कश्मीर के सिंध बेसिन के 13 ग्लेशियरों के पास जमीन की ऐसी बनावट है, जहां बर्फ के पीछे हटने पर पानी जमा हो सकता है। इससे नई ग्लेशियर झीलें बनने की संभावना बन रही है। यह बात एक नए अध्ययन में सामने आई है।
अगस्त में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिमोट सेंसिंग में प्रकाशित इस अध्ययन में 2000 से 2024 के बीच सिंध बेसिन के ग्लेशियरों में आए बदलावों की जांच की गई। शोधकर्ताओं ने ग्लेशियरों के नुकसान और उनके पीछे हटने को मापने के लिए सैटेलाइट तस्वीरों, ऊंचाई के आंकड़ों और बर्फ की मोटाई के अनुमानों का इस्तेमाल किया।
सिंध बेसिन मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में है। सिंध नदी इस बेसिन से होकर बहती है और शादीपोरा के पास झेलम में मिल जाती है। बेसिन में 89 ग्लेशियर हैं, जिनमें से 18 की शोधकर्ताओं ने विस्तार से जांच की।

अध्ययन में यह भी पता चला कि जांचे गए सभी 18 ग्लेशियरों की बर्फ घटी है। साल 2000 में इन सबका कुल क्षेत्रफल 42.88 वर्ग किलोमीटर था। 2024 तक यह घटकर 34.3 वर्ग किलोमीटर रह गया। यानी 24 साल में इन ग्लेशियरों ने करीब 8.6 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र गंवा दिया, जो इनके नक्शे में दर्ज क्षेत्र का पांचवां हिस्सा है।
अध्ययन ऐसे बदलावों की ओर इशारा करता है जो बेसिन में जमा पानी और ग्लेशियरों के पीछे हटने के बाद बची जमीन, दोनों पर असर डाल सकते हैं।

13 ग्लेशियर स्थलों पर बन सकती हैं झीलें
कोलाहोई ग्लेशियर 2000 से 2024 के बीच करीब 450 मीटर पीछे खिसक गया। 2000 से 2022 के बीच नेहनार ग्लेशियर ने अनुमानित 58.50 मिलियन टन बर्फ गंवाई, जबकि कोलाहोई ने करीब 120.96 मिलियन टन।
नेहनार में संभावित झील का सबसे बड़ा क्षेत्र, करीब 0.2223 वर्ग किलोमीटर, पाया गया। कोलाहोई में संभावित क्षेत्र करीब 0.0567 वर्ग किलोमीटर था।
सोनमर्ग के पास थजीवास ग्लेशियर में भी ये बदलाव दिख रहे हैं। हमारी पिछली रिपोर्ट में हमने इस ग्लेशियर में सिकुड़ती बर्फ और सर्दियों में कम बर्फ जमा होने को दर्ज किया था। थजीवास तेजी से पीछे हटा है। 2000 से 2024 के बीच इसका निचला सिरा करीब 413 मीटर पीछे चला गया, यानी हर साल औसतन करीब 17.2 मीटर।
अध्ययन यह नहीं कहता कि 13 खतरनाक झीलें पहले से बन चुकी हैं। वह उन जगहों की पहचान करता है, ग्लेशियरों के पास या उनके नीचे, जहां बर्फ के पीछे हटते रहने पर पिघला हुआ पानी जमा हो सकता है।
कारण
अध्ययन में सिंध बेसिन के ग्लेशियरों के घटने को बढ़ते तापमान, घटती बारिश और बर्फबारी और एरोसोल में बदलाव से जोड़ा गया है। 1980 से 2024 के बीच तापमान हर साल करीब 0.06 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, जबकि सालाना बारिश हर साल करीब 6.14 मिलीमीटर घटी।
शोधकर्ताओं ने सर्दियों की बर्फबारी में कमी पाई। इसका मतलब है कि गर्मी के महीनों में जो बर्फ पिघलती है, उसकी भरपाई के लिए कम बर्फ बची।

अध्ययन में एरोसोल, जिनमें ब्लैक कार्बन भी शामिल है, को भी देखा गया। ये कण बर्फ पर जम सकते हैं और उसकी सतह को काला कर देते हैं। इससे सतह ज्यादा गर्मी सोखती है, जिससे बर्फ और तेजी से पिघल सकती है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर के सेंटर फॉर ओशन, रिवर्स, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंसेज में एसोसिएट प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टीपुरत ने कहा कि बड़े पैमाने पर तापमान का बढ़ना मुख्य कारण है।
कुट्टीपुरत ने कहा, “बड़े पैमाने पर तापमान का बढ़ना सबसे बड़ा कारण होने की संभावना है, जबकि बर्फबारी और बारिश में कमी और एरोसोल इसे और बढ़ाने वाले अहम कारक हैं।”
‘नेगेटिव मास बैलेंस’
अध्ययन में पाया गया कि ग्लेशियरों का मास बैलेंस ‘नेगेटिव’ रहा। यानी इस दौरान ग्लेशियरों ने जितनी बर्फ पाई, उससे ज्यादा गंवाई।
ग्लेशियर पानी को बर्फ के रूप में जमा करके रखते हैं और पिघलने पर उसे छोड़ते हैं। बर्फ के घटने से नदियों और नालों में पहुंचने वाले पिघले पानी की मात्रा और समय दोनों बदल सकते हैं। खासकर उन इलाकों में जहां पानी के दूसरे स्रोत कम हैं।
अध्ययन यह नहीं कहता कि सिंध नदी या आगे की दूसरी नदियां सूख जाएंगी। वह यह बताता है कि बेसिन में जमा बर्फ घट रही है, जिससे नीचे के इलाकों में पहुंचने वाले पिघले पानी की मात्रा और समय बदल सकते हैं।
ग्लेशियर के आकार की लगातार निगरानी
इन संभावित झीलों से कितना खतरा होगा, यह उनके आकार, आसपास की ढलानों की स्थिरता और नीचे की तरफ क्या मौजूद है, इस पर निर्भर करेगा।
जर्नल ऑफ ग्लेशियोलॉजी में 2026 में प्रकाशित एक अलग अध्ययन में 1992 से 2024 के बीच कश्मीर हिमालय की 155 ग्लेशियर झीलों का नक्शा बनाया गया। इसमें पाया गया कि ग्लेशियर की बर्फ से सीधे जुड़ी झीलों का क्षेत्रफल 26 प्रतिशत बढ़ गया। साथ ही पांच झीलों की पहचान ऐसी झीलों के रूप में हुई, जिनके फटने (GLOF) की आशंका बहुत ज्यादा है।
सिंध बेसिन के नए नतीजे उन जगहों की सूची में कुछ और नाम जोड़ते हैं, जो ग्लेशियरों के पीछे हटने से बदल सकती हैं।
शोधकर्ताओं ने ग्लेशियरों के आकार, मोटाई, उनके खिसकने और संभावित झील बनने की लगातार निगरानी की मांग की है। सैटेलाइट तस्वीरों से पूरे बेसिन में हो रहे बदलावों पर नजर रखी जा सकती है। वहीं फील्ड सर्वे से ग्लेशियर के अगले हिस्सों, नई खुली जमीन और उन जगहों की जांच की जा सकती है जहां पानी जमा हो सकता है।
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