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तीसरी फसल के रुप में ‘मूंग’ क्यों उगाते हैं किसान?

MP में मूंग की फसल, MSP खरीद कोटा विवाद, ई-टोकन खाद संकट और किसानों के आंदोलन पर ग्राउंड रिपोर्ट। जानिए किसानों की जमीनी सच्चाई।
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मध्य प्रदेश के सिंचाई संपन्न क्षेत्रों में ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती एक महत्वपूर्ण तीसरी फसल के रूप में उभरी है। गेहूं और चने की कटाई के तुरंत बाद, मार्च के अंत में इसकी बुवाई की जाती है और यह मात्र 60 से 70 दिनों में (अप्रैल-मई के दौरान) पककर तैयार हो जाती है।

किसानों के लिए मूंग केवल एक फसल नहीं, बल्कि वित्तीय स्थिरता का जरिया है। सीहोर जिले की भैरुंदा तहसील के निम्ना गांव में रहने वाले किसान हरिशंकर जाट के मुताबिक सोयाबीन जैसी खरीफ फसलें मौसम और अत्यधिक बारिश पर निर्भर होती हैं, जहां अक्सर प्रति एकड़ केवल 2 से 4 बोरे का ही उत्पादन मिल पाता है, जिससे लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। इसके विपरीत, गर्मी के मौसम में मूंग की फसल कम जोखिम भरी और अधिक सुरक्षित होती है।

भैरुंदा के छिदगांव मौजी के किसान परमसुख पटेल के मुताबिक, एक एकड़ खेत में मूंग उगाने के लिए बीज, खाद, बखरनी, कीटनाशक और कटाई मिलाकर ₹30,000 से ₹40,000 तक की कुल लागत आती है। यदि फसल सामान्य रहे तो औसतन 4 से 8 क्विंटल प्रति एकड़ तक का उत्पादन मिल जाता है। यदि सरकार उचित समर्थन मूल्य पर पूरी फसल खरीदे, तो किसानों को प्रति एकड़ लगभग ₹80,000 तक का राजस्व मिलता है, जिससे उन्हें शुद्ध मुनाफा हासिल होता है।

सरकारी खरीद कोटा विवाद और किसानों का आंदोलन

इस वर्ष किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार की उपार्जन (खरीद) नीति को लेकर आई। सरकार ने प्रति एकड़ सरकारी खरीद की सीमा घटाकर मात्र 1 क्विंटल 20 किलो कर दी। जबकि वास्तविकता यह थी कि खेतों में औसत उत्पादन 4 से 8 क्विंटल के बीच हुआ था।

खरीद कोटा सीमित होने के कारण किसानों को अपनी बची हुई उपज खुले बाजार या स्थानीय मंडियों में बेचनी पड़ रही थी, जहां मूंग के दाम घटकर ₹4,000 से ₹5,000 प्रति क्विंटल तक आ गिरे। इससे किसानों को प्रति एकड़ ₹2,000 से अधिक का सीधा नुकसान हो रहा था। इस फैसले के खिलाफ किसानों ने सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन किया। दबाव में आकर प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से नया आदेश जारी किया और खरीद का कोटा बढ़ाकर उत्पादन का 60% (लगभग 3 क्विंटल प्रति एकड़) तय किया।

सुखाने वाली दवाओं का विवाद

छिदगांव मौजी में किसान परमसुख अपनी मूंग की फसल दिखाते हुए | फोटो-पल्लव जैन

मूंग की 2 महीने की छोटी अवधि वाली फसल में कीड़ों और ईल्लियों का प्रकोप बहुत तेजी से होता है, जिसके लिए किसानों को 4 से 6 बार भारी कीटनाशक स्प्रे करने पड़ते हैं।

जून के महीने में जब बारिश का मौसम नजदीक आता है और मजदूर उपलब्ध नहीं होते, तब हरी फसल को तुरंत सुखाकर कंबाइन हार्वेस्टर से काटने के लिए किसान सुखाने वाली दवाओं (ड्राइंग एजेंट्स/पैराक्वाट) का छिड़काव करते हैं। जाट कहते हैं, पिछली बार सरकार ने यह तर्क देते हुए फसल रिजेक्ट कर दी थी कि इन रसायनों से खाद्यान्न में जहर की मात्रा बढ़ती है।

इस पर पटेल का स्पष्ट कहना है कि यदि यह रसायन हानिकारक है, तो सरकार को इन दवा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, न कि मजबूर किसानों को सजा देनी चाहिए।

खाद वितरण प्रणाली और ई-टोकन व्यवस्था का संकट

खरीद की समस्याओं के साथ-साथ किसानों को खाद वितरण में भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। सरकार द्वारा लागू ई-टोकन व्यवस्था के तहत किसानों को अपने गांव की सोसायटियों की बजाय दूर-दराज के शहरों या अन्य सोसायटियों का आवंटन मिल रहा था, जहां पहुंचने पर भी खाद उपलब्ध नहीं होता था।

इसके अलावा, सरकार और सोसायटियों द्वारा किसानों पर टैगिंग की जा रही थी। यानी यूरिया या DAP खरीदने के लिए उन्हें महंगे और अनावश्यक खाद (जैसे NPK या अन्य पूरक खाद) जबरन खरीदने पर मजबूर किया जा रहा था, जिससे उनकी खेती की लागत ₹1,250 की जगह ₹1,800 से ₹2,400 तक बढ़ रही थी। किसानों के लगातार विरोध के बाद अंततः प्रशासन को ई-टोकन खाद वितरण प्रणाली को भी स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा।

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Authors

  • Climate journalist and visual storyteller based in Sehore, Madhya Pradesh, India. He reports on critical environmental issues, including renewable energy, just transition, agriculture and biodiversity with a rural perspective.

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  • Rajeev Tyagi is an independent environmental journalist in India reporting on the intersection of science, policy and public. With over five years of experience, he has covered issues at the grassroots level and how climate change alters the lives of the most vulnerable in his home country of India. He has experience in climate change reporting, and documentary filmmaking. He recently graduated with a degree in Science Journalism from Columbia Journalism School. When he is not covering climate stories, you’ll probably find Tyagi exploring cities on foot, uncovering quirky bits of history along the way.

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