25 अगस्त को सुबह करीब 11 बजे 50 वर्षीय मोहम्मद मकबूल भट मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के वातालबाग गांव में अपने धान के खेत को देखने गए थे। वहां एक एशियाई काला भालू उनका इंतजार कर रहा था।
चेहरे को बचाने के लिए उन्होंने अपना हाथ आगे कर दिया, लेकिन भालू ने उनका हाथ पकड़ लिया। भालू के हमले में भट घायल हो गए। लगभग तुरंत ही पड़ोसी उन्हें इलाज के लिए जिला अस्पताल गांदरबल ले गए।
इसी तरह, 31 अगस्त को दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के तारीगाम गांव में एक भालू ने 45 वर्षीय लतीफा बानो को एक बाग में मार डाला।

कश्मीर में भालू की दो प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें ज्यादातर संघर्ष एशियाई काले भालू से जुड़े हैं। ये भालू जंगलों और निचले पहाड़ी इलाकों में रहते हैं और अक्सर बागों में चले जाते हैं। हिमालयी भूरा भालू मुख्य रूप से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है।
कश्मीर में भालुओं के हमले अक्सर फसल कटाई के मौसम में बढ़ जाते हैं। इस दौरान लोग बागों और खेतों में ज्यादा समय बिताते हैं और फल, फसल के बचे हिस्से और दूसरे खाद्य स्रोत भालुओं को आकर्षित करते हैं। इससे इंसानों और भालुओं के आमने-सामने आने की संभावना बढ़ जाती है।
बाग और खेत इंसानों और भालुओं को एक साथ ला रहे हैं
2023 में Journal of Threatened Taxa में प्रकाशित एक अध्ययन में जम्मू-कश्मीर वन्यजीव संरक्षण विभाग के 2000 से 2020 के बीच दर्ज एशियाई काले भालू के 2,357 हमलों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर हमले जुलाई से नवंबर के बीच हुए। अगस्त में हमलों का मासिक हिस्सा सबसे ज्यादा था।
शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक आवास को बागों और कृषि क्षेत्रों में बदलने को इस संघर्ष का एक प्रमुख कारण बताया।
शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के वन्यजीव विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. खुर्शीद अहमद ने कहा कि फलों की कटाई के मौसम में खतरा बढ़ जाता है।
अहमद ने कहा, “फसल कटाई के मौसम में भालू सिर्फ बागों के फलों से ही आकर्षित नहीं होते, बल्कि मक्का जैसी फसलों की ओर भी आते हैं। जब वे भोजन की तलाश में इन खेतों में आते हैं और वहां लोग काम कर रहे होते हैं, तो उनके आमने-सामने आने की संभावना बढ़ जाती है।”
भालुओं के लिए भोजन के स्रोत सिर्फ पेड़ों पर लगे फल नहीं हैं। गिरे हुए सेब, बागवानी का कचरा और घरों के आसपास पड़ा कूड़ा भी उन्हें कृषि क्षेत्रों और बस्तियों की ओर आकर्षित कर सकता है।
वन्यजीव शोधकर्ता और संरक्षणकर्मी काशिफ फारूक भट ने Ground Report से कहा, “हमने उनके प्राकृतिक आवास वाले इलाकों को इंसानी बस्तियों में बदल दिया है। इसलिए इंसानों और भालुओं के बीच इस तरह का नकारात्मक संपर्क हो रहा है।”

अहमद ने बताया कि भालू फलों की तलाश में बागों में आते हैं। उन्हें भगाने की कोशिश में लोग अक्सर पत्थर फेंकते हैं, जिससे टकराव की स्थिति बन जाती है। गिरे हुए और फेंके गए फलों का सही तरीके से निपटारा करने से इन मुठभेड़ों को कम करने में मदद मिल सकती है।
Greater Kashmir के अनुसार, अगस्त में फसल कटाई का मौसम शुरू होने के बाद से भालू के हमलों में 40 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं और दो लोगों की मौत हुई है।
सरकार ने 2024-25 में मौत के मामलों में 20 लाख रुपये और घायलों को 72 लाख रुपये का मुआवजा दिया है। 2025-26 में घायलों को दिया गया मुआवजा 97 लाख रुपये तक पहुंच गया। अब मौत या स्थायी रूप से अक्षम होने पर परिवार को 5 लाख रुपये और गंभीर चोट के मामले में 2 लाख रुपये मिलते हैं।
मकबूल ने हमले के बाद मुआवजे के लिए आवेदन किया है। लेकिन उन्हें अभी तक मुआवजा नहीं मिला है। उनके परिवार ने गांदरबल के वन्यजीव विभाग से संपर्क किया है और उन्हें उम्मीद है कि मुआवजा जारी किया जाएगा।
मुठभेड़ों को कैसे कम किया जा सकता है?
वन्यजीव संरक्षण विभाग ने बाग मालिकों को सलाह दी है कि बचे हुए सेबों को खुले में छोड़ने के बजाय गड्ढों में डालकर उनका निपटारा करें। विभाग ने कहा है कि फलों की गंध काले भालुओं को आकर्षित कर सकती है।
अगस्त 2026 में दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में वन्यजीव विभाग के एक जागरूकता कार्यक्रम में अधिकारियों ने लोगों को आसपास के इलाकों को साफ रखने, कचरे का सही तरीके से निपटारा करने, खेतों और बागों के आसपास सुरक्षित बाड़ लगाने और वन्यजीवों के दिखाई देने पर तुरंत इसकी सूचना देने की सलाह दी।
काशिफ फारूक भट ने बागों और कृषि क्षेत्रों के आसपास जैविक बाड़ लगाने के लिए सरकार की मदद की जरूरत बताई।
क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
भालुओं के साथ मुठभेड़ जम्मू-कश्मीर में इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष का हिस्सा है।
जम्मू-कश्मीर सरकार ने फरवरी 2026 में विधानसभा को बताया कि 2023 से 2025 के बीच भालू, तेंदुए और अन्य जंगली जानवरों सहित वन्यजीवों से जुड़े इंसान-वन्यजीव संघर्ष के 15,661 मामले सामने आए।
इन मामलों में 32 लोगों की मौत हुई और 350 लोग घायल हुए।
सरकार ने कहा कि उसकी व्यवस्था संरक्षित क्षेत्रों के साथ-साथ उन जगहों पर भी लागू है जहां इंसानों और वन्यजीवों का सामना होता है। जम्मू-कश्मीर में वन्यजीवों से जुड़ी आपात स्थितियों के लिए चौबीसों घंटे प्रतिक्रिया देने वाले 42 कंट्रोल रूम बनाए गए हैं। इन केंद्रों में बेहोश करने वाली बंदूकें, दवाएं, पकड़ने वाले जाल, पिंजरे, बचाव उपकरण और वाहन उपलब्ध हैं।
वन्यजीव संरक्षण विभाग ने एक एडवाइजरी भी जारी की है, जिसमें लोगों से कहा गया है कि वे खासकर सुबह और शाम के समय अकेले जंगलों में न जाएं। विभाग ने लोगों को वन्यजीव दिखाई देने पर उनके पास न जाने और उन्हें भगाने की कोशिश न करने की सलाह दी है।
विभाग ने संघर्ष की स्थिति में बेहतर प्रतिक्रिया के लिए सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल का भी प्रस्ताव दिया है। तौहीद अहमद देवा ने कहा कि विभाग ने संघर्ष की स्थिति में प्रतिक्रिया को बेहतर बनाने के लिए वन सुरक्षा बल, वन विभाग और वन्यजीव विभाग को मिलाकर एक संयुक्त कंट्रोल फोर्स बनाने का प्रस्ताव दिया है।
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