पश्चिम एशिया संकट से भोजन के लिए संघर्ष कर रहे श्रमिक, यमुना के प्रवाह के लिए 500 करोड़ का प्रोजेक्ट, मुंबई में मैंग्रोव की कटाई से बाढ़ का डर, युद्ध के चलते भारत का चावल निर्यात गिरा। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
पश्चिम एशिया में तनाव और ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारत के सबसे बड़े कंटेनर पोर्ट पर भी दिखाई दिया। एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल के कारण बंदरगाह से जुड़े परिवहन और लॉजिस्टिक्स संचालन प्रभावित हुए। कई ट्रक चालक और श्रमिकों को काम में रुकावट झेलनी पड़ी, जबकि कुछ परिवारों को दो-दो दिन तक भोजन के लिए संघर्ष करना पड़ा।
दिल्ली जल बोर्ड ने यमुना नदी में पर्यावरणीय प्रवाह बढ़ाने के लिए 500 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना शुरू की है। इसके तहत प्रतिदिन 318 मिलियन लीटर उच्च गुणवत्ता वाला उपचारित अपशिष्ट जल यमुना में छोड़ा जाएगा।
कर्नाटक सरकार ने केंद्र से लंबित सिंचाई और पेयजल परियोजनाओं को जल्द मंजूरी देने की अपील की है। उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा कि राज्य के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट, जिनमें मेकेदातु जलाशय और अन्य नदी बेसिन परियोजनाएं शामिल हैं, लंबे समय से स्वीकृति का इंतजार कर रही हैं।
मुंबई में कोस्टल रोड नॉर्थ प्रोजेक्ट के लिए बीएमसी द्वारा मैंग्रोव की कटाई शुरू करने से चारकोप के निवासियों में मानसून के दौरान बाढ़ आने का डर पैदा हो गया है। इस परियोजना से 103.65 हेक्टेयर भूमि पर फैले 45,000 से अधिक मैंग्रोव प्रभावित होंगे, जिसमें से चारकोप सेक्टर 8 में निर्धारित सीमा के भीतर 60% मैंग्रोव पहले ही हटाए जा चुके हैं।
भोपाल नगर निगम (BMC) ने मानसून पूर्व बारिश को देखते हुए फतेहगढ़ में एक राउंड-द-क्लॉक फ्लड कंट्रोल रूम स्थापित किया है। 15 जून से 15 जुलाई तक 186 नोडल अधिकारी 10 जलजमाव वाले क्षेत्रों और कोलार नदी एवं कलियासोत बांध के पास के 19 गांवों की निगरानी करेंगे।
मौसम विभाग ने मध्य प्रदेश के 30 जिलों (जैसे उज्जैन, भोपाल, इंदौर) में तेज हवाओं और बारिश के लिए ‘येलो अलर्ट’ और सीहोर, राजगढ़ जैसे जिलों के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी किया है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले 48 से 72 घंटों के भीतर मानसून राज्य में दस्तक दे सकता है, जिससे भीषण गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद है।
विस्तृत चर्चा
निर्यात में गिरावट और पश्चिम एशिया का संकट
भारत के कृषि निर्यात के सबसे महत्वपूर्ण उत्पादों में से एक, बासमती चावल, इस समय पश्चिम एशिया (गल्फ रीजन) में जारी तनाव के कारण बड़े खतरे का सामना कर रहा है। ताजा व्यापार आंकड़ों के अनुसार, मार्च और अप्रैल 2026 के दौरान बासमती के निर्यात में 24% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। पिछले साल इसी अवधि में जहां निर्यात का मूल्य 1.1 बिलियन डॉलर से अधिक था, वहीं इस साल यह घटकर लगभग 838 मिलियन डॉलर रह गया है। इराक, ईरान, कतर और बहरीन जैसे प्रमुख देशों को होने वाले निर्यात में 50% से 90% तक की कमी आई है।
व्यापार की नई संभावनाओं पर विचार
बदलते व्यापारिक रास्ते और नए बाजार गल्फ देशों में राजनीतिक और सुरक्षा स्थितियों ने शिपिंग रूटों को प्रभावित किया है, जिससे व्यापार के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं। इस अनिश्चितता के बीच जॉर्डन अचानक भारत के लिए एक बड़ा एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन बनकर उभरा है और अप्रैल में यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा बासमती खरीदार बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक्सपोर्टर्स जॉर्डन के रास्ते अन्य गल्फ मुल्कों तक माल पहुंचा रहे हैं, जिससे लागत और अनिश्चितता दोनों बढ़ गई हैं। इसके साथ ही, यूरोपीय देशों जैसे ब्रिटेन (80% की वृद्धि), इटली और नीदरलैंड में बासमती की मांग में तेजी देखी जा रही है।
चीन और अन्य क्षेत्रों में मांग अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव के कारण बीजिंग ने भारत से खाद्य उत्पादों की खरीद बढ़ानी शुरू कर दी है। इसके परिणामस्वरूप, अप्रैल में चीन को होने वाले बासमती निर्यात में 155% की वृद्धि हुई है। इसी तरह मॉरीशस (200% वृद्धि) और हांगकांग में भी मांग बढ़ी है। हालांकि, चीन के बाजार में GMO (जेनेटिकली मॉडिफाइड मटेरियल) की मौजूदगी के कारण कुछ शिपमेंट रिजेक्ट हुए हैं, जिसके बाद APEDA ने अब सख्त टेस्टिंग नियम लागू कर दिए हैं।
किसानों पर प्रभाव और भविष्य की चुनौतियां
इस निर्यात संकट का सबसे सीधा और बुरा असर पंजाब और हरियाणा के किसानों पर पड़ने की संभावना है, क्योंकि भारत के कुल बासमती उत्पादन का लगभग 70% इन्हीं दो राज्यों से आता है। ये किसान पहले से ही यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों की कमी और उसके लिए होने वाले विरोध प्रदर्शनों से जूझ रहे हैं। यदि निर्यात बाजार लंबे समय तक कमजोर रहता है, तो उनकी आमदनी और मंडियों के कामकाज पर गहरा असर पड़ेगा।
विशेषज्ञों की राय विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को केवल गल्फ बाजार पर निर्भर रहने के बजाय यूरोप, पूर्वी एशिया और अफ्रीका जैसे नए बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत करनी चाहिए। दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक बाधाओं के कारण कृषि व्यापार को सुरक्षित रखने के लिए बाजारों का विविधीकरण (Diversification) अब बेहद जरूरी हो गया है।
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