अपनी तरह की देश की पहली ‘केन-बेतवा नदी जोड़’ परियोजना के मुआवज़े और प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध करते हुए एक बार फिर चिता आंदोलन शुरू हो गया। 3 जुलाई से प्रभावित आदिवासी ग्रामीण परियोजना प्रभावित कूपी गांव के पास बराना नदी के किनारे इकठ्ठा हो गए। बराना केन की सहायक नदी है। 6 जुलाई तक इस आंदोलन में ग्रामीणों के अलावा झांसी और अन्य जगहों के सामाजिक कार्यकर्ता भी जुड़ गए।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि कई बार आंदोलन और प्रशासन के साथ हुई बातचीत के बाद भी मुआवजे को लेकर उनकी मांग पूरी नहीं हुई। इस बीच कई प्रभावितों के घर तोड़ने की भी बात सामने आई है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन ने विस्थापन से पहले न तो उन्हें कोई उचित नोटिस दिया और न ही सभी प्रभावित परिवारों को मुआवजा प्रदान किया। ग्रामीणों का कहना है कि ग्राम सभा और आम सभा की अनदेखी कर मनमाने तरीके से मुआवजे का निर्धारण किया गया है, जिसके कारण बड़ी संख्या में परिवार आज भी वंचित हैं।
यह लोग इससे पहले भी 10 दिनों तक आंदोलन कर चुके हैं। अप्रैल में सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में दौधन बांध के निर्माण स्थल पर यह प्रदर्शन हुआ था। जिसके बाद 15 अप्रैल को छतरपुर कलेक्टर ने ग्रामवासियों की आपत्तियों पर एक जांच दल का भी गठन किया। आंदोलनकारियों का कहना है कि इन प्रशासनिक कार्रवाइयों का नतीजा शून्य रहा है और असल स्थिति अब भी 3 महीने पहले जैसी ही है।

ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए अमित भटनागर ने बताया कि वो अपनी मांगों को लेकर सोमवार, 6 जुलाई से आमरण अनशन पर बैठ रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन बार-बार आश्वासन देता है मगर स्थिति में कोई भी बदलाव नहीं होता।
हालांकि इस बार प्रदर्शनकारियों में रिवर लिंक, मझगाय और रूंझ सिंचाई परियोजना के अलावा नेगुवा सिंचाई परियोजना और बरेठी सोलर पॉवर प्रोजेक्ट से विस्थापित होने वाले लोग भी शामिल हुए हैं। प्रदर्शन के आयोजक जय किसान संगठन के कार्यकर्ताओं ने बताया कि अब तक 300 से भी अधिक मकान तोड़े जा चुके हैं।
कौन-कौन सी परियोजनाएं हैं विरोध के केंद्र में?
प्रदर्शन के केंद्र में मुख्य तौर पर 5 परियोजनाएं हैं। पहला प्रोजेक्ट केन-बेतवा लिंक परियोजना से पहले फेज़ में बन रहा दौधन बांध है जिसका पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) 288 मीटर होगा।
दूसरी मझगांव मध्यम सिंचाई परियोजना के अंतर्गत 9900 हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र विकसित किया जाना है। इसके लिए केन की सहायक नदी ‘बड़ा नाला’ पर 7567 मीटर लंबे और 33 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण होना है।
रुंज सिंचाई परियोजना के तहत पन्ना की अजयगढ़ तहसील के अंतर्गत रुंज नदी पर 1182 मीटर लंबा कंपोजिट बांध बनना है। इसके ज़रिए कुल 12,550 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा दिए जाने का दावा है।
इसके अलावा लगभग 32 करोड़ की लागत वाली नैगुवां लघु सिंचाई परियोजना है। जिससे नैगुवां और दालौन गांव के किसानों की लगभग 1000 हेक्टेयर भूमि को सिंचित किए जाने का लक्ष्य रखा गया था।
वहीं बरेठी में 630 मेगा वाट की सोलर पॉवर परियोजना से 3 लाख लोगों को बिजली देने का दावा किया गया है।

मुआवजा के प्रश्नों के बीच तोड़ दिए घर
सुमतिरानी (62) मात्र 11 साल की उम्र में विवाह करके सुकवाहा गांव रहने आ गईं। मगर लगभग 2 महीने पहले उनका मकान तोड़ दिया गया। उन्हें 5 लाख प्रति एकड़ के हिसाब से ज़मीन का मुआवजा तो मिला मगर मकान के बदले मकान और ज़मीन के बदले ज़मीन की उनकी मांग अब भी पूरी नहीं हुई।
ग्राउंड रिपोर्ट को प्रदर्शन के आयोजनकर्ताओं से मिली जानकारी के अनुसार छतरपुर के दौधन में 300 में से 150 घर तोड़े जा चुके हैं। वहीं डोंगरिया के 100 मकान तोड़े गए हैं। इसके अलावा जिले के पलकोंहा, खरियानी, पाठापुर में प्रत्येक गांव में लगभग 10 से 40 घर तक तोड़े गए हैं।
इसी तरह पन्ना जिला के 8 गांवों में मकान तोड़ने की कार्रवाई की गई है।
जिला प्रशासन द्वारा 1 जून को प्रकाशित एक विज्ञप्ति में ककरा ग्राम के 14 विस्थापित परिवारों के मुआवजा पैकेज से संबंधित राशि प्राप्त कर पुनर्वास करने की जानकारी दी गई है। विज्ञप्ति के अनुसार मुआवजा लेकर पुनर्वास कर चुके परिवारों के खाली घर तोड़े जा रहे हैं।
यहां प्रदर्शन कर रहे लोग बताते हैं कि ऐसे परिवार जिनके घर टूटे हैं वो मुआवजा राशि से ही ज़मीन खरीद कर मकान निर्माण करवा रहे हैं। इस दौरान कुछ लोगों को झुग्गी बना कर भी रहना पड़ रहा है। जबकि पन्ना जिला के प्रभावितों में से कुछ को कोंडी गांव में बसाया गया है। इन्हें 50×30 वर्ग फीट के प्लाट दिए गए हैं।
भ्रष्टाचार और कम मुआवजा देने के आरोप
भटनागर आरोप लगाते हैं कि नेगुआं सिंचाई परियोजना से भी लगभग 4500 लोग प्रभावित हुए हैं। उनके अनुसार इन लोगों को अब तक पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है। उनके अनुसार जिन्हें मुआवजा मिला भी है वो भी प्रशासनिक वित्तीय अनियमितता के शिकार हो गए हैं।
इसी तरह वो बरेठी के सोलर पॉवर प्रोजेक्ट के बारे में कहते हैं कि इसके लिए मुआवजा 2012 के हिसाब से दिया जा रहा है। वह कहते हैं कि इस परियोजना से प्रभावित 116 लोगों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है।
उन्होंने कहा कि वे जल्द ही हर परियोजना के ‘काले सच’ को पुख्ता प्रमाणों के साथ सार्वजनिक करेंगे।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन द्वारा आंदोलन स्थल पर मौजूद लोगों के लिए राशन, पानी, बिजली और दवाओं की आपूर्ति पर रोक लगा दी गई है।
इस पूरे मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रिया के लिए हमने छतरपुर कलेक्टर पार्थ जैसवाल से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की मगर अब तक संपर्क नहीं हो पाया। जिले के जनसंपर्क विभाग में सहायक संचालक अखिल राठौर ने हमें एडीएम कार्यालय और एसडीएम बिजावर से संपर्क करने के लिए कहा।
हालांकि जिले के जनसंपर्क विभाग की वेबसाईट पर मौजूद जानकारी के अनुसार कलेक्टर और एसपी ने 20 जून को विस्थापितों के नए निवास करौंदिया का दौरा करके यहां तमाम सुविधाएं सुनिश्चित करने के आदेश दिए थे। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि विस्थापित परिवारों की समस्याओं के निराकरण के लिए विशेष शिविर आयोजित किए जाएं, जिससे आवास निर्माण, दस्तावेजीकरण एवं अन्य आवश्यक कार्यों का त्वरित समाधान सुनिश्चित हो सके।
नोट – आंदोलन और मुद्दे से जुड़ी नई सूचना मिलने पर यह स्टोरी अपडेट की जाएगी।
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