बिहार से आया ‘बंगाल टाइगर’, मप्र में कटेंगे 1.50 लाख साल के पेड़, ग्वालियर में अवैध रेत खनन पर हाईकोर्ट की सख्ती, करंट लगने के लिए बिजली विभाग के इंजीनियर ज़िम्मेदार। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से एक बाघिन लाई गई है। उसे पहले 2.3 हेक्टेयर के बाड़े में रखा जाएगा और बाद में जंगल में छोड़ा जाएगा, लेकिन विशेषज्ञों ने शिकार, जंगल और इंसानी गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है।
TERI की एक स्टडी के मुताबिक CNG में 20% कंप्रेस्ड बायोगैस यानी CBG मिलाने से पूरे जीवन चक्र के आधार पर CNG को कार्बन न्यूट्रल बनाया जा सकता है। स्टडी ने यह भी कहा है कि अलग-अलग तरह के वाहनों के लिए अलग ईंधन और तकनीक की जरूरत होगी।
डिंडौरी में साल बोरर कीट से प्रभावित करीब 1.50 लाख पेड़ों को 31 दिसंबर तक काटने की तैयारी है। जंगल को 113 सेक्टर में बांटा गया है और विभाग के अनुसार 60 सेक्टर में कटाई शुरू हो चुकी है, लेकिन मौजूदा रफ्तार से समय पर काम पूरा करना चुनौतीपूर्ण दिख रहा है।
भोपाल के विकास प्लान 2047 पर आपत्ति या सुझाव देने वाले लोग अब ऑनलाइन या ऑफलाइन सुनवाई का विकल्प चुन सकेंगे। आवेदन में सुनवाई का तरीका बताना जरूरी है और आपत्ति या सुझाव के साथ उसकी PDF भी जमा करनी होगी।
ग्वालियर के बिलौआ में अवैध खनन और तय सीमा से ज्यादा खनिज निकालने पर रोक लगाने के लिए हाई कोर्ट ने नई व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए हैं। खनन क्षेत्रों में धर्मकांटा, एक प्रवेश और निकास मार्ग और कैमरे लगाने होंगे, नियम नहीं मानने पर कलेक्टर खदान बंद करा सकेंगी।
मध्य प्रदेश में धान की खरीदी और परिवहन में गड़बड़ी के आरोपों पर EOW ने 90 FIR दर्ज की हैं। EOW ने हाई कोर्ट में सभी मामलों की जांच की स्थिति की रिपोर्ट पेश की, जिसके बाद राज्य सरकार को जवाब देने के लिए छह हफ्ते का समय मिला है।
भोपाल के एमपी नगर में करंट लगने से वकील की मौत के मामले में नगर निगम के बिजली विभाग के इंजीनियरों को जिम्मेदार माना गया है। सहायक इंजीनियर सुमित सिंह को निलंबित कर दिया गया है और कार्यपालन यंत्री के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
विस्तृत चर्चा
सोलर ऑन व्हील्स पर राजीव त्यागी के साथ चर्चा
सांची में सोलर सिटी पर रिपोर्टिंग के दौरान हमने पहली बार किसानों से सुना कि वे खेतों में लगे सोलर पैनल चोरी होने के डर से कई बार उन्हें निकालकर घर ले आते हैं। बाद में Earth Journalism Network की ग्रांट के तहत हमने इस सवाल की अलग से पड़ताल की कि यह समस्या कितनी बड़ी है और किसान इससे कैसे निपट रहे हैं?
मध्य प्रदेश में PM-KUSUM के तहत किसानों को स्टैंड-अलोन सोलर पंप दिए जाते हैं। योजना के तहत इन सिस्टम का पांच साल का बीमा भी होता है। चोरी, प्राकृतिक आपदा या मौसम से हुए नुकसान की स्थिति में किसानों को मुआवजा मिलना चाहिए। लेकिन अलग-अलग जिलों में हमारी रिपोर्टिंग के दौरान हमें ऐसे किसान मिले जिनके सोलर पैनल, कॉपर वायर या कंट्रोलर चोरी हो चुके थे और उन्हें अब तक बीमा का भुगतान नहीं मिला था।
विभाग ने बताया कि बीमा की प्रक्रिया संबंधित कंपनियों के जरिए होती है। कंपनियों का कहना है कि मुआवजा पाने के लिए किसानों को तय प्रक्रिया पूरी करनी होती है, जिसमें चोरी के मामलों में समय पर FIR और जरूरी दस्तावेज जमा करना शामिल है। जमीन पर किसानों से बात करने पर सामने आया कि यह प्रक्रिया उनके लिए आसान नहीं है।
इस समस्या से बचने के लिए कुछ किसान अब सोलर ऑन व्हील्स या ट्रॉली सोलर जैसे पोर्टेबल सिस्टम की तरफ देख रहे हैं। ऐसे सिस्टम में सोलर पैनल को ट्रॉली पर लगाया जाता है, जिससे किसान उसे खेत तक ले जा सकते हैं और इस्तेमाल के बाद घर वापस लाकर सुरक्षित रख सकते हैं।
मध्य प्रदेश में जय सिंह चौहान ने ऐसा ही एक सिस्टम तैयार किया है। हालांकि, इसकी कीमत करीब एक लाख रुपये है, जबकि सरकारी सब्सिडी के बाद सामान्य सोलर पंप सिस्टम किसान को करीब 30 से 40 हजार रुपये में मिल सकता है। सरकार फिलहाल ऐसे पोर्टेबल सिस्टम को मौजूदा योजना में शामिल करने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि सोलर पंप की खेत में स्थापना और GPS आधारित जियो टैगिंग योजना की मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा है।
महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों में सोलर ऑन व्हील्स जैसे प्रयोग किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे पोर्टेबल सिस्टम सोलर पंपों के इस्तेमाल को अधिक लचीला बना सकते हैं और चोरी या नुकसान के डर से सिस्टम के कम इस्तेमाल की समस्या को भी कम कर सकते हैं।
हमारी 11 मिनट की वीडियो रिपोर्ट में उन किसानों की कहानी है जिनके सोलर सिस्टम चोरी हुए, अधिकारियों और संबंधित कंपनियों का पक्ष है और उन किसानों का अनुभव भी है जो सोलर ऑन व्हील्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।
कहानी का बड़ा सवाल यही है: जब सरकार सोलर पंपों पर करोड़ों रुपये का सार्वजनिक निवेश कर किसानों की सिंचाई को सौर ऊर्जा से जोड़ रही है, तो क्या इन सिस्टम की सुरक्षा और चोरी के बाद किसानों को मिलने वाला बीमा मुआवजा भी उतना ही प्रभावी है?
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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