अगस्त के दूसरे हफ्ते में उज्जैन में भीड़ बढ़ चुकी थी। यह सावन का महीना था। हिन्दू धर्म को मानने वाले श्रद्धालु इस दौरान शिवलिंग के दर्शन के लिए यहां आते हैं। कमरी मार्ग शहर का पुराना बाज़ार है। फ़ोटो फ्रेम, मोटर मैकेनिक, कपड़े, और अन्य दुकानों की एक लाइन के बीच बाकिर अली रंगवाला, 71, रहते हैं। नीले चेक शर्ट और काले पैंट में वो मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
उनके साथ खाकी वर्दी में एक गार्ड था जिसकी नज़र मेरे ट्राईपौड बैग को देख रही थी। वह मुझसे बैग के अंदर के सामान के बारे में पूछे उससे पहले ही रंगवाला ने उन्हें मेरा परिचय बताया। इसके बाद एक संकरी सी लिफ्ट जिसमें केवल 2 लोग ही खड़े हो सकते थे, से हम चौथी मंजिल पर पहुंच गए।
ये रंगवाला का घर है। उनके ड्राइंगरूम के किनारे कई बैग्स और अटैचियां रखी हुई थीं। सभी में कागज़ भरे हुए थे। ये दो दशकों में उनके द्वारा लगाई गई याचिकाओं की कॉपी हैं। “अभी एक कमरे भर की याचिकाएं मेरे ऑफिस में भी हैं।” कांपते हुए हाथों से कुछ कागज़ अलग करते हुए उन्होंने कहा।
23 जनवरी, 2026 को रंगवाला की एक याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने शहर के गोवर्धन सागर तालाब के सुधार के लिए कलेक्टर और नगर निगम को मिशन मोड में कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इसी याचिका के चलते 8 दिसंबर, 2025 को उज्जैन शहर के तहसीलदार और जिले के लैंड रिकॉर्ड्स के सुपरिटेंडेंट के डायरेक्शन में, मॉडर्न सर्वे टेक्नीक का इस्तेमाल करके तालाब का नया सीमांकन किया गया।
यह अकेला मामला नहीं है। रंगवाला दो दशक से भी ज्यादा समय से शिप्रा नदी की सफाई को लेकर कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके अलावा शहर के कई और मसलों को लेकर वो कोर्ट और सरकारी कार्यालयों में पहल करते दिखाई देंगे।
रंगवाला ने कहा कि वो कुछ भी गलत होते नहीं देख सकते, इसलिए ‘न्याय’ के लिए लड़ते हैं। उनके दोस्त मानते हैं कि रंगवाला प्रशासन और लोगों के बीच एक ब्रिज है। अगर कोई भी परेशान है और नहीं जानता कि उसे कहां शिकायत करनी चाहिए, तो रंगवाला के पास आता है।

चुनाव की शिकायत से शुरू हुआ सफर
अपने एक्टिविज्म की शुरुआत को याद करते हुए वो कहते हैं, “1994 में उज्जैन नगर निगम चुनाव में हमारे वार्ड में ओबीसी आरक्षण लागू किया गया जबकि वार्ड में सबसे ज्यादा सामान्य श्रेणी के लोग थे।” इस पर उन्होंने वार्ड में वोटरों का सर्वे दोबारा करवाने की मांग की और तब वोटर लिस्ट में गड़बड़ियां भी सामने आईं। इसके बाद वो नगर निगम के अलग-अलग मामलों को लेकर पत्राचार और कोर्ट केस के ज़रिए अपनी आवाज़ उठाते रहे।
1979 में एमएससी गणित की पढ़ाई करने के बाद रंगवाला ने सीएसआईआर की फेलोशिप के साथ विक्रम यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए दाखिला लिया। हालांकि बाद में वो पारिवारिक कारणों से व्यापार के क्षेत्र में आ गए।
रंगवाला बोहरा मुस्लिम समुदाय से आते हैं। मूल रूप से गुजरात से ताल्लुक रखने वाला यह समुदाय शिया इस्माइली मुस्लिमों का एक सेक्ट (sect) है। रंगवाला ने कहा, “हमारे समुदाय के लोग मुख्य रूप से व्यापार को ही पेशे की तरह चुनते हैं।”
फिर रंगवाला पीएचडी शोधार्थी से कंस्ट्रक्शन व्यापार के मालिक हो गए। मैंने उनसे पूछा कि क्या व्यापार करते हुए सरकार के खिलाफ कोर्ट में लड़ने में दिक्कत नहीं जाती? उन्होंने जवाब दिया, “जाती है, मगर मैं अपने कागज़ पुख्ता रखता हूं।”
शिप्रा के लिए न्यायिक लड़ाई
1999 में उनके कुछ पहचान के लोग उज्जैन आए हुए थे। उन्हें शिप्रा नदी में नहाकर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करना था। हिन्दू शैव दर्शन के अनुसार यह देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक और अकेला दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है।
रंगवाला ने बताया, “स्नान के लिए हम राजघाट गए। मैं कपड़े लेकर घाट पर ही खड़ा था। नदी का पानी गंदा और काला था। इसे देखकर मुझे लगा कि ये आस्था और उज्जैन के लोगों के साथ गलत हो रहा है।”
इसके बाद उन्होंने शिप्रा साफ करने के लिए याचिका दायर की। चूंकि उस वक़्त तक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल नहीं था, इसलिए यह याचिका मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में लगाई गई।

“हमने 3 मुद्दे उठाए: पहला 14 गंदे नालों का शिप्रा में मिलने से रोकना क्योंकि इनसे शहर का मल-मूत्र और कचरा शिप्रा में मिलता था। दूसरा शहर के कचरे का निपटारा सही तरीके से हो ताकि वो नदी में न मिले। तीसरा नदी के किनारे बने ईंट भट्टे। इनसे नदी न सिर्फ प्रदूषित हो रही थी बल्कि किनारे की मिट्टी निकालने के कारण कटाव भी बढ़ रहा था।”
उज्जैन से 54 किमी दूर इंदौर शहर में ही हाई कोर्ट की अन्य बेंच है।
“हम दोनों रोज़ बस लेकर इंदौर जाते थे। वहां बाकिर भाई वकीलों से मिलते और एक-एक मामले के दस्तावेज पढ़ते। हम अक्सर रात में देर से घर पहुंचते थे,” निलेश जैन ने बताया।
जैन, 47, ने बीकॉम तक पढ़ाई की है। उनके पिता का हाउसिंग बोर्ड के साथ पैसों को लेकर विवाद चल रहा था। इसे सुलझाने के सिलसिले में जैन की मुलाकात रंगवाला से हुई, जिन्हें वह ‘बाकिर भाई’ कहते हैं। बाद में जैन भी रंगवाला के साथ काम करने लगे।
शिप्रा नदी की सफाई को लेकर उज्जैन नगर निगम ने 2002 तक पर्याप्त सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और सफाई की अन्य व्यवस्था करने के लिए कहा। हाई कोर्ट ने प्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इसकी मॉनिटरिंग की ज़िम्मेदारी सौंपते हुए जुलाई 2002 में केस बंद कर दिया।
हालांकि शिप्रा के किनारे ईंट भट्टे फिर भी चालू थे। जैन कहते हैं कि ‘बाकिर भाई’ जब तक किसी भी मामले को हल नहीं कर लेते, उसे छोड़ते नहीं हैं। 2006 में उन्होंने नदी किनारे चल रहे ईंट भत्तों के खिलाफ फिर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
याचिका में कहा गया कि नदी किनारे 50 मी के दायरे में संचालित ईंट भट्टों द्वारा बिना किसी वैध अनुमति के मिट्टी निकाली जा रही थी। जबकि मास्टर प्लान के अनुसार नदी के दोनों ओर 200 मी के दायरे को ‘ग्रीन बेल्ट’ घोषित किया गया था।
कोर्ट ने जिला प्रशासन को नदी के 200 मी के और हाइवे के 50 मी के दायरे से सभी भट्टियां हटाने के निर्देश दिए। बाद में प्रशासन ने कोर्ट में कहा कि ये भट्टे हटा दिए गए हैं। मगर इस दावे के खिलाफ रंगवाला ने कोर्ट में तस्वीरें पेश करते हुए कहा कि 75 से ज़्यादा ऐसी भट्टियां फिर भी चल रही थीं।
इनमें से ज़्यादातर तस्वीर जैन ने खींची थीं।

जानलेवा हमला और पारिवारिक विरोध
जैन ने बताया कि इस मामले में हुई कार्रवाई से कई ईंट भट्टे बंद हो गए। इसके बाद कई लोग रंगवाला से रंजिश रखने लगे। इसी क्रम में एक बार उन पर जानलेवा हमला भी हुआ।
2012 की घटना याद करते हुए रंगवाला ने बताया, “मैं छतरी चौक तक फल खरीदने जा रहा था। तभी एक बदमाश बातचीत करते-करते आया और झोले में से दराता निकाला। वो गर्दन उतारता इतनी देर में मैंने उसको धक्का दे दिया। वो नशे में था। मैं जो भागा सीधा थाने गया। (वहां) मैं कुछ बोल भी नहीं पाया।”
कोर्ट के आदेश पर रंगवाला की सुरक्षा में गार्ड तैनात किए गए. अब हर वक़्त एक गार्ड उनके घर के नीचे तैनात रहता है.
इस घटना के बाद रंगवाला के परिवार में भी उनके इस काम का विरोध हुआ। उन्हें केवल मां का ही समर्थन मिला। जबकि तीनों भाइयों ने उनके इस काम की कभी सराहना नहीं की।
मगर उज्जैन के वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत अनजाना उनके प्रशंसक हैं। वो कहते हैं, “बाकिर भाई ने कभी अपने लिए लड़ाई नहीं लड़ी। वो हमेशा शहर के लिए लड़ते हैं। उन्होंने जन हित में आवाज उठाई है और वह कामयाब हुए।”
इसी तरह उज्जैन नगर निगम में एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त में हमें बताया कि वो कई बार रंगवाला को महत्वपूर्ण कागज़ उपलब्ध करवा चुके हैं। इसका कारण पूछने पर उन्होंने कहा, “बाकिर भाई अपने फायदे के लिए इनका इस्तेमाल नहीं करते। वो शिप्रा और तालाबों के लिए काम कर रहे हैं। हमारी भी शिप्रा में श्रद्धा है.”

भले ही रंगवाला के लिए शिप्रा के किनारे से ईंट भट्टे हटवाना सबसे कठिन काम रहा हो मगर वो इसे ही अपनी करियर की सबसे बड़ी सफलता मानते हैं। मगर वह इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि तमाम सरकारी खर्चों के बावजूद शिप्रा अब भी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। उनके मुताबिक, यही रंगवाला के करियर की बड़ी विफलताओं में से एक है।
अनजाना इसे अलग तरीके से देखते हैं, वो कहते हैं कि न्यायिक हस्तक्षेप के बिना ईंट भट्टों का हटना मुमकिन नहीं था क्योंकि इसके पीछे बहुत सारा राजनीतिक दबाव भी होता है।
हालांकि उन्होंने रंगवाला के एक्टिविज्म की सीमाओं को भी रेखांकित किया। मुझसे बात करते हुए अनजाना ने कहा, “कोर्ट में केस जीतने पर नियम का पालन तो हो सकता है मगर जनता के व्यवहार में बदलाव नहीं आता।” उनका मानना है कि शिप्रा को साफ़ करने के लिए लोगों के व्यवहार में बदलाव आना ज़रुरी है।
रंगवाला के दोस्त कहते हैं कि बीते कुछ सालों में उनका सामाजिक जीवन काफी सीमित रह गया है। वह सार्वजनिक आयोजनों में हिस्सा कम लेते हैं। इसका एक कारण उनका उम्रदराज़ होना भी है। मगर वो चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी भी न्याय के लिए लड़ती रहे। वो कहते हैं, “अभी शिप्रा साफ़ होनी बची है, गोवर्धन में भी काम बाकी है।”
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