मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के घोड़ाखेड़ा गांव में ब्रजमोहन दांगी के पास कुल 9 बीघा जमीन है, जिसमें से 4 बीघा में वे संतरे की खेती करते हैं। पिछले 10 साल से इस फसल से जुड़े ब्रजमोहन बताते हैं, “मैंने 400 पौधे 32 रुपये प्रति पौधे के हिसाब से मंगवाए थे। बड़ी मेहनत से एक बीघा के पौधे फल देने लायक हुए, लेकिन जब फल आने का वक्त आया, तभी मुसीबत भी आ गई।” वो बताते हैं, 2025 में इल्ली के प्रकोप से फल समय से पहले ही पेड़ से गिर गए, और 2024 में अत्यधिक बारिश ने पेड़ पर ही फसल सड़ा दी।
बगीचे की देखभाल, खाद और दवाई पर दांगी हर साल करीब 15 हजार रुपये खर्च करते हैं, लेकिन उनकी आखिरी अच्छी फसल 2023 में हुई थी, जिससे उन्हें करीब 76 हजार रुपये मिले थे। तब से खर्च तो जारी है, कमाई बंद।
ब्रजमोहन अकेले नहीं हैं। सही तकनीकी जानकारी न होने के कारण जिले के कई किसान निजी खाद-बीज दुकानदारों की सलाह पर महंगी और अक्सर गलत दवाइयां छिड़क रहे हैं। नतीजा यह कि पैसा भी बर्बाद हो रहा है और इल्ली भी नहीं मर रही। यह इल्ली इतनी तेजी से बढ़ती है कि संतरे की नई कोपलों, हरी पत्तियों और फूलों को चट कर जाती है।
आखिर यह संकट अचानक क्यों गहराया?

कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) राजगढ़ के उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ. लाल सिंह इसे मौसम के बिगड़े मिजाज से जोड़ते हैं। उनके मुताबिक, “संतरे के पौधे के लिए मौसम का अनुकूल होना बेहद जरूरी है, गर्मी में गर्मी पड़े, ठंड में ठंड, और बारिश के मौसम में बारिश। लेकिन जब बारिश के मौसम में भी गर्मी बनी रहती है, तो इल्ली का प्रकोप बढ़ जाता है।”
डॉ. सिंह बताते हैं कि जिन बगीचों में अधिक बारिश या जलभराव से पौधों का प्राकृतिक जल-तनाव (वॉटर स्ट्रेस) अचानक टूट जाता है और नई कोमल पत्तियां फूटने लगती हैं, वहीं इल्ली सबसे ज्यादा हमला करती है, यही वजह है कि ब्रजमोहन जैसे किसानों के बगीचे निशाने पर हैं।
पौधे के जीवन-चक्र को समझें तो संतरे का पौधा अच्छी देखरेख के चार साल बाद फल देना शुरू करता है, लेकिन असली फल-बहार सात साल बाद आती है। मृग बहार के फूल जुलाई-अगस्त में खिलते हैं और फसल फरवरी के अंत से अप्रैल तक तैयार होती है। शुरुआती अवस्था में ‘लेमन बटरफ्लाई’ यानी नींबू की तितली पत्तियों के नीचे अंडे देती है, जो बाद में इल्ली बनकर कोमल पत्तियों को खा जाती है, कई बार तो पूरे पौधे की पत्तियां साफ कर देती है।
नुकसान का गणित

ब्रजमोहन का बगीचा भले ही छोटा हो, लेकिन राजगढ़ का यह संकट राज्य के आर्थिक नक्शे पर बड़ी जगह रखता है।
मध्य प्रदेश देश का सबसे प्रमुख संतरा उत्पादक राज्य है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के ताजा बागवानी अग्रिम अनुमानों के मुताबिक, देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश की करीब 32 प्रतिशत हिस्सेदारी है और राज्य में सालाना 22 लाख 14 हजार मीट्रिक टन संतरा पैदा होता है।
इन्वेस्ट मध्य प्रदेश (ODOP डैशबोर्ड) के आंकड़ों के अनुसार, इसमें अकेले राजगढ़ जिले का योगदान 11 से 12 प्रतिशत है।
राजगढ़ जिला उद्यानिकी विभाग के मुताबिक, जिले में करीब 21 हजार हेक्टेयर रकबे से सालाना करीब 2 लाख 98 हजार मीट्रिक टन संतरे का उत्पादन होता है।
तुलनात्मक रूप से आगर-मालवा (30-35% हिस्सेदारी) और छिंदवाड़ा-पांढुर्णा क्लस्टर (25-28% हिस्सेदारी) राज्य में पहले और दूसरे स्थान पर बने हुए हैं, जबकि राजगढ़ तीसरे नंबर पर आता है। यानी राजगढ़ राज्य के संतरा कारोबार की रीढ़ है, और यहां का संकट सीधे बाजार व सप्लाई चेन को हिला सकता है।
मध्य प्रदेश में संतरे की खेती पर हुए शोध के वैज्ञानिक विश्लेषण के मुताबिक, मौसम में अचानक आने वाले बदलावों (तापमान का उतार-चढ़ाव, पाला और अनियमित बारिश) को संतरा किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना गया है।
समस्या यहीं खत्म नहीं होती। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (MoFPI) की वैल्यू चेन रिपोर्ट बताती है कि बुनियादी ढांचे और कोल्ड स्टोरेज की भारी कमी के चलते किसानों को फसल कटाई के बाद ही 25 से 30 प्रतिशत तक का नुकसान झेलना पड़ता है। यानी जो फसल इल्ली और बारिश से बचकर पेड़ तक टिक जाती है, उसका भी बड़ा हिस्सा भंडारण की कमी में बर्बाद हो जाता है।
ऐसे हालात में खेतों पर सही तकनीकी सलाह और गुणवत्तापूर्ण कीटनाशक न मिलना पूरे संतरा क्लस्टर को तोड़ने के लिए काफी है।
क्या कर सकते हैं किसान?

इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए डॉ. लाल सिंह ने किसानों के लिए स्पष्ट तकनीकी सलाह जारी की है। इल्ली से बचाव के लिए क्लोर्मेंक्वाइट क्लोराइड (50% SL) की 2 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15-15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए।
इसके साथ ही वानस्पतिक वृद्धि रोकने और फूल आने की प्रक्रिया तेज करने के लिए पैक्लोब्यूट्राजोल की 8 मिली मात्रा 10 लीटर पानी में घोलकर जड़ क्षेत्र की मिट्टी में मिलानी चाहिए।
पोषण के लिए प्रति पौधा 30-40 किलो सड़ी गोबर खाद (या 20 किलो केंचुआ खाद), 1.5 किलो डी.ए.पी. और 500 ग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश देने की सलाह है, साथ ही 100-100 ग्राम जिंक व मैंगनीज सल्फेट और 30-50 ग्राम कॉपर सल्फेट-बोरॉन का इस्तेमाल करें। यह खाद तने के पास नहीं, बल्कि पेड़ के फैलाव-घेरे में 25-30 सेंटीमीटर गहरी मिट्टी में मिलानी चाहिए, आधी मात्रा जून-जुलाई में और बाकी आधी अक्टूबर-नवंबर में।
डॉ. सिंह के मुताबिक संतरे के लिए 25-30 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त है, और तापमान 30-35 डिग्री से ऊपर जाने पर ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई से खेत में नमी बनाए रखनी चाहिए ताकि पौधों को झटका न लगे।
ब्रजमोहन कहते हैं, “अगर सही समय पर सही दवा और सलाह मिल जाए, तो शायद मेरा बगीचा फिर से हरा हो जाए।” उनकी यह उम्मीद दरअसल राजगढ़ के हजारों संतरा किसानों की उम्मीद है कि वैज्ञानिकों की सलाह समय पर खेत तक पहुंचे, कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं बढ़ें, और मौसम की मार के बावजूद उनके बगीचे फिर से फल-फूल सकें।
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