए गए इन गड्ढों पर सरकार का लगभग कोई खर्च नहीं हुआ। उनके कार्यालय ने स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं, आशा और एएनएम कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और पंचायत कर्मचारियों को इस काम से जोड़ा। उन्हें लोगों को एक आसान तरीका समझाना था। करीब तीन फीट गहरा गड्ढा, जिसमें पत्थरों की परत हो, पानी को बाहर बहने से रोकता है और धीरे-धीरे जमीन में पानी पहुंचाने में मदद करता है। उनके मुताबिक, सरकारी पैसा मुख्य रूप से बड़े कामों पर खर्च किया गया, जैसे स्कूलों, छात्रावासों और स्वास्थ्य केंद्रों में बारिश का पानी जमा करने की व्यवस्था।
सरपंच दीपचंद पूसाम कहते हैं कि इसकी जरूरत साफ थी। हर गर्मी में गांव के नाले और छोटी नदियां सूख जाती थीं। हैंडपंप और कुएं भी सूख जाते थे। पंचायत ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के पैसे और लोगों के सामुदायिक श्रम से गांव के तालाब का भी विस्तार किया, जो अब करीब छह एकड़ में है। वह गांव के आसपास बने कई छोटे स्टॉप डैम की ओर भी इशारा करते हैं। उनके मुताबिक, अब ये डैम सूखे रबी के मौसम में खेतों की सिंचाई में मदद करते हैं।
कठोर चट्टानों वाला इलाका

सामान्य साल में डिंडोरी में बारिश की कमी नहीं होती। समस्या यह है कि बारिश के पानी को रोककर रखने की जगहें कम हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की सितंबर 2022 में तैयार जिले की एक्विफर योजना में इसकी वजह बताई गई है।
योजना के मुताबिक, जिले का लगभग पूरा हिस्सा बेसाल्ट चट्टानों से बना है। बेसाल्ट में पानी तभी जमा होता है, जब चट्टानें मौसम के असर से कमजोर हो जाएं या उनमें दरारें और जोड़ बन जाएं। जिले की ऊपरी भूजल परत मौसम से प्रभावित बेसाल्ट की है, जो करीब 30 मीटर की गहराई तक है। इसके नीचे 30 से 200 मीटर की गहराई के बीच दरारों वाली बेसाल्ट चट्टान की परत है।
योजना दस्तावेज के अनुसार गर्मियों में कुओं से मिलने वाले पानी की मात्रा तेजी से घट जाती है और पूरे जिले में भूजल मिलने की संभावना कम है।
मानसून के बाद भूजल स्तर भी जमीन की सतह के काफी करीब आ जाता है। नवंबर 2021 में 14 निगरानी कुओं में भूजल स्तर जमीन से 0.5 से 9.35 मीटर नीचे दर्ज किया गया था। जिले के ज्यादातर हिस्सों में यह स्तर 2 से 5 मीटर के बीच था।
CGWB गंदे पानी के बारे में क्या कहता है
भूजल रिचार्ज पर CGWB की 2025 की गाइड भूजल रिचार्ज और गंदे पानी के निपटान के बीच स्पष्ट अंतर करती है। इसमें कहा गया है कि किसी रिचार्ज संरचना में जाने वाले पानी को अशुद्धियों और प्रदूषकों को हटाने के लिए फिल्टर किया जाना चाहिए। गाइड यह भी कहती है कि “रसोई और शौचालय से निकलने वाले गंदे पानी” का इस्तेमाल भूजल रिचार्ज के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके अनुसार, ऐसा पानी भूजल को प्रदूषित कर सकता है और स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। गाइड यह सलाह भी देती है कि रिचार्ज पिट और कुओं को सेप्टिक टैंक, सोख्ता गड्ढों और अन्य प्रदूषित जगहों से दूर रखा जाए। साथ ही, प्रदूषित पानी को इनमें जाने से रोकने की व्यवस्था होनी चाहिए।
डिंडोरी में चलाए गए अभियान का जोर घरेलू पानी के प्रबंधन पर था। कलेक्टर भदौरिया के मुताबिक, लोगों से बर्तन धोने और नहाने से निकलने वाले पानी के लिए सोख्ता या रिचार्ज पिट बनाने को कहा गया था। सविता देवी के घर का गड्ढा रसोई और बर्तन धोने से निकलने वाला पानी लेता है।
राष्ट्रीय स्तर की गाइड भूजल प्रदूषण के जोखिम की ओर इशारा करती है, जबकि डिंडोरी में भूजल स्तर कई जगह जमीन के काफी करीब है और हजारों नए गड्ढे बनाए गए हैं, जिनमें से घरों का अपशिष्ट जल जा रहा है।
तकनीक तय करती है असर
डॉ. सुनील चतुर्वेदी विभावरी के निदेशक और हाइड्रोलॉजिस्ट हैं। उनका कहना है कि डिंडोरी में बनाई गई कई जल संरचनाएं सतह पर बहने वाले पानी को कम कर सकती हैं और मिट्टी में नमी बढ़ा सकती हैं। लेकिन भूजल पर इनका असर तकनीक और स्थानीय भूगर्भीय स्थिति पर निर्भर करता है।
घरों में बनाए गए गड्ढों को लेकर वह सावधानी बरतते हैं। उनके मुताबिक, इनका तत्काल काम घर से निकलने वाले पानी को खुले में बहने से रोकना है। वह कहते हैं, “सतह पर बहने वाला पानी (सरफेस रनऑफ़) कम होगा। आपने उतना पानी चार फीट जमीन के अंदर पहुंचा दिया है।” इससे मिट्टी में नमी बढ़ सकती है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पानी भूजल स्तर तक पहुंच गया है।
वह यह भी कहते हैं कि सिर्फ जल संरचनाएं बनाना काफी नहीं है। अगर स्टॉप डैम और तालाब बनने के बाद खेती में पानी का इस्तेमाल बढ़ जाता है, तो इससे मिलने वाला फायदा कम हो सकता है। उनके मुताबिक, घरेलू पानी के प्रबंधन के साथ कम पानी वाली सिंचाई तकनीकों, जैसे स्प्रिंकलर और ड्रिप, को भी अपनाना चाहिए।
अगले चरण से पहले तकनीकी मार्गदर्शन
अभियान का राज्य स्तर का चरण अब खत्म हो चुका है। भदौरिया के मुताबिक, जल संचय जन भागीदारी 3.0 के तहत काम जारी रहेगा। नई जल संरचनाएं बनाई जाएंगी और पुरानी संरचनाओं की मरम्मत की जाएगी।
सिंहपुर राज्य सरकार के अगले चरण का इंतजार नहीं करना चाहता। पंचायत सचिव गणेश कुमार यादव कहते हैं कि अगर सरकारी फंड कम हुआ, तो पंचायत घर और पानी के टैक्स से पैसा जुटाने की कोशिश करेगी। इसके लिए ग्राम सभा में प्रस्ताव भी पास किया जाएगा। पूसाम कहते हैं कि लोगों ने अपने श्रम और उपलब्ध सामग्री से घरों में गड्ढे बनाए हैं, इसलिए अभियान खत्म होने के बाद भी यह काम जारी रह सकता है।
यही इस मॉडल की ताकत है। लेकिन यही वजह है कि तकनीकी मार्गदर्शन भी जरूरी हो जाता है। जब परिवार अपने पैसे और श्रम से गड्ढे बनाते हैं, तो ऐसे गड्ढों की संख्या आधिकारिक निगरानी के दायरे से बाहर भी बढ़ सकती है। CGWB की गाइड पहले से ही कुछ बुनियादी बातें बताती है: गड्ढे में जाने वाले पानी को फिल्टर किया जाए, रसोई और शौचालय के गंदे पानी को भूजल रिचार्ज के लिए इस्तेमाल न किया जाए और गड्ढों को सेप्टिक टैंक से दूर रखा जाए।
ग्रामीणों ने श्रम और सामग्री उपलब्ध करा दी है। लेकिन क्या उन्हें यह तकनीकी जानकारी भी दी गई है? अगले चरण के सामने यही सवाल है।
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