भारत पर 100% टैरिफ लगाएगा अमेरिका, भारत अमेरिका से एलपीजी आयात बढ़ाएगा, खरीफ की बोवाई कम; धान का रकबा 4.4% घटा, आत्मनिर्भर पंचायत कार्यक्रम में केंद्र का सिर्फ तकनीकी सहयोग। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल खरीदने वाले भारत सहित 5 देशों पर 100% टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर दिया है। शुरुआत में रूस से तेल खरीदने पर 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, जिसे 23 जुलाई को घटाकर 100% किया गया था।
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एलपीजी आपूर्तिकर्ता बन गया है और अब इस लक्ष्य को 10% से बढ़ाकर लगभग 67% कर दिया गया है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार, शुक्रवार तक देश भर में खरीफ फसलों की बुवाई 113.64 मिलियन हेक्टेयर तक पहुँच गई है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 2% कम है। सबसे बड़ी खरीफ फसल, धान (paddy) के रकबे में सबसे भारी गिरावट आई है; इसका रकबा 4.4% घटकर 34.48 मिलियन हेक्टेयर रह गया है।
पंचायती राज मंत्रालय ने ‘आत्मनिर्भर पंचायत’ कार्यक्रम की नई गाइडलाइन जारी की है। जिसका पहला चरण 4 साल तक चलेगा। पंचायतें अब बैंक लोन और सीएसआर (CSR) के जरिए वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज, ग्रामीण हाट और सोलर पावर प्लांट जैसी व्यावसायिक परियोजनाएं बना सकेंगी। केंद्र सरकार पंचायतों को केवल तकनीकी सहायता देगी।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सिंध नदी में रेत खनन की जांच के लिए तीन सदस्यीय संयुक्त समिति के गठन का निर्देश दिया है। यह समिति भिंड और दतिया जिलों के 24 गांवों में रेत खनन और उसकी इकोलॉजी पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करेगी।
आधा मानसून बीतने के बाद भी भोपाल के मुख्य जल स्रोतों जैसे बड़ा तालाब और केरवा डैम में आवश्यकता का केवल आधा पानी ही बचा है। बड़ा तालाब का जलस्तर पिछले साल 5 अगस्त की तुलना में 4.65 फीट नीचे है।
विस्तृत चर्चा
बीते दिनों ग्राउंड रिपोर्ट में ई-गिरदावरी पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। पल्लव जैन और राजीव त्यागी के यह रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश में इस सिस्टम की क्या दिक्कतें हैं? हमारे एडिटर राजीव त्यागी से जानिए उनके अनुभवों के बारे में।
रिपोर्टर्स डायरी: ई-गिरदावरी की समस्याएं
पिछले महीने हमने ई-गिरदावरी पर एक विस्तृत खबर की है। मध्य प्रदेश उन चुनिंदा राज्यों में से जो ई-गिरदावरी शुरू करने में बड़ा अग्रसर था। तो हम समझना चाह रहे थे कि उससे क्या लाभ हुआ है किस स्तर पर लाभ हुआ है?
हम देखते हैं कि मध्य प्रदेश में पटवारी, जो गिरदावरी कराने के लिए बहुत जरूरी है, वो बहुत सारी चीजों को लेकर प्रोटेस्ट कर रहे हैं। हम ये समझना चाह रहे थे कि समस्याएं कहां आ रही है? उनको उनकी क्या राय है और डिजिटल प्रणाली से लोगों को कितना फायदा हुआ है?
हमें अक्सर लगता है कि अगर सरकारी रिकॉर्ड्स को डिजिटल कर दिया जाएगा तो पारदर्शिता बढ़ेगी, गलतियां कम होंगी और तेज़ी आएगी। ऐसा नहीं है कि आती नहीं है। लेकिन ये देखना जरूरी है कि जो स्टेक होल्डर्स हैं इस पूरे प्रोसेस में उनको कितना लाभ हो रहा है? या उनको कितनी समस्याएं आ रही हैं? इस स्टोरी के दौरान हम यही समझने की कोशिश कर रहे थे।
क्या होती है गिरदावरी?
गिरदावरी वो ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सरकारी कर्मचारी (अधिकतर पटवारी) खेतों में जाकर दर्ज करता है कि किसान ने खेत में कौन-कौन सी फसल उगाई है। सुनने में तो ये बहुत साधारण सा रिकॉर्ड है पर ये बहुत जरूरी है। इससे यह तय होता है कि खेत के कितने हिस्से में कितने प्रतिशत फसल लगी है।
ये डाटा बहुत जरूरी। इससे तय होता है कि आपका फर्टिलाइज़र्स कितना इस्तेमाल होगा? सम्बंधित साल में आपका बीमा कौन सी फसल का होगा? सब कुछ इससे ही निर्धारित होता है। तो ये बहुत जरूरी रिकॉर्ड है।
कैसे की रिपोर्टिंग?
अगर मैं अपनी रिपोर्टिंग की बात करूं तो हमने किसानों से बात की, पटवारियों से बात की, हमने यूथ सर्वेयर्स जो नई प्रणाली के तहत सीजन दर सीजन भर्ती किए जा रहे हैं; इन सभी से बात की।
हमने जानना चाहा कि उनकी क्या समस्याएं हैं? उनको क्या फायदा या नुकसान हुआ है?
रिपोर्टिंग के दौरान कई किसानों ने मुझे बताया कि उनके खेतों में जो फसल लगी है वो रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हुई है या फिर कोई और दर्ज कर दी गई है। मान लीजिए कि आपने कोदो उगाया है पर गिरदावरी में धान दर्ज है।
इसमें समस्या ये आती है कि जब आप बेचने जाएंगे तो आप उसको बेच नहीं पाएंगे।
गलत कौन है?
अगर सब कुछ डिजिटल है तो इसमें गलत कौन है? हमने जाके पटवारियों से बात की के ऐसा कैसे हो सकता है?
पटवारी अपनी-अपनी राय रखते हैं। वो किसानों पर डालते हैं कि किसान ने ऐसा बोला था इसलिए हो रही है या फिर हमसे कोई गलती तो नहीं हुई होगी। ऐसी सारी बातें होती हैं।
फिर अगर आप पटवारियों से पूछे तो वो बताते हैं कि उन पर कितना काम का भार है। मान लीजिए कि यूथ सर्वर 1000 खसरा ही कर सकता है पर उनको 33000 खसरे करने होते हैं एक समय पर।
डिजिटल सिस्टम की तो आप समस्या जानते ही हैं कि बेसिकली नेटवर्क नहीं आ रहा है, आपको ग्लिच आ रहे हैं उन सब चीजों में तो बहुत सारी समस्याएं तो हमेशा रहती हैं।
जब हमने सर्वेयर्स से बात की तो वो अपनी समस्या बताते हैं कि उनकी पेमेंट ही नहीं हुई है।
जब हमने अधिकारियों से बात की तो वो बोलते हैं कि पेमेंट तो सारी हो चुकी है पर जिन लोगों के बैंक अकाउंट्स वेरीफाई नहीं होते उनके भुगतान में देरी होती है।
कुल मिलाकर अलग-अलग सिस्टम में ऐसा लगता है कि लगभग हर स्टेज पे समस्याएं हैं और एक दूसरे पर इसका दोष डाला जा रहा है।
दोष तय कर पाना मुश्किल है
हमने बहुत सालों से सुना है कि हम डिजिटल की तरफ अग्रसर हो रहे हैं।
किसान रजिस्ट्रेशन से लेकर किसान आईडी वगैरह से बनाते हुए हम बहुत डिजिटल की तरफ जा रहे हैं। यहां सबसे बड़ी बात ये है कि अगर हर एक स्तर पर समस्याएं हैं तो कहां पे शुरू करें कि वो समस्याएं कम हो घटती रहे और एक किसान को फसल बेचने में दिक्कत ना हो।
हमने किसानों से बात की जिन्होंने नुकसान में अपनी फसलें बेंची। ये वो किसान थे जिनकी गिरदावरी गलत हुई थी। किसान लगातार ये बोलता है कि पटवारी नहीं आता। पटवारी लगातार ये प्रोटेस्ट कर रहे हैं कि उनकी आय बढ़ाई जाए।
तो यह समझना बहुत मुश्किल है कि आखिर किसको किस पर सवाल उठाया जाए?
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ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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