गुना जिला के पतलेश्वर गांव में खेत के बीच एक पक्का घर दिखाई पड़ता है। सामने की दीवार पर प्रधानमंत्री आवास योजना से संबंधित जानकारी लिखी हुई है। पहली नज़र में यह कोई आम पीएम आवास दिखाई देता है।
घर के बाहर बड़ा सा आंगन है, जहां बाएं तरफ ट्रैक्टर खड़ा है और दाएं तरफ मवेशी बंधे हैं। पास में ही ट्यूबवेल और छत से रेन वाटर हार्वेस्टिंग का पाइप सीधा ज़मीन में उतर रहा है।
आंगन में बैठे प्राणचंद राव सामने लगे एक बोर्ड की ओर इशारा करते हैं। दीवार पर ‘नेस्ट प्लस सिल्वर’ प्रमाणपत्र लगा हुआ है। राव के पीएम आवास को जनवरी 2026 में इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (IGBC) द्वारा यह प्रमाणपत्र प्रदान किया गया था। यह देश का पहला सर्टिफाइड ग्रीन पीएम आवास है।
राव ने एक स्थानीय अधिकारी के कहने पर अपने घर का ‘ग्रीन सर्टिफिकेशन’ करवाया है। इसके लिए उन्होंने अपनी जेब से 10 हज़ार से भी अधिक रूपए खर्च किए हैं। अधिकारी भी मानते हैं कि सर्टिफिकेशन का खर्च अधिक है। फिर भी उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिली। मगर इस प्रमाणपत्र का फायदा क्या है? इसका जवाब हितग्राही भी नहीं जानते।

क्या होते हैं ‘ग्रीन घर’?
असल में राव के घर को आईजीबीएस नेस्ट प्लस सर्टिफिकेट मिला है। इसे हैदराबाद स्थित संस्था इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल द्वारा दिया जाता है। यह काउंसिल देश में सभी के लिए ‘सस्टेनेबल बिल्ड इनवायरमेंट’ बनाने के उद्देश्य से नए ग्रीन बिल्डिंग रेटिंग प्रोग्राम बनाने, सर्टिफ़िकेशन सेवा और ग्रीन बिल्डिंग ट्रेनिंग प्रोग्राम देने का काम करती है।
काउंसिल द्वारा अलग-अलग तरह की इमारतों को विभिन्न तरह के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं।
आईजीबीसी नेस्ट रेटिंग सिस्टम के तकनीकी मानदंडों के अनुसार, ‘नेस्ट प्लस’ ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के उन व्यक्तिगत मकानों के लिए एक ग्रीन सर्टिफिकेशन फ्रेमवर्क है, जिनका अधिकतम निर्मित क्षेत्र 300 वर्ग मीटर तक होता है।
इसके तकनीकी मापदंडों के अनुसार, घरों में प्राकृतिक रोशनी (डे-लाइटिंग), हवादार खिड़कियों (क्रॉस-वेंटिलेशन), सूखा-गीला कचरा प्रबंधन और वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) की व्यवस्था अनिवार्य है। इसमें न्यूनतम 50 क्रेडिट पॉइंट्स अर्जित करने पर ‘सिल्वर’ स्तर का प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।
राव के मकान को देखकर भी यह स्पष्ट अनुभव होता है कि इसमें दिन के समय बिजली की रोशनी की आवश्यकता नहीं पड़ती। हवा के आवागमन (क्रॉस-वेंटिलेशन) के लिए खिड़कियों की समुचित व्यवस्था की गई है। मकान के बाएं और पिछले हिस्से में फल व सब्जियों के पौधे लगे हैं।
सर्टिफिकेशन में लगाए 10 हज़ार
राव के बेटे सुनील कुमार भारद्वाज ने बताया कि उन्हें पीएम आवास के लिए शासन की तरफ से 1.50 लाख रुपए प्राप्त हुए थे। इसके अलावा उन्होंने लगभग 3.50 लाख रुपए खुद से खर्च किए हैं।
मकान बनने के बाद जनपद कार्यालय के एक अधिकारी ने राव के परिवार को पर्यावरण अनुकूल घर बनाने के बारे में बताया।
आरोन जनपद पंचायत के सब-इंजीनियर राजेश शर्मा हमसे बात करते हुए कहते हैं, “यह प्रयोग गुना जिला पंचायत सीईओ अभिषेक दुबे के नए नवाचारों में से एक है। उन्हीं के मार्गदर्शन में हमने ग्रामीणों से बात की और उन्हें पर्यावरण के अनुकूल मकान तथा उसके फायदों के बारे में बताया। कई लोगों से चर्चा के बाद हितग्राही प्राणचंद राव सहमत हुए।”
सहमती के बाद मकान में रेन वाटर हार्वेस्टिंग और छत पर सफ़ेद रंग करवाने जैसे काम किए गए। इसके लिए लगभग 50 हज़ार रूपए का खर्च राव द्वारा ही वहां किया गया।
शर्मा कहते हैं, “कमियों को दुरुस्त करने के बाद आईजीबीसी सर्टिफिकेशन के लिए आवेदन किया गया।”

काउंसिल के शुल्क ढांचे के अनुसार इस सर्टिफिकेशन के लिए ₹10,000 शुल्क और 18% जीएसटी (कुल ₹11,800) निर्धारित है, जिसे ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और आवेदन सबमिशन के समय ही अग्रिम भुगतान करना होता है। पतलेश्वर गांव के इस आवास के मामले में यह राशि किसी सरकारी मद या बजट के बजाय स्वयं हितग्राही के बैंक खाते से ऑनलाइन ट्रांसफर की गई।
इस पर शर्मा कहते हैं “यह सर्टिफिकेट किसी विभाग को जारी न होकर सीधे मकान मालिक के नाम से जारी होता है, इसीलिए राशि हितग्राही के खाते से ही आईजीबीसी में जमा की गई।”
आवेदन के बाद इंदौर से टीम ने मकान का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया और आईजीबीसी के अधिकारियों को वीडियो कॉलिंग के माध्यम से मकान की स्थिति दिखाई। इसके बाद आईजीबीसी ने पतलेश्वर गांव के इस मकान को आवश्यक शर्तों के अनुरूप पाते हुए सर्टिफिकेशन के लिए योग्य माना।
ग्रामीणों में इसे लेकर कितना उत्साह?
यह ग्रीन रेटिंग सर्टिफिकेट केवल 3 वर्षों के लिए वैध होता है। 3 वर्ष की समय-सीमा पूरी होने के पश्चात इस प्रमाणपत्र को प्रभावी रखने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत नवीनीकरण (Recertification) कराना अनिवार्य होता है।
इस बात की जानकारी न तो हितग्राही परिवार के पास है और ना ही जनपद पंचायत के इंजीनियर राजेश शर्मा के पास।
ग्राम पंचायत पतलेश्वर के सचिव देवेंद्र यादव बताते हैं, “यह ग्रीन बिल्डिंग इसलिए बनी क्योंकि इसके आगे-पीछे पेड़-पौधे लगे हैं और लोकेशन अच्छी थी। मकान में हवा के लिए खिड़कियां-जंगले बने हुए थे। इसी आधार पर इंजीनियर साहब ने इसे पसंद किया। हितग्राही जागरूक थे, तो उन्होंने छत पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगा लिया।”
गांव के अन्य लोगों को जागरूक करने के सवाल पर यादव ने कहा कि जब अन्य ग्रामीणों से ग्रीन बिल्डिंग बनाने की बात की जाती है, तो वे अपनी आर्थिक समस्या बताने लगते हैं। इसलिए फिलहाल गांव में सिर्फ एक ही ग्रीन बिल्डिंग है।
व्यावहारिक लाभ और नीतिगत अड़चनें
इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (IGBC) के आधिकारिक विधिक दस्तावेजों के अनुसार, इस ग्रीन सर्टिफिकेट को प्राप्त करने से मुख्य रूप से तीन बड़े लाभ मिलते हैं: विभिन्न राज्यों के नगरीय निकायों द्वारा संपत्ति कर (Property Tax) में 5% से 10% की विशेष छूट। वित्तीय संस्थानों द्वारा होम लोन की ब्याज दरों में तकनीकी सब्सिडी। शहरी विकास विभागों द्वारा नक्शा पास कराते समय अतिरिक्त निर्माण क्षेत्र (FAR) की विधिक अनुमति।
प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के अंतर्गत आने वाले मकानों में इन लाभों को प्राप्त करने में बड़ी वैधानिक रुकावटें हैं। मुख्य कारण यह है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय के नियमों के अनुसार पीएम आवास योजना के तहत बने मकानों पर न्यूनतम 5 वर्षों का अनिवार्य लॉक-इन पीरियड लागू होता है। इस कारण इस निर्मित ढांचे को न तो बाज़ार में बेचा जा सकता है और न ही बैंक में गिरवी रखकर कोई नया कमर्शियल लोन लिया जा सकता है। इसके अलावा ग्राम पंचायत के दायरे में होने के कारण इस मकान पर शहरी निकायों जैसा भारी संपत्ति कर भी लागू नहीं होता।

क्या है भविष्य की योजना?
इस नवाचार के नीतिगत, वित्तीय और तकनीकी पहलुओं पर स्पष्टीकरण के लिए जब जिला पंचायत गुना के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) अभिषेक दुबे से संपर्क किया गया, तो उन्होंने इन प्रश्नों के उत्तर के लिए जनपद पंचायत आरोन के सब-इंजीनियर राजेश शर्मा से बात करने के लिए कहा।
सब-इंजीनियर राजेश शर्मा ने बताया कि उनके विभाग द्वारा अन्य हितग्राहियों को भी इस प्रकार के पर्यावरण-अनुकूल निर्माण के लिए प्रेरित किया जा रहा है। साथ ही, इन ग्रीन बिल्डिंग्स को आगामी समय में सोलर एनर्जी (सौर ऊर्जा) सिस्टम से जोड़ने के लिए भी प्रशासनिक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं।
ग्रामीणों पड़ते आर्थिक बोझ और इससे होने वाले फायदे का सवाल पूछने पर शर्मा कहते हैं, “सर्टिफिकेशन मकान की योग्यता को प्रमाणित करता है और हो सकता है कि आगे चलकर हितग्राही को इसके कुछ लाभ मिलें।” वह ये स्वीकार करते हैं कि सर्टिफिकेशन की शुल्क राशि अधिक है और इसे कम किया जाना चाहिए।
हालांकि राव को खुद से इसका खर्च वहन करने में कोई शिकायत नहीं है। मगर वो ये ज़रूर कहते हैं कि सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद भी उन्हें कोई फायदा भी नज़र नहीं आता।
मगर क्या पीएम आवास (ग्रामीण) जैसी योजनाओं के हितग्राहियों के लिए खुद से सर्टिफिकेशन का खर्च वहन करना ज़रूरी है? क्या हितग्राही हमेशा इस सर्टिफिकेट की शर्तों को पूरा करने के लिए बाध्य है? यदि राव जैसे परिवार बाद में ऐसा नहीं कर पाते तो क्या होगा? इन सवालों के जवाब हमने काउंसिल से मेल के ज़रिए मांगे हैं। रिपोर्ट पब्लिश किए जाने तक हमें यह जवाब नहीं मिले हैं।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
लेट मानसून: मिर्च उत्पादकों की बढ़ी चिंता, आक्रोशित किसानों का चक्काजाम
अल-नीनो का खतरा, देरी से बुवाई; अब मुसीबत में सोयाबीन किसान
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।
Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India
We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.
Connect With Us
Send your feedback at greport2018@gmail.com
Newsletter
Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.
When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.
Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.





