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उत्तराखंड में पहला ग्लेशियल लेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम

ग्लेशियर लेक के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम से लेकर महाराष्ट्र में कपास के उत्पादन तक जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें

कम मानसून के कारण खाद्यान्न लक्ष्य में कमी, महंगी कैंसर दवाओं पर कोर्ट सख्त, एक महीने में 11% महंगी हुई दाल, भोपाल नगर निगम पर 2 करोड़ का जुर्माना। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।


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मुख्य सुर्खियां

केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 373.93 मिलियन टन तय किया है, जो 2025-26 के अनुमानित उत्पादन से कम है। सरकार ने यह लक्ष्य अल नीनो, कम बारिश और जल उपलब्धता को ध्यान में रखकर तय किया है। इस साल देश में बारिश की कमी करीब 12% बताई गई है और खरीफ में धान, मक्का, सोयाबीन व कपास के रकबे में कुछ कमी आई है। 


सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों द्वारा कैंसर की दवाओं पर 10 गुना तक मार्जिन वसूलने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे “साफ-साफ कत्लेआम” कहा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि सभी दवाओं पर एक समान 16% मार्जिन तय करने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता?

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त्योहारों की मांग और अल नीनो के कारण मानसून में कमी से दालों के दाम एक महीने में 11% तक बढ़ गए हैं। कर्नाटक और महाराष्ट्र के बड़े हिस्सों में सूखे के असर के अलावा ऑस्ट्रेलिया से चने के कम आयात और यूक्रेन युद्ध के कारण रूस से पीली मटर की कम आपूर्ति को भी इसका कारण बताया गया है।


महाराष्ट्र के जलगांव (खानदेश) जिले में लंबे सूखे के कारण वर्षा आधारित (rain-fed) कपास उत्पादन में 50% से 60% तक की भारी गिरावट का अनुमान है। कम कीमतों के कारण किसानों ने खेती का रकबा सामान्य 5.5 लाख हेक्टेयर से घटाकर 4.35 लाख हेक्टेयर कर दिया था, और अब उत्पादन घटकर केवल 8 से 9 लाख गांठ (bales) रहने की संभावना है।


वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण से म.प्र. वन विभाग और एसटीएसएफ (STSF) अधिकारियों ने शिवपुरी में तेंदुए के शिकार और खाल तस्करी मामले में 9 घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की। सत्यनारायण ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए अपने संगठन को निर्दोष बताया और इस मामले को किसी साजिश या गलतफहमी का परिणाम करार दिया।

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भोपाल के छोटे तालाब में 37 नालों के माध्यम से रोजाना लगभग 80 लाख लीटर अनउपचारित सीवेज गिर रहा है, जिसके लिए म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नगर निगम पर ₹2.10 करोड़ की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का आकलन किया है। नगर निगम ने NGT को बताया कि 10 MLD क्षमता का नया STP ₹25.08 करोड़ की लागत से 31 दिसंबर 2027 तक तैयार किया जाएगा।

विस्तृत चर्चा

उत्तराखंड में पहली ग्लेशियल लेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (EWS) चमोली की वसुंधरा ताल में स्थापित किया जा रहा है। इसके बारे में विस्तार से बता रहे हैं अब्दुल वसीम अंसारी।

ग्लेशियर झीलों की बढ़ेगी निगरानी

हाल ही में नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद उत्तराखंड सरकार ने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य अब खतरनाक ग्लेशियर झीलों (Glacial Lakes) की सिर्फ मैपिंग करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी लाइव यानी रियल-टाइम मॉनिटरिंग शुरू करने जा रहा है।

इसके तहत उत्तराखंड का पहला ‘ग्लेशियर लेक अर्ली-वार्निंग सिस्टम’ चमोली जिले की वसुंधरा ताल झील पर लगाया जा रहा है।

वैज्ञानिकों की टीम रवाना 

इस सिस्टम को इंस्टॉल करने के लिए रुड़की के CBRI और देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम मंगलवार को रवाना हो चुकी है।

यह पूरा अभियान 29 सितंबर से 15 अक्टूबर तक चलेगा, जिसमें हमारी SDRF, NDRF और ITBP के जवान सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स का पूरा सहयोग दे रहे हैं। राज्य के मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने खुद इस टीम को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया है।

अगर हम इस झील को चुने जाने की वजह समझें, तो नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) ने उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों को ‘हाई-रिस्क’ यानी अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा है। इनमें से 5 झीलों को सबसे खतरनाक यानी ‘कैटेगरी A’ में डाला गया है, और चमोली का यह वसुंधरा ताल उन्हीं में से एक है। वैज्ञानिकों ने यहां पानी की गहराई और क्षमता को मापने के लिए बाथमेट्रिक सर्वे पहले ही पूरा कर लिया है।

क्या काम करेगा सिस्टम?

अब बात करते हैं कि वसुंधरा ताल में लगने वाला यह सिस्टम आखिर काम क्या करेगा। यह एक बेहद आधुनिक और ऑल-इन-वन मॉनिटरिंग सिस्टम है जो कई चीज़ों को एक साथ ट्रैक करेगा

इसमें लगा वॉटर-लेवल सेंसर पानी के स्तर में होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव को रिकॉर्ड करेगा।

एक ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन वहां के तापमान, बारिश, हवा की गति और नमी पर लगातार नज़र रखेगा।

साथ ही, बर्फ की मोटाई और सब-सरफेस (सतह के नीचे) तापमान को मापने के लिए भी सेंसर लगाए जा रहे हैं।

इतना ही नहीं, वहां ज़मीन की हलचल और वाइब्रेशन को पकड़ने के लिए टिल्ट और एक्सेलेरोमीटर सेंसर लगाए जा रहे हैं ताकि हिमस्खलन या भूस्खलन का तुरंत पता चल सके।

सोलर एनर्जी से चलेगा सिस्टम

चूंकि यह इलाका बेहद सुदूर और ऊंचाई पर है जहां सामान्य मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करते, इसलिए इस पूरे सिस्टम को सोलर एनर्जी से चलाया जाएगा और सारा डेटा सैटेलाइट के माध्यम से सीधे देहरादून के आपदा प्रबंधन मुख्यालय भेजा जाएगा। जैसे ही कोई भी रीडिंग तय सीमा को पार करेगी, सिस्टम तुरंत अलर्ट (चेतावनी) जनरेट कर देगा।

आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन का कहना है कि सरकार का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक डेटा के आधार पर जोखिमों की पहचान करना है, ताकि नीचे बसे गांवों, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, सड़कों और पुलों को ग्लेशियर फटने (GLOF) से होने वाले नुकसान से बचाया जा सके और समय रहते लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके। 

ग्राउंड रिपोर्ट की बात

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We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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