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भोपाल की सड़कों पर साइकिल चलाना कितना आसान?

Traffic Cycle Story Bhopal

शिव कुमार पाठक भोपाल के रविशंकर नगर स्थित पोस्ट ऑफ़िस में पोस्टमैन हैं। वो हर रोज़ सुबह 6 बजे उठ जाते हैं। अपने ऑफिस तक पहुंचने के लिए उन्हें कजलीखेड़ा स्थित घर से 16 किमी का सफ़र तय करना पड़ता है। हर रोज़ सुबह 7 से 7:30 बजे के बीच वो साइकिल से ही ये दूरी तय करने के लिए निकलते हैं। इसके अलावा डाक बांटने, घूमने और रिश्तेदारों के घर जाने के लिए भी पाठक साइकिल का ही इस्तेमाल करते हैं। 

कारण पूछने पर वह कहते हैं, “साइकिल चलाने का हमको शौक है, इससे हमको ज़्यादा अच्छा लगता है।” पाठक को देखते ही लोगों को उनका पुराना समय याद आता है। वह समय जब सड़कों पर साइकिल और साइकिल के साथ डाकिए आम थे।  

पाठक भोपाल के उन लोगों में से एक हैं जो अपने काम के लिए साइकिल का रोज़ाना इस्तेमाल करते हैं। इनके लिए साइकिल ही उनका प्रमुख ‘मोड ऑफ़ ट्रांसपोर्टेशन’ है। उनका मानना है कि चौड़ी होती सड़कों के बीच साइकिल के लिए सड़कों पर जगह कम हो रही है। इससे उनके लिए साइकिल चलाना कठिन होता जा रहा है।

पाठक जैसे कई और साइकिल सवार सफ़र तय करने में आने वाली दिक्कतों का ज़िक्र करते हुए एक असुरक्षा का भाव ज़ाहिर करते हैं। वहीं विशेषज्ञ अलग साइकिल नेटवर्क विकसित करने की वकालत करते हैं। साथ ही वह छोटे शहरों में साइकिल चलाने की संस्कृति को बचाने की अपील करते हैं।  

Post man Cycle Story Bhopal
पाठक न केवल ज़रूरत बल्कि शौक के लिए भी साइकिल चलाते हैं | भोपाल | फ़ोटो: हिमांशु नरवरे

साइकल: शौक, पेशा और दिक्कतें 

पाठक प्रतिदिन 10 किमी साइकिल चलाकर अपनी डाक बांटते हैं। इस तरह वह एक दिन में लगभग 40 किमी साइकिल चला लेते हैं। हालांकि उनके बहुत से सहकर्मी अब मोटर गाड़ी से डाक बांटते हैं। मगर पाठक, उनके सहकर्मी गिरधारी लाल केवट और अन्य 4 डाकियों के लिए साइकिल से डाक बांटना ज्यादा किफ़ायती है। 

मोहनलाल चिघारिया के लिए तो साइकिल ही यातायात का प्राथमिक साधन है। वह रोज़ शाहजहांनाबाद से कोलार की 12.5 किमी से अधिक की दूरी तय करते हैं। यहां चिघारिया एक बंगले में साफ़-सफाई का काम करते हैं। 

साइकिल से ही यात्रा करने का कारण बताते हुए वो कहते हैं, “मुझे महीने के 10,000 रूपए मिलते हैं। अगर मैं गाड़ी (मोटरसाइकल) से आऊंगा तो हर महीने 3000 रु से ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे।” उनके लिए यह एक बड़ी रकम है।

पाण्डेय, केवट और चिघारिया केवल कुछेक उदाहरण भर नही हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारतीय कामगारों का बड़ा हिस्सा (36.33%) पैदल या साइकिल से यात्रा करता है। देश के ग्रामीण क्षेत्र में 58.1% जबकि शहरी क्षेत्र में 48.9% कामगार साइकिल या पैदल ही यात्रा करते हैं।

वहीं मध्य प्रदेश में 15.15% और भोपाल जिले में 10.64% लोग कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। 

इसके विपरीत प्रदेश में 14.41% लोग मोटर साइकिल और केवल 1.5% लोग ही कार का इस्तेमाल करते हैं। जबकि भोपाल में यह आंकड़ा क्रमशः 23.68% और 4.02% है।

मगर ज़रूरत के अलावा शहर में कई लोग शौक के लिए भी साइकिल चलाते हैं। रविशंकर नगर पोस्ट ऑफिस में बीमा एजेंट और स्वतंत्र आर्थिक सलाहकार के तौर पर काम करने वाली किरण सलूजा बताती हैं, “मेरे पति महंगी साइकिल लेकर आए थे क्योंकि उन्हे शौक था। मगर कहां चलाएंगे? जगह ही नहीं है।” नतीजतन उनके घर पर साइकिल कई समय से खड़ी हुई है।

Kiran Saluja Cycle Story Bhopal
किरण सलूजा मानती हैं कि सरकार साइकिल सवारों के लिए नीतियां नहीं बना रही है | भोपाल | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

कितना बदला शहर और सड़कें   

भोपाल डेवलपमेंट प्लान 2031 के ड्राफ्ट के अनुसार शहर की नगरीय सीमा में सड़कों की कुल लंबाई 637.42 किमी है। हालांकि शहर में लगातार नई सड़कों का निर्माण और पुरानी का पुनरुद्धार का काम चल रहा है। 

सलूजा सरकार की नीतियों पर बात करते हुए सख्त लहज़े में कहती हैं, “साइकिल चलाने वाले को इंसान समझ ही नहीं रहे हैं वरना उनके लिए (सड़क बनाते हुए) जगह छोड़ते।”

जब मैं यह लिख रहा हूं तो मेरे घर के ठीक बाहर ही सड़क को बनाने और चौड़ा करने का काम चल रहा है। यह एक डबल रोड है यानि सड़क के दोनों ओर कुल 4 पंक्तियों में वाहन आ-जा सकेंगे। मगर इसमें फुटपाथ या साइकिल लेन जैसी कोई सुविधा नहीं है।

केवट 30 साल पहले ऑफिस से 6 किमी दूर अशोका गार्डन इलाके में रहते थे। वह कहते हैं कि उस समय ज़्यादातर पोस्टमैन साइकिल से ही आपस में बात करते हुए सिंगल रोड से आते-जाते थे। मगर अब डबल रोड होने के बाद भी साइकिल चलाना मुश्किल हो गया है। 

Road Traffic Cycle Story Bhopal
गिरधारीलाल केवट साइकिल चलाते हुए असुरक्षित महसूस करते हैं | भोपाल | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

यह साइकिल सवार मानते हैं कि सड़कों पर मोटराइज्ड वाहनों की संख्या बढ़ी है जिससे उनके लिए चौड़ी सड़कों पर भी साइकिल चलाना खतरनाक हो गया है।

बीते साल फ्री प्रेस जर्नल को दिए एक बयान में भोपाल के एडिशनल डीसीपी, यातायात ने कहा कि शहर में हर साल एक से डेढ़ लाख वाहनों की संख्या बढ़ रही है।

केवट जब भी किसी सिग्नल पर वह रुकते हैं उनको डर लगता है कि कोई बड़ा वाहन उनको पीछे से टक्कर न मार दे। वहीं चिघारिया और पाठक दोनों के पास खुद के साथ हुई दुर्घटना की कई कहानियां हैं। 

केवट की चिंता व्यर्थ नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2023 के बीच भोपाल में 34 साइकिल सवार सड़क हादसों में घायल हुए हैं और 4 लोगों की मौत हुई है।

साइकल के लिए साल दर साल असुरक्षित होती सड़कें (Dot Plot)

प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़े और भी चिंताजनक हैं। 2019 में प्रदेश में 76 साइकिल सवारों की मौत हुई थी। यह 2022 में 126 और 2023 में 96 हो गई। इसी तरह राष्ट्रीय आंकड़ों में मौत का आंकड़ा 868 (2019) से बढ़ते हुए 2023 में 3367 तक पहुंच गया। 

वहीं मध्य प्रदेश में हादसों में घायल होने वाले लोगों की संख्या में भी 2021 से 2023 के बीच बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। 2021 में यहां 360 लोग घायल हुए जबकि 2023 तक यह संख्या दोगुने से भी ज़्यादा बढ़कर 875 हो गई। 

पाठक असुरक्षा के साथ असुविधा का भी ज़िक्र करते हैं। दरअसल वो जिस इलाके में डाक बांटते हैं वहां की सड़कें ख़स्ताहाल हैं। वो कहते हैं कि इससे साइकल के मेंटेनेंस का खर्च बढ़ जाता है। 

हालांकि सड़कों के ख़स्ताहाल किसी से छुपे नही हैं। नवंबर 2025 में प्रदेश के हाई कोर्ट ने सड़कों की बुरी हालत और बढ़ते हादसों पर चिंता जताई थी। चीफ जस्टिस संजय सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ़ की बेंच ने कहा था, “सड़कों की खराब हालत सिर्फ़ परेशानी ही नहीं है, बल्कि लोगों की सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा है।”  

Cycle Lane Cycle Story Bhopal
भोपाल की साइकिल लेन में अब केवल कार और गुमटियां दिखती हैं | भोपाल | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

साइकल लेन पर पार्क कारें

शहर में साइकिल सवारों के लिए दी गई सुविधाओं के बारे में बात करते हुए सलूजा पब्लिक बाईसिकल शेयरिंग का ज़िक्र करती हैं। वह कहती हैं भोपाल स्मार्ट सिटी प्रोग्राम के तहत जो साइकिल लेन बनाई गई थीं वह अब अवैध कब्ज़े और पार्किंग की जगह बन गई हैं। 

दरअसल भोपाल स्मार्ट सिटी प्रोग्राम के तहत शहर में 50 डॉकिंग स्टेशन बनाकर 500 पब्लिक बाइसिकल रखी गई थीं। इसके लिए 3 करोड़ रूपए से भी अधिक खर्च किए गए थे। शहर के 2 हिस्सों में 5 मीटर चौड़ी और कुल 12 किमी लंबी साइकिल लेन भी बनाई गई। मगर दोनों ही लेन किसी भी महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल या प्रमुख बाज़ारों को नहीं जोड़तीं।  

फरवरी 2026 में जब हमने यहां जाकर देखा तो लेन पर गड्ढे, अवैध दुकानें एवं ठेले और गाड़ियों की पार्किंग दिखाई दी। वहीं नवंबर 2025 में ही संबंधित कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म होने के बाद पब्लिक शेयरिंग साइकिलों को भी डॉकिंग स्टेशनों से हटा दिया गया।

भोपाल के अलावा सतना को भी स्मार्ट सिटी का दर्जा मिला था। यहां भी 5.5 करोड़ रु की लागत से बनाया गया साइकिल ट्रैक भोपाल जैसी स्थिति में ही है।

किसके लिए हैं सड़कें?

डेवेलपमेंट प्लान 2031 के ड्राफ्ट में भी शहर में फुटपाथ और साइकिल नेटवर्क की कमी का ज़िक्र किया गया है। प्लान के अनुसार साइकिल लेन ना तो काफी हैं और ना ही वह इस्तेमाल हो रही हैं। साथ ही इसके किसी महत्वपूर्ण गंतव्य से न जुड़े होने की बात भी कही गई है।

जबकि राष्ट्रीय शहरी यातायात नीति 2014 के अनुसार पूरे शहर में फुटपाथ और साइकिल के लिए अलग लेन होनी चाहिए ताकि आने-जाने वाले को यह भरोसा हो कि अगर वह चाहे तो अपनी पूरी यात्रा पैदल या साइकिल से पूर्ण कर सकता है।

मगर न तो सड़कें साइकिल सवारों को सुरक्षित लग रही हैं ना ही पैदलयात्रियों को।

सड़क हादसों में पैदल यात्रियों की मौत (Grouped column chart)

दुर्गा साल्वे भोपाल के 12 नंबर इलाके में रहती हैं। वह भोपाल की त्रिलंगा कॉलोनी, आकाशगंगा कॉलोनी और अन्य रहवासी सोसाइटी के घरों में सहायिका (house help) के रूप में काम करती हैं। इस दौरान वह एक दिन में लगभग 20 किमी पैदल चलती हैं। 

लगभग 25 साल से एक ही रास्ता तय कर रहीं साल्वे बताती हैं कि इस अंतराल में पैदल चलना कठिन होता गया है। “पहले सड़कें छोटी थीं लेकिन गाड़ियां कम थीं। किनारे पे पेड़ लगे थे तो गर्मी के दिनों में भी आराम होता।” मगर अब बढ़ते ट्रैफिक और कम होते पेड़ों ने इसे कठिन बना दिया है। 

साल्वे कहती हैं कि उन्हें अब पैदल चलना असुरक्षित लगता है मगर उनके पास इसका कोई विकल्प नहीं है।

बेहतरी के प्रयासों में नदारद साइकल

राज्य में 1 अप्रैल 2025 से 30 नवंंबर 2025 तक पांच प्रकार की परियोजनाओं में कुल 78।04 किमी सड़क का निर्माण हुआ है। इसमें राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और ज़िला सड़कें शामिल हैं। 

राज्य के हालिया आर्थिक सर्वे में यातायात जाम को कम करने के लिए 6 परियोजनाओं का ज़िक्र है। इसके अलावा 8 नई पहलों को शुरू करने का भी ज़िक्र है। मगर कहीं भी साइकिल को बढ़ावा देने की बात नहीं कही गई। 

केंद्र सरकार द्वारा 16 अगस्त 2023 को ‘पीएम ई-बस सेवा’ शुरू की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार ‘यह योजना शहरी मोबिलिटी को पुनर्परिभाषित करेगी।’ 

योजना के तहत प्रदेश के 8 नगरीय निकायों में कुल 972 ई-बसों का संचालन होना है। भोपाल में इसके तहत 195 बसें संचालित होंगी। 

Chighariya Cycle Story Bhopal
मोहनलाल चिघारिया के लिए साइकिल चलाना उनकी महत्वपूर्ण बचत का हिस्सा है | भोपाल | फ़ोटो: हिमांशु नरवरे

2014 की नीति के अनुसार ‘साइकिलिंग को बढ़ावा देना चाहिए क्योंकि इससे सार्वजानिक यातायात (Public Transport) की पहुंच और असर को बेहतर बनाया जा सकता है।’

मगर शहर के ज़्यादातर बस स्टॉप के किनारे स्थित पब्लिक बाइक (साइकिल) शेयरिंग के डॉकिंग स्टेशन से साइकलें गायब हैं। पीएम ई-बस सेवा के संचालन के दौरान साइकिल सवारों और पैदल यात्रियों के लिए कोई स्पष्ट ब्लूप्रिंट नहीं दिखता।  

कैसे सही होगा सब?

मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MANIT), भोपाल के योजना एवं वास्तुकला विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ राहुल तिवारी मानते हैं कि अभी भी छोटे और मझौले शहरों (टियर-2) में साइकिल और पैदल यात्रा यातायात के प्रमुख साधन हैं। 

2021 के एक अन्य आंकड़े के अनुसार भोपाल में 32% लोग साइकिल और पैदल यात्रा करते हैं। हालांकि 7% लोग प्राइवेट कार और 26% लोग मोटरसाइकल का उपयोग करते हैं। यानि अब भी प्राइवेट मोटर व्हीकल और साइकिल एवं पैदल यात्रियों की संख्या में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। 

डॉ तिवारी मानते हैं कि नगर नियोजकों और जनता का पूरा ध्यान कारों और अन्य मोटरीकृत वाहनों की ओर है इसलिए सड़कों की प्लानिंग में साइकिल को ध्यान में नहीं रखा जा रहा। वह कहते हैं कि साइकिल सवारों के लिए सुरक्षित यातायात हेतु ज़रूरी है कि उनका अलग से नेटवर्क विकसित किया जाए। उनके अनुसार टियर-2 और टियर-3 शहरों में अब भी साइकिल चलाने की संस्कृति है जिसे सही इन्फ्रास्ट्रक्चर देकर बचाने की ज़रूरत है। 

शिव कुमार पाठक और गिरधारीलाल केवट, दोनों के परिजन उन्हें साइकिल चलाने से मना करते हैं। केवट के अनुसार उनके बेटे कहते हैं, “साइकिल लेकर घर में मत आया करो।” मगर दोनों ही लोग नौकरी के दिनों तक साइकिल चलाते रहना चाहते हैं। हालांकि वह कहते हैं कि इसके लिए सरकार को भी सुविधाएं देनी होंगी।

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  • Shishir identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers the rural landscape with a socio-political angle. He loves reading books, watching theater, and having long conversations.

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