जुलाई 2025, नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बुरहानपुर की तत्कालीन कलेक्टर भव्या मित्तल स्टेज पर ‘प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरुष्कार’ ले रही हैं। जिले को यह ईनाम देश के पहले ‘हर घर जल सर्टिफाइड’ जिला होने के कारण मिला। यानि जिले के सभी गांवों में नल से शुद्ध जल पहुंचने लगा है।
मई 2026, बुरहानपुर। धूलकोट क्षेत्र के रेखलिया झिरा गांव के रहने वाले कुंवर सिंह अपने किसी रिश्तेदार की शादी में गांव से बाहर गए थे। घर में न पानी था न पानी भरने वाला। सो उनके बच्चे खुद ही पेड़ से रस्सी बांध कर एक कच्चे सूखे कुएं में उतर गए। पानी मटमैला था जिसे साफ़ करने के लिए घर में फिटकरी होना भी मुश्किल है। यही पानी सिंह कैसे यहां रहने वाले अन्य ग्रामीण आदिवासी पीते हैं।
मगर यह केवल एक गांव की कहानी नहीं है। धूलकोट क्षेत्र के कई आदिवासी बाहुल्य गांव इसी तरह कच्चा कुआं खोदकर पानी पी रहे हैं। उनके घरों तक न तो जल पहुंचा ना ही नल। यह लोग बड़े से गड्ढेनुमा संरचना से रोज़ पहाड़ियों में स्थित अपने घर तक पानी ढोते हैं। यह पानी मटमैला और कहीं-कहीं बदबूदार है। ग्रामीण कहते हैं कि बारिश होते ही आस-पास का कचरा और मल-मूत्र इन्हीं कुओं में भर जाता है। यानि प्रशासनिक दावों के बरक्स ये लोग अब भी साफ़ पानी के लिए 12 महीना संघर्ष करने को मजबूर हैं।

पुराने गांव में नल यहां नहीं
कुंवर सिंह हमसे बताते हैं कि हर साल मार्च शुरू होते ही उनके गांव में पानी की समस्या गहरा जाती है। इसी से निपटने के लिए उन्होंने लगभग 5 साल पहले खुद से ही एक कुआं खोदा। मगर जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती यह सूखने लगता, चूंकि कुआं कच्चा है इसलिए गाद भरने पर इसे वो खुद ही साफ़ करते हैं।
वह कहते हैं कि इस कुएं से गांव के 30 परिवार के लोग पानी पीते हैं।
रेखलिया झिरा दो हिस्से में बसा हुआ है। एक हिस्सा पक्की सड़क से जुड़ा हुआ है वहीं दूसरा पहाड़ियों के बीच थोड़ा अंदर की ओर है।
लगभग 4 साल पहले तक मुख्य या पुराने गांव में भी पानी की ऐसी ही समस्या थी। तब ग्रामीणों ने कलेक्टर कार्यालय का घेराव कर पानी की सुविधा मांगी। परिणामस्वरूप गांव के पुराने हिस्से में पानी के लिए नल और हैण्डपंप लग गए। मगर जिस हिस्से में सिंह रहते हैं वो अब भी वंचित है।
सिंह ने कुछ समय पहले पंचायत से यह दरख्वास्त की के वह उनके कुएं को पक्का कर दे। मगर जवाब मिला कि चूंकि यह कुआं ‘कपिलधारा’ योजना के अंतर्गत नहीं है इसलिए पंचायत इसके लिए मदद नहीं कर सकती।
हालांकि जब सिंह के बच्चों का पानी निकालने के लिए जोखिम लेते हुए वीडियो वायरल हुआ तो कलेक्टर हर्ष सिंह हरकत में आए। मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि प्रभावित गांव तक टैंकर के माध्यम से पानी पहुंचाया जा रहा है। साथ ही प्रभावित गांव के लिए कपिलधारा का एक कुआं भी स्वीकृत हो गया। इसके अलावा मौजूदा कुएं के गहरीकरण का काम भी पंचायत द्वारा ही करवाया जाने लगा।

दूसरे गांव के हाल अब भी बेहाल
जिस दिन रेखलियाझिरा में यह सब हो रहा था उसी दिन धूलकोट के ही सरकड़ नामक गांव में लोग ऐसे ही एक कच्चे कुएं में उतर कर पानी निकाल रहे थे। इस गांव की दूना बाई कहती हैं, “हर सुबह हम 3-4 बजे उठकर पानी लेने के लिए आते हैं। दिन निकलने के बाद आएंगे तो पानी भी नहीं मिलेगा।”
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि जल जीवन मिशन के लक्ष्यों को पाने से पानी लाने वाली महिलाओं के रोज़ाना 5।5 करोड़ घंटे से ज़्यादा बचेंगे। मगर दूना बाई दिन में लगभग 6 बार पानी लेने के लिए घाटी से उतर कर इस कुएं तक आती हैं। उन्हें इसका कोई हिसाब नहीं है कि इसमें उनके दिन के कितने घंटे खप जाते हैं। वह कहती हैं,
“हमें दिन भर पानी भरना पड़ता है। ताप में भी, धूप में भी। खेत में काम करते हैं और ऐसे ही धूप में पानी भरने आ जाते हैं।”
यही हाल नेपानगर के चिखलिया गांव के संजय चौहान का है। वह अपने खेत में काम करने के साथ ही दिन में कम से कम 6 बार पानी लेने के लिए 2 किमी दूर तक आते हैं। बीकॉम की पढ़ाई कर रहे चौहान कहते हैं कि उनका पूरा दिन इसी कम में निकल जाता है। शाम को पढ़ने के लिए न समय बचता है न शरीर में जान।

“बारिश में भी गंदा पानी पीते हैं”
दूना बाई और उनके जैसे अन्य ग्रामीणों की मुसीबत बरसात में भी हल नहीं होती। वह कहती हैं कि जिस कच्चे कुएं में अभी उतर कर पानी भरना पड़ता है बारिश होते ही उसमें गाद और मल-मूत्र भर जाता है।
वह जहां खड़े होकर यह बता रही हैं उसके ठीक पीछे एक और बड़ा सा बदबूदार गड्डा है। दूना बाई बताती हैं कि मई के मध्य तक ग्रामीण इसी ‘कुएं’ से पानी पी रहे थे। जब यह भी सूख गया तो ग्रामीणों ने खुद से पैसे इकठ्ठा कर करीब 50 हज़ार खर्च करके नया कुआं खोदवाया।
डब्लूएचओ का यह भी अनुमान है कि भारत में सभी घरों के लिए सुरक्षित रूप से पीने का पानी सुनिश्चित करने से डायरिया से होने वाली लगभग 400,000 मौतों को रोका जा सकता है। इससे लगभग 140 लाख विकलांगता समायोजित जीवन वर्ष (DALYs) की बचत हो सकती है।
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर माइकल क्रेमर के शोध से पता चलता है कि सुरक्षित जल कवरेज से पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर में लगभग 30% की कमी आ सकती है, जिससे संभावित रूप से हर साल 136,000 लोगों की जान बच सकती है।
मगर यह बातें सरकड़ के ग्रामीणों के लिए किताबी और किसी गल्प जैसी हैं।
इसी गांव की एक अन्य महिला ने हमें बताया कि गंदा पानी पीने से उनके बच्चे अक्सर बीमार रहते हैं। ऐसे में हर बार इलाज में औसतन 500 रु खर्च हो जाते हैं। यह रकम इन ग्रामीणों के बड़ी है।
यह ग्रामीण अपनी आजीविका के लिए मिर्च और गन्ने के खेतों में मज़दूरी करने जाते हैं। परिवार चलाने के लिए साहूकार से जो पैसे उधार लेते हैं उसका ब्याज़ चुकाने में ही इस मज़दूरी का अधिकतर हिस्सा चला जाता है।

जल जीवन मिशन डैशबोर्ड के अनुसार जिले के सभी 1 लाख 1 हज़ार 905 घरों में नल से शुद्ध जल मिल रहा है। डैशबोर्ड के अनुसार ज़िले ने ये उपलब्धि मार्च 2021 में ही हासिल कर ली थी।
सरकारी आंकड़ों और दावों के उलट आज की सच्चाई यही है कि वन ग्रामों में रहने वाले इन आदिवासियों को साफ़ और घर तक पानी नहीं मिल रहा। समस्या इसलिए भी बड़ी है क्योंकि इसमें आराम के घंटे और आर्थिक पूंजी दोनों खप जाते हैं। यानि ज़रूरत है कि इन तक सही में उन योजनाओं का लाभ पहुंचे जिनके लिए ज़िला अवार्ड और अधिकारी शाबाशी बटोर रहे हैं।
बैनर तस्वीर – रेखलिया झिरा गांव में टैंकर से पानी भर पहाड़ी पर चढ़तीं लड़कियां | बुरहानपुर | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल
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