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कम बारिश के बावजूद क्यों बाढ़ में डूब गया रीवा?

विशेषज्ञों के मुताबिक, नदी के फ्लडप्लेन और रिवर बेड में निर्माण, बदलता भूमि उपयोग और नदियों की पानी ले जाने की क्षमता इस स्थिति को समझने में अहम हैं।
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मानसून के मौसम में किसी इलाके में बारिश सामान्य से कम होने पर भी वहां बाढ़ आ सकती है। रीवा में हाल की स्थिति इसका एक उदाहरण है। 

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के 24 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक, जिले में 1 जून से 24 अगस्त के बीच 508.4 मिमी बारिश दर्ज हुई, जबकि इस अवधि में सामान्य बारिश 726.5 मिमी है। यानी बारिश सामान्य से 30 फीसदी कम रही। पूर्वी मध्य प्रदेश में भी कुल बारिश सामान्य से छह फीसदी कम थी।

इसके बावजूद पिछले दिनों हुई तेज बारिश के बाद रीवा में कई इलाकों में पानी भर गया और जिले के कई हिस्से बाढ़ से प्रभावित हुए।

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टाइम्स ऑफ इंडिया की 22 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, तीन दिनों की भारी बारिश के बाद रीवा जिले के करीब 250 गांव प्रभावित हुए और करीब 5,000 घरों पर असर पड़ा। रिपोर्ट में रीवा कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी के हवाले से बताया गया कि आसपास के बांधों से छोड़ा गया पानी भी बाढ़ की स्थिति को बढ़ाने वाला रहा। 

बीहर, नैना और सरसी नदियां उफान पर थीं और उनका पानी टमस नदी तक पहुंच रहा था। बाणसागर बांध के बैकवाटर और टमस के पानी से रीवा शहर के कुछ हिस्से भी प्रभावित हुए।

यह स्थिति सवाल उठाती है कि जब पूरे मानसून की बारिश सामान्य से कम है, तब कुछ घंटों की तेज बारिश शहर में इतना पानी क्यों जमा कर देती है। 

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बाढ़ के बाद रीवा की सड़कों पर लौटते लोग। फोटो: लवकुश पांडेय

नदी की क्षमता और फ्लडप्लेन 

दिल्ली बायोडायवर्सिटी पार्क के वैज्ञानिक फैय्याज अहमद खुदसर के मुताबिक, बारिश के पानी को आगे ले जाने में नदियों की अहम भूमिका होती है।

उनका कहना है, “बारिश का पानी अंततः नदियों के जरिए समुद्र तक पहुंचता है। अगर नदी का पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो जाए और नदी अपनी क्षमता के मुताबिक पानी नहीं ले पाए, तो बारिश के बाद बाढ़ की स्थिति बन सकती है।”

खुदसर के अनुसार नदी को केवल बहते पानी की धारा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। नदी में फ्लोइंग चैनल या वाटर वे के अलावा राइपेरियन जोन और फ्लड प्लेन जैसे हिस्से होते हैं। 

राइपेरियन जोन वह क्षेत्र है जहां पानी का स्तर ऊपर-नीचे होता रहता है, जबकि फ्लड प्लेन नदी के विस्तार का क्षेत्र होता है। इसके बाद एम्बैंकमेंट या ऊंचा हिस्सा आता है।

खुदसर के मुताबिक फ्लड प्लेन तक के हिस्से में निर्माण नहीं होना चाहिए। 

उनके अनुसार, “इन क्षेत्रों में ग्रासलैंड और वेटलैंड विकसित या पुनर्स्थापित किए जा सकते हैं। फ्लड प्लेन, रिवर बेड या नदी के दूसरे हिस्सों में निर्माण होने से नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की पानी संभालने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।”

ख़ुदसर ने कहा कि अगर अतिरिक्त पानी को नदी अपनी बड़ी नदियों तक ले जाने में सक्षम नहीं रहती, तो फ्लैश फ्लड की स्थिति बनना स्वाभाविक है।

बीहर नदी के किनारे बदलता रीवा 

रीवा में बीहर नदी के तट पर बने रीवा ईको पार्क का मामला इसी संदर्भ में सामने आता है। यह स्थायी प्रकृति का निर्माण है और नदी के फ्लडप्लेन के 50 मीटर के दायरे में हुआ है। 

बीहर नदी के बाढ़ क्षेत्र में दिखाई देता निर्माण कार्य। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

इस निर्माण से जुड़ी जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करने वाले अमित सिंह बघेल ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा था, “यह निर्माण नहीं होना चाहिए था। यह ईको पार्क हर प्रमुख बाढ़ में डूब जाता है।” 

हाल की बाढ़ में ईको पार्क के डूबने के बाद यह मामला फिर चर्चा में है।

बाढ़ के बाद रीवा ईको पार्क का दृश्य। फोटो: लवकुश पांडेय

पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. मुकेश यंगल के मुताबिक, बीहर रीवा की प्रमुख नदियों में से एक है। उनके अनुसार बाणसागर बांध से सोन नदी का पानी नहर के जरिए बीहर में लाया जाता है। यह नदी रीवा शहर से होकर आगे बढ़ती है और चचाई के पास पानी का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है।

यंगल का कहना है, “पिछले दशकों में रीवा की आबादी बढ़ने के साथ शहर में जमीन का इस्तेमाल भी बदला है। पहले जिन इलाकों में तालाब और बाग थे, वहां अब मकान और कॉलोनियां हैं।” 

उन्होंने तालाबों और नदी के किनारों पर अतिक्रमण का भी जिक्र किया। 

उनके अनुसार बीहर के दोनों किनारों पर बस्तियां बढ़ने से नदी के फैलने की जगह कम हुई है। यंगल ने कहा कि रीवा में पिछले 30 वर्षों में तीन बड़ी बाढ़ की घटनाएं हुई हैं और नदी किनारे बने घर प्रभावित हुए हैं। 

उनके मुताबिक, “जिले में कभी बड़ी संख्या में तालाब थे, लेकिन कई तालाबों के आसपास अब कॉलोनियां और दूसरे निर्माण हो गए हैं।” 

रीवा में इस बार की स्थिति यह दिखाती है कि बाढ़ को केवल पूरे मानसून में हुई बारिश की मात्रा से नहीं समझा जा सकता। 

जिले में मौसमी बारिश सामान्य से कम रही, लेकिन कम अवधि में हुई भारी बारिश, नदियों में बढ़े जलस्तर और बांधों से छोड़े गए पानी के साथ शहर के कई हिस्सों में जलभराव और बाढ़ की स्थिति बनी। विशेषज्ञों के मुताबिक, नदी के फ्लडप्लेन, रिवर बेड और आसपास के क्षेत्रों में भूमि उपयोग और निर्माण भी इस स्थिति को समझने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

बैनर इमेज: भारी बारिश के बाद रीवा के कई इलाकों में जलभराव, सड़कें और रिहायशी क्षेत्र पानी में डूबे। फोटो: लवकुश पांडेय


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