मध्य प्रदेश सरकार ने रीवा, गुना और देवास जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) का संचालन आउटसोर्स के ज़रिए करने की एक पायलट परियोजना को मंजूरी दी है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में यह फैसला तब लिया गया जब अधिकारियों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों की भारी कमी के आंकड़े पेश किए।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नई व्यवस्था के तहत सरकार दवाइयां और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराती रहेगी। जिस निजी संस्था, ट्रस्ट या संगठन को केंद्र का संचालन दिया जाएगा, वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति करेगा और रोजमर्रा का कामकाज संभालेगा। यह पायलट परियोजना पांच साल तक चलेगी। इसके बाद सरकार इसके परिणामों की समीक्षा करेगी।
पायलट प्रोजेक्ट के तहत शामिल जिले के लोगों से बात करने पर वह मौजूदा चिकित्सा अधोसंरचना में कमियों का ज़िक्र करते हैं। उनका मानना है कि सरकार के फैसले से उनकी जेब से खर्च तो बढ़ेगा मगर सुविधाएं भी बेहतर होंगी।

गोविंदगढ़ की ज़मीनी हकीकत
रीवा जिले के मनीष मिश्रा (28) इस साल पांचवीं बार गोविंदगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आए हैं। उनकी समस्या पूछने पर वो सिर्फ इतना बताते हैं, “त्वचा की समस्या है।” मिश्रा लगभग 30 से 35 किलोमीटर दूर अपने गांव से आए हैं।
एक ओर का 30 रूपए किराया और 40 से 45 मिनट समय लगाकर वो यहां पहुंचे हैं। मिश्रा कहते हैं कि हर गर्मी में उनकी समस्या बढ़ जाती है। डॉक्टर से मिलने के बाद उन्हें कुछ दवाइयां केंद्र से मिलीं और कुछ बाहर से खरीदनी पड़ीं। अस्पताल पहुंचने से लेकर इलाज पूरा होने तक उन्हें करीब डेढ़ घंटा लगा।
वह शिकायत करते हुए कहते हैं कि केंद्र में ठीक तरह की शौचालय और पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं थी। उन्हें इस दौरान कोई महिला डॉक्टर या महिला कर्मचारी नहीं दिखाई दी। उन्होंने कहा कि इस साल पांच बार केंद्र आने के दौरान दो बार ऐसा हुआ जब डॉक्टर मौजूद नहीं थे और उन्हें बिना इलाज के वापस लौटना पड़ा। हालांकि वो यह नहीं जानते कि उनके सीएचसी में मौजूद डॉक्टर त्वचा विशेषज्ञ हैं या फिर सामान्य सर्जन।
मगर पायलट परियोजना के लिए चुने गए 18 केंद्रों में से 5 में एक भी विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों के 95% पद खाली
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सांख्यिकी प्रभाग द्वारा प्रकाशित “हेल्थ डायनेमिक्स ऑफ इंडिया (इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड ह्यूमन रिसोर्सेज) 2023-24″ रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2024 तक मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 327 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कार्यरत थे।
जबकि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025-26 में राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 5,443 स्वीकृत पदों में से केवल 1,495 पद भरे गए हैं। यानी 3,948 पद खाली हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट में सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थिति और गंभीर दिखाई देती है। वर्ष 2024 में ग्रामीण सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 1,308 स्वीकृत पद थे, लेकिन केवल 71 पद भरे हुए थे। यानी 1,237 पद खाली थे। यह लगभग 95 प्रतिशत रिक्ति दर है। राज्य में केवल 6 सर्जन, 41 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 9 फिजिशियन, 15 बाल रोग विशेषज्ञ और 9 एनेस्थेटिस्ट कार्यरत थे।
मेडिकल अफसरों के 700 से अधिक पद खाली
हेल्थ डायनेमिक्स ऑफ इंडिया (इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड ह्यूमन रिसोर्सेज रिपोर्ट के अनुसार 2024 में जनसंख्या के आधार पर मध्य प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 1,442 मेडिकल ऑफिसरों की जरूरत थी। प्रदेश में 2,282 पद स्वीकृत थे मगर केवल 1,547 ही भरे गए यानि 735 पद खाली थे।
कैबिनेट के फैसले पर जारी बयान में मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना है। विभाग ने कहा कि इस फैसले से लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी और छोटी बीमारियों के लिए उन्हें बड़े अस्पतालों में नहीं जाना पड़ेगा।
मगर 2024 में जनसंख्या के आधार पर राज्य को 517 सीएचसी की जरूरत थी। जबकि केवल 327 केंद्र मौजूद थे यानी 190 केंद्रों की कमी। जो कुल आवश्यकता का 37 प्रतिशत है। पीएचसी स्तर पर 628 केंद्रों की कमी थी, जो आवश्यकता का 30 प्रतिशत है। वहीं उप स्वास्थ्य केंद्रों की कमी 2,166 थी, जो कुल आवश्यकता का 17 प्रतिशत है। यानि स्वास्थ्य अधोसंरचना के शुरूआती पायदान पर भी कमियां हैं। ऐसे में केवल सीएचसी स्तर पर किए गए प्रयास कितने कारगर होंगे यह देखना पड़ेगा।

“डॉक्टर की हर वक़्त उपलब्धता हो”
मिश्रा को यह जानकारी नहीं है कि उनके जिले के कुछ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का संचालन आउट सोर्स किया जा रहा है। जब उनसे पूछा गया कि यदि केंद्र का संचालन कोई निजी संस्था करे तो उन्हें कैसा लगेगा? तो उन्होंने कहा कि उनका भरोसा शायद बढ़ेगा।
उन्होंने कहा, “मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि अगर इस केंद्र को किसी निजी संस्था को सौंप दिया जाए, तो मुझे जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, वे काफी हद तक कम हो जाएंगी।”
उन्होंने यह भी कहा कि इलाज महंगा हो सकता है। लेकिन इस बात का भी संतोष है कि सुविधाएं भी बेहतर होंगी।
मगर मिश्रा किस तरह के बदलाव चाहते हैं? इसका जवाब देते हुए वह दो बातों का ज़िक्र करते हैं। पहली, डॉक्टर हर हाल में मौजूद रहें और हर मरीज को तय समय के भीतर देखा जाए। दूसरी, मरीजों के लिए बेहतर प्रतीक्षा कक्ष हो, जहां ज्यादा भीड़ न हो।
उनका मानना है कि केंद्र में रात के समय भी डॉक्टर उपलब्ध होने चाहिए।
आंकड़े और मनीष का अनुभव एक ही तस्वीर दिखाते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद बड़े पैमाने पर खाली हैं और राज्य के अपने आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। इन केंद्रों पर निर्भर मरीज डॉक्टरों की अनुपस्थिति, लंबे इंतजार और बुनियादी सुविधाओं की कमी की बात करते हैं, जो इन आंकड़ों से मेल खाती है।
अब सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य केंद्रों का संचालन निजी संस्थाओं को सौंपने से यह कमी दूर होगी, या फिर सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं पर नियंत्रण करने वाला पक्ष बदल जाएगा। इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए यह पांच साल की पायलट परियोजना शुरू की गई है। सरकार का कहना है कि योजना का मूल्यांकन होगा और अच्छे परिणाम मिले तो अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी ‘आउटसोर्स’ कर दिए जाएंगे।
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