Read in English | भोपाल ज़िले की हुज़ूर तहसील के मुग़लियाछाप इलाके में आसमान पर काले बादल छाए हुए थे। गर्मी और उमस से हवा भारी हो गई थी। इसी बीच औरतें झुककर, पानी से भरे और दरारों वाले खेतों में धान के छोटे पौधे लगा रही थीं।
लगातार नौ दिनों तक बादल छाए रहे, फिर भी इस इलाके में बारिश नहीं हुई।
कुछ किलोमीटर दूर, खजूरी सड़क पर, कैलाश विश्वकर्मा अपने धान के खेत को देख रहे थे। उनके खेत में गहरी दरारें पड़ गई थीं। उनकी ज़मीन नदी के पास है, इसलिए धान उगाना ही उनके पास एकमात्र विकल्प है। एक हफ़्ता पहले उन्होंने ‘पूसा बासमती’ किस्म के धान के पौधे लगाने के लिए मज़दूर बुलाए थे। अब वे पौधे सूखकर कमज़ोर पड़ गए हैं।
उन्होंने मोटर पंप से पानी भरकर अपने खेतों की सिंचाई की, लेकिन तालाब जल्द ही फिर से सूख गए। गर्म और उमस भरी मिट्टी ने पानी को तेज़ी से सोख लिया था।
विश्वकर्मा ने कहा, “अगर छह या सात दिनों के भीतर बारिश नहीं हुई, तो फ़सल बर्बाद हो जाएगी।”

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, मध्य प्रदेश में 1 जून से 19 जुलाई 2026 के बीच सामान्य से 16% कम बारिश हुई। राज्य में कुल मिलाकर बारिश “सामान्य” रही, लेकिन मॉनसून का बंटवारा असमान था। राज्य के 55 ज़िलों में से 20 ज़िलों में कम या बहुत कम बारिश हुई। 32 ज़िले सामान्य श्रेणी में रहे, और सिर्फ़ तीन ज़िलों में ज़्यादा या बहुत ज़्यादा बारिश हुई।
जून की शुरुआत में थोड़ी बारिश हुई थी, जिससे धान की रोपाई का कुछ काम हो पाया। लेकिन उसके बाद बारिश रुक गई।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सोयाबीन, धान और मक्का मध्य प्रदेश की खरीफ़ फ़सल का मुख्य आधार हैं। किसानों का कहना है कि इस साल तीनों फ़सलों को नुकसान हुआ है, क्योंकि मॉनसून देर से आया और उम्मीद से कम बारिश हुई।
मोटर पंप और इंतज़ार की कीमत

मुग़लियाछाप में राहुल पाटीदार ने छह एकड़ ज़मीन पर धान की रोपाई की थी। पिछले साल रोपाई समय पर पूरी हो गई थी, लेकिन इस बार वे 15 से 20 दिन पीछे चल रहे थे।
बारिश न होने पर उन्होंने अपने बोरवेल का सहारा लिया और मोटर से तालाबों को भरने के लिए खेत तक पाइपलाइन बिछाई। फिर भी हिसाब-किताब उनके पक्ष में नहीं रहा। उन्हें दिन में आठ से नौ घंटे बिजली मिलती थी, सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक। उस समय में एक मोटर मुश्किल से एक तालाब भर पाती थी। तीन मोटरें एक साथ चलाने पर भी दिन में सिर्फ़ एक से डेढ़ एकड़ ज़मीन की सिंचाई हो पाती थी।
पाटीदार का अंदाज़ा था कि सफल रोपाई के लिए उनके पास सिर्फ़ 20 दिन बचे थे। अगर यह मौका चूक जाता, तो नई बुआई से धान में फूल आने का समय सितंबर-अक्टूबर तक खिंच जाता, जब तापमान फ़सल के अनुकूल नहीं रहता। उनका कहना था कि इस स्थिति में फ़सल किसी भी हाल में बर्बाद हो जाती।
धान की फ़सल खड़े पानी में सबसे अच्छी होती है। रोपाई और बढ़ने के ज़्यादातर समय खेतों में कुछ इंच पानी भरा रहना चाहिए। और एक बार फ़सल लग जाने के बाद, चिकनी-दोमट मिट्टी को कभी भी पूरी तरह सूखने नहीं देना चाहिए।
इस इलाके में मॉनसून के आने की सामान्य तारीख 15 जून है, और इसके लौटने की तारीख़ 15 सितंबर के आसपास है। इस समय के बाद बुआई करने से फूल आने का समय पतझड़ के ठंडे और सूखे हफ़्तों में चला जाता है, जब फ़सल ठीक से नहीं पनपती।
किस्म के आधार पर, धान को बोने से लेकर कटाई तक 110 से 140 दिन लगते हैं।
देरी को देखते हुए सरकार ने किसानों को सलाह दी है कि वे कम समय में तैयार होने वाली फ़सलों की किस्में इस्तेमाल करें, जिनसे ज़्यादा पैदावार मिल सके और जिनमें कम पानी की ज़रूरत हो।

इस योजना के तहत एग्रो-मेट (खेती-मौसम) सलाह, SMS और WhatsApp अलर्ट, कॉल सेंटर, रेडियो और टेलीविज़न प्रसारण, और सोशल मीडिया के ज़रिए जानकारी पहुँचाने का दायरा बढ़ाया जा रहा है। इसका मकसद हर किसान को समय पर और विज्ञान-आधारित सलाह देना है, ताकि वे बुआई, फ़सल चुनने और खेती के सामान के इस्तेमाल के बारे में सही फ़ैसले ले सकें।
पाटीदार ने इस सलाह को गलत नहीं बताया, लेकिन उन्होंने कहा कि नर्सरी तैयार करने के लिए कम से कम एक महीने की ज़रूरत होती है। उन्हें यह सलाह बहुत देर से मिली, इसलिए वे अपनी फ़सलों में यह बदलाव नहीं कर पाए।
सोयाबीन की खेती में भी ऐसी बीज की किस्में मिलना एक चिंता का विषय था।
मज़दूरी और रोज़ी-रोटी
खेतिहर मज़दूर रीना की ज़िंदगी के दो महीने इन बीजों की रोपाई में बीतते हैं। वह सुबह-सुबह उठकर भोपाल के कोलार इलाके से दूसरी महिलाओं के साथ मुगलियाछाप जाती हैं।
उन्होंने बताया कि मॉनसून में देरी की वजह से इस मौसम में उनकी कमाई के एकमात्र ज़रिए पर संकट आ गया है। आम तौर पर रोपाई और निराई-गुड़ाई के काम से उन्हें दो से ढाई महीने तक लगातार मज़दूरी मिलती थी। इस काम में उनका आधे से ज़्यादा दिन बीत जाता है, जिसके बदले उन्हें रोज़ाना 300 रुपये मिलते हैं।

दूसरी तरफ़, किसानों का कहना है कि मज़दूरी का खर्च बढ़ गया है। अब मज़दूरों को रोज़ाना 400 से 500 रुपये देने पड़ते हैं, और वे मुश्किल से ही मिल पाते हैं।
पाटीदार ने बताया कि रोपाई का खर्च 8,000 से 10,000 रुपये प्रति एकड़ होगा। अगर उन्हें दोबारा रोपाई करनी पड़ी, तो कुल खर्च बढ़कर 15,000 रुपये प्रति एकड़ हो जाएगा। नर्सरी के खर्च को मिलाकर उन्हें उम्मीद है कि मौसम खत्म होने तक कुल खर्च 30,000 रुपये प्रति एकड़ तक पहुँच जाएगा।
जिन किसानों के पास अपने ट्रैक्टर और पंप हैं, वे इस अतिरिक्त खर्च का कुछ बोझ उठा सकते हैं। लेकिन बाकी किसानों के लिए इस देरी का मतलब सीधा नुकसान हो सकता है।
पाटीदार ने कहा, “जब बारिश होती है, तो किसान मदद के लिए बुलाते हैं। जब बारिश नहीं होती, तो क्या काम होता है?” उनके मुताबिक, बारिश न होने पर मज़दूरों के पास रोपाई का मौसम दोबारा आने तक घर पर बैठे रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता।
कृषि मंत्री की योजना

केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 8 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली में एक उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक के बाद मीडिया को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि वे हर मंगलवार को स्थिति की समीक्षा करते हैं।
जून में देश भर में सामान्य से 33 प्रतिशत कम बारिश हुई थी। जुलाई की शुरुआत से मध्य तक कई राज्यों में हुई बारिश की वजह से यह कमी घटकर 24 प्रतिशत रह गई।
बहुत कम बारिश वाले ज़िलों की संख्या 262 से घटकर 178 हो गई। फिर भी चौहान ने कहा कि सरकार इन 178 ज़िलों पर लगातार नज़र रखे हुए है। इनमें से ज़्यादातर ज़िले महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में हैं।

पूरे देश में बुआई का काम पिछले साल के मुकाबले अभी भी काफी पीछे चल रहा था। पिछले साल इसी समय तक किसान 442.80 लाख हेक्टेयर में बुआई कर चुके थे, जबकि इस साल यह आंकड़ा सिर्फ़ 350.85 लाख हेक्टेयर रहा — यानी 91.95 लाख हेक्टेयर की कमी।
इस देरी का सबसे ज़्यादा असर मक्का, सोयाबीन और कपास की फ़सलों पर पड़ा। मंत्रालय अब देरी वाले इलाकों के किसानों को सलाह दे रहा है कि वे इनकी जगह कम समय में तैयार होने वाली फ़सलें, जैसे मक्का, बाजरा और मूंग, उगाएं।
चौहान ने उन उपायों का भी ज़िक्र किया जो सरकार ने अप्रैल से किए थे।

जून तक चले देशव्यापी “खेत बचाओ” अभियान के तहत मंत्रालय ने 1.24 लाख से ज़्यादा जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। इस अभियान से 80 लाख से ज़्यादा किसानों तक पहुँचकर उन्हें सूखे का सामना कर सकने वाली फ़सलों की बुआई के बारे में सलाह दी गई।
सरकार ने यह भी बताया कि उसने कमी से निपटने के लिए लगभग 1.75 लाख क्विंटल बीजों का राष्ट्रीय भंडार बनाए रखा। जून के आखिर तक 1,14,613 अर्जियां मिलीं, जिनमें से 94,417 किसान क्रेडिट कार्ड मंज़ूर किए गए।
उन्होंने बताया कि एक ‘अल नीनो’ मॉनिटरिंग सेल और फ़सल-मौसम पर नज़र रखने वाला ग्रुप, राज्य-स्तरीय कंट्रोल रूम के साथ मिलकर रोज़ाना हालात पर नज़र रख रहे थे।
जून के आखिर में हुई समीक्षा बैठक के बाद चौहान ने कहा, “हम खेतों को खाली नहीं रहने देंगे। कुछ फ़सलों की खेती के लिए पर्याप्त बारिश होगी, और हमारी तैयारियाँ उसी हिसाब से हैं।”
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