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पांढुर्णा जिले को सूखा घोषित करने की मांग को लेकर किसानों का प्रदर्शन

किसान सूखे की वजह से अपने भविष्य को लेकर चिंता में हैं, लेकिन प्रदेश सरकार ने सूखे की घोषणा से सम्बंधित कोई भी अधिसूचना जारी नहीं की है।
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मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने के बाद पांढुर्णा जिले के किसान और आम नागरिक पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि उनकी खरीफ की फसल का उत्पादन कम हुआ है और रबी सीजन में चना बोने के लिए भी उनके पास पानी नहीं है। ऐसे में जिले को सूखा प्रभावित घोषित करने की मांग को लेकर जिला कांग्रेस कमिटी के नेतृत्त्व में किसानों ने प्रदर्शन किया। 

कांग्रेस ने शनिवार, 17 अक्टूबर को जिला मुख्यालय के जगनाड़े चौक में एक सभा का आयोजन किया। इसमें पूर्व सांसद नकुलनाथ भी शामिल हुए। इसके बाद किसानों के साथ कलेक्ट्रेट तक रैली निकालने के बाद उन्होंने अपनी मांगों का ज्ञापन कलेक्ट्रेट को सौंपा। 

किसानों ने कहा कि चूंकि उनकी खरीफ की फसल प्रभावित हुई है इसलिए खाद-बीज की खरीदी के लिए सहकारी समिति से लिया गया उनका क़र्ज़ और बिजली बिल माफ़ होने चाहिए। उन्होने मांग की के उन्हें फसल ख़राब होने का उचित मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही जिन किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का चयन किया है उन्हें तत्काल बीमा भुगतान किया जाए। 

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पांढुर्णा के किसानों ने कहा कि कपास की फसल की उत्पादकता घटी है | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

खरीफ की फसल संकट में            

सौंसर तहसील के पंढरी से प्रदर्शन में शामिल होने आए शंकर बागड़े ने 10 एकड़ में कपास की फसल बोई थी। उन्होंने बताया कि पठारी इलाके में स्थित उनके खेत के लिए वो पूरी तरह केवल बारिश पर आश्रित हैं। मगर इस साल पर्याप्त बारिश न होने के कारण उनकी पराठी (कपास) की फसल अपरिपक्व रह गई। 

सिराठा के रमेश ढोके का भी अनुभव इसी तरह का था। उन्होंने बताया कि 3 एकड़ खेत में पिछले साल उन्होंने 30 क्विंटल कपास उत्पादित किया था। मगर इस बार 10 क्विंटल उत्पादन भी मुश्किल लग रहा है। इसी तरह पिछले साल की 5 क्विंटल तुअर के मुकाबले इस साल 2 क्विंटल तुअर निकालने की भी संभावना नहीं है। 

उन्होंने बताया कि 5 हॉर्स पॉवर की उनकी एक मोटर आम तौर पर इस महीने 6 घंटे चलती थी मगर अब बमुश्किल एक घंटा पानी दे पाती है। कपास अब भी पूरी तरह परिपक्व नहीं हुआ है ऐसे में पानी की कमी के चलते घाटे को कवर करना उनको संभव नहीं लग रहा था।    

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अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में ही पांढुर्णा के खेत में स्थित एक कुआं सूखने की कगार पर था | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

पानी का संकट

बागड़े ने बताया कि उनके क्षेत्र में 2 दिन में एक दिन ही पीने का पानी आ रहा है। ऐसे में उन्हें चिंता थी कि आने वाले दिनों में पीने के पानी का संकट भी गहरा सकता है। 

भारत मौसम विभाग, भोपाल केंद्र के आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 28 सितंबर के बीच जिले में 623.5 मिमी बारिश हुई थी। यानि सामान्य बारिश (800.5 मिमी) की तुलना में 22% कम हुई थी। 

वाटर रिसोर्स इन्फोर्मेंशन सेंटर के आंकड़ों के अनुसार वर्तमान पांढुर्णा जिले (पांढुर्णा और सौंसर तहसील) में कम से कम 10 बांध बने हुए हैं। यह सभी बांध सौंसर तहसील में हैं। इसके अलावा जिले में जाम और कन्हान नदी पानी का के मुख्य स्त्रोत हैं। 

किसानों ने कहा कि उनके गांव के आस-पास की छोटी-छोटी नदियां और स्टॉप डैम भी सूख चुके हैं। रिपोर्टिंग के दौरान हमें भी कम से कम 10 स्टॉप डैम सूखे मिले। 

किसानों के अनुसार इसका असर उनकी रबी की फसल पर पड़ेगा। बागड़े ने कहा कि वो हर रबी के सीजन में गेहूं और चने की फसल उगाते हैं मगर इस बार वो चना की बोवनी के लिए भी आश्वश्त नहीं थे।   

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पांढुर्णा के किसानों के अनुसार उनके संतरे के पेड़ों के सूखने का खतरा बढ़ गया है | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

संतरे के पेड़ों के सूखने का खतरा

मारुड़ के अनिल मेंढे 10 एकड़ में कपास, तुअर, मिर्च और अन्य सब्जियों की खेती करते हैं। इसके अलावा संतरे की खेती उनके लिए मुख्य है। उन्होंने बताया कि इस साल बारिश का पानी पर्याप्त न मिलने और तेज़ धूप के चलते संतरे के पेड़ तनाव में हैं। इसके चलते फलों का आकर छोटा और फ्रूट ड्रॉप शुरू हो गया है। “संतरे का साइज़ अगर नहीं बढ़ता है तो उसकी बाज़ार में कोई कीमत नहीं मिलती।” मेंढे ने बताया। 

उन्होंने दावा किया कि संतरे के किसान 90% से अधिक के नुकसान में हैं जो आने वाले दिनों में बढ़ सकता है। उन्होंने कहा, “अंबिया बहार (सर्दी के मौसम में टूटने वाले संतरे) के संतरे बाज़ार में दिख रहे हैं मगर गर्मी के संतरे शायद ही देखने को मिलें क्योंकि मृग बहार के फल अभी से गिरना शुरू हो गए हैं।” 

भारत में सबसे ज़्यादा संतरे का उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है। यहां देश की कुल उपज का 30% संतरा उत्पादित होता है। ऑरेंज सिटी कहे जाने वाले नागपुर से 88 किमी दूर मध्य प्रदेश का पांढुर्णा जिला अपने संतरे के उत्पादन के लिए प्रसिद्द है। वर्तमान पांढुर्णा जिले में 2 ब्लॉक आते हैं, पांढुर्णा और सौंसर। इन दोनों ब्लॉक में क्रमशः 2,50,500 और 15,5000 मीट्रिक टन संतरे का उत्पादन होता है। 

मेंढे ने बताया कि अगर पानी का इंतजाम नहीं होगा तो संतरे के पेड़ भी सूखकर मर जाएंगे जो उनके लिए सबसे बड़ा घाटा होगा। 

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पांढुर्णा के खेत में सूखे के कारण ज़मीन फट चुकी थी | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

रमेश ढोके का मानना था कि सरकार को एक निश्चित मुआवजा सभी किसानों को देना चाहिए ताकि वो आने वाले दिनों में त्यौहार के खर्चों को संभाल सकें। जबकि कांग्रेस नेता शेख नूर मोहम्मद ने कहा कि चूंकि जिले से लगे हुए महाराष्ट्र के विदर्भ में सूखा घोषित किया गया है इसलिए यहां भी सूखा घोषित किया जाना चाहिए। 

21 अक्टूबर को कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत फसल बीमा संबंधी प्रकरणों की समीक्षा एवं निराकरण के लिए जिला स्तरीय समिति गठित की गई। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत खरीफ वर्ष 2026 में अधिसूचित फसलों के फसल कटाई प्रयोगों, उपज संबंधी आंकड़ों तथा फसल क्षति के आकलन के आधार पर बीमा दावों का निराकरण समिति करेगी।

जिला प्रशासन द्वारा जारी प्रेस नोट के अनुसार इस बैठक में आगामी सीजन में चना एवं सरसों की खेती पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई। हालांकि अब तक प्रदेश सरकार या फिर जिला स्तर पर सूखे की घोषणा से सम्बंधित कोई भी अधिसूचना जारी नहीं की गई।

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Author

  • Shishir Agrawal is the Hindi Editor of Ground Report. However he identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers environment and development affairs from the tribal landscape of central India.

    He has also covered issues related to agrarian crisis, wildlife, water, waste and urban development. He has been a recipient of several fellowships and grant. This includes Gandhi Fellowship, Vikas Samvad Media Fellowship and Earth Journalism Network Grant.

    Apart from having long conversations he indulges himself in reading books, watching theater and gazing at flying objects for leisure. He can be reached at shishiragrawl007@gmail.com.

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