FSSAI का 12 बड़े फूड ब्रांड्स को नोटिस, मालवा नहर पर पंजाब-हरियाणा में रार, तमिलनाडु कर रहा मेकेदातु बांध का विरोध, युद्ध ने बढ़ाया हृदय के इलाज का बजट। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
FSSAI ने 12 बड़े फूड ब्रांड्स को उनके उत्पादों पर ‘नो एडेड शुगर’ और ‘100% नेचुरल’ जैसे भ्रामक दावों के लिए नोटिस जारी किया है। रीयल, सफोला और किंडर जॉय जैसे प्रसिद्ध ब्रांड्स के विज्ञापनों और लेबल की जाँच में पाया गया कि उनके दावे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं।
शिमला में आयोजित उत्तरी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में मालवा नहर परियोजना को लेकर पंजाब और हरियाणा के बीच मतभेद सामने आए हैं । जहाँ पंजाब इस परियोजना को अपना आंतरिक मामला बताकर इसके लिए पानी की उपलब्धता पर सवाल उठा रहा है, वहीं हरियाणा ने इस प्रस्तावित नहर की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) और तकनीकी जानकारी की मांग की है।
तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना का विरोध करते हुए केंद्र सरकार से इसे मंजूरी न देने की मांग की है। राज्य का कहना है कि इस परियोजना से कावेरी नदी के जल प्रवाह पर असर पड़ेगा और तमिलनाडु के किसानों तथा पेयजल आपूर्ति को नुकसान हो सकता है।
कोलकाता एयरपोर्ट पर शुक्रवार सुबह इंडिगो की अगरतला जाने वाली फ्लाइट पर बिजली गिर गई। विमान में 140 से अधिक यात्री सवार थे। घटना के बाद विमान की विद्युत प्रणाली प्रभावित हो गई, जिसके चलते उसे तत्काल उड़ान भरने से रोक दिया गया।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के प्रभाव के कारण दिल के इलाज में उपयोग होने वाले उपकरणों के दाम 25 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। स्टेंट और कैथेटर जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों की लागत बढ़ने से एंजियोप्लास्टी जैसे हृदय उपचार अब 10 से 15 हजार रुपये तक महंगे हो सकते हैं।
उज्जैन में आयोजित होने वाले सिंहस्थ-2028 को ‘जीरो वेस्ट’ बनाने के लिए 106 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। साथ ही, इंदौर और उज्जैन के बीच एक नए ग्रीन फील्ड कॉरिडोर का भूमिपूजन किया गया है, जिससे दोनों शहरों के बीच यात्रा का समय घटकर मात्र 30-35 मिनट रह जाएगा।
विस्तृत चर्चा
आज की चर्चा में हमारे हमारे एडिटर इन चीफ पल्लव जैन से जानिए सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने और फुटपाथ पर क्या कहा?
“फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार है”
सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि फुटपाथ पर चलना नागरिकों का एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। कोर्ट का मानना है कि यदि कहीं सड़क मौजूद है, तो वहां पैदल यात्रियों के लिए एक निर्धारित और अच्छी तरह से बनाए रखा गया फुटपाथ भी होना चाहिए। यह टिप्पणी जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की बेंच ने एक वाहन दुर्घटना मुआवजे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें स्कूल जा रहे एक पांच वर्षीय बच्चे की दुखद मृत्यु हो गई थी।
अदालत ने चलने के अधिकार को संविधान के भाग III के तहत जोड़ा है, जिसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
अनुच्छेद 19(1)(d): आवागमन की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार।
यह अनुच्छेद 19(1)(a), (b) और (c) से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
सरकार और स्थानीय निकायों को निर्देश
बेंच ने जोर देकर कहा कि फुटपाथ पर वाहनों के बजाय पैदल यात्रियों का प्राथमिक अधिकार है। इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
नया कानून: केंद्र सरकार से पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक विशेष कानून बनाने पर विचार करने को कहा गया है।
रखरखाव की जिम्मेदारी: शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों को फुटपाथों के निर्माण, रखरखाव और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
जवाबदेही: यदि फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ क्षतिपूर्ति और मुआवजे की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
सड़क दुर्घटनाओं के चिंताजनक आंकड़े
चर्चा में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के 2024 के आंकड़ों के हवाले से पैदल यात्रियों की सुरक्षा की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला गया:
मृत्यु दर: भारत में 36,526 पैदल यात्रियों की मौत हुई है, जो उन्हें दोपहिया वाहन सवारों के बाद सड़क पर दूसरी सबसे असुरक्षित श्रेणी बनाती है।
बढ़ता ग्राफ: 2023 (35,221 मौतें) की तुलना में इसमें 3.7% की वृद्धि हुई है। तुलनात्मक रूप से, 2014 में यह आंकड़ा केवल 12,330 था, जो पिछले दशक में हुई भारी बढ़ोतरी को दर्शाता है।
कुल मौतों में हिस्सेदारी: सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मौतों में पैदल चलने वालों की हिस्सेदारी 20.6% है।
शहरी जोखिम: 10 लाख से अधिक आबादी वाले 50 शहरों में जोखिम सबसे अधिक है, जहाँ कुल मौतों का 25.2% हिस्सा दर्ज किया गया है।
प्रभावित आयु वर्ग: 45 से 60 वर्ष की आयु के लोगों को फुटपाथ पर चलने के दौरान सबसे अधिक खतरा रहता है।
सामाजिक और दार्शनिक अवलोकन
अदालत ने आधुनिक सड़क संस्कृति पर गहरी टिप्पणी करते हुए कहा कि मनुष्य पहिए के आविष्कार से बहुत पहले से चल रहा है, लेकिन अब तक चलने के अधिकार को वह महत्व नहीं दिया गया जिसका वह हकदार है। आज की स्थिति यह है कि सड़कों पर ट्रैफिक का “कब्जा” हो गया है और वाहन चालक पैदल यात्रियों और फुटपाथों को “बाधा” समझने लगे हैं।
मोटर वाहन अधिनियम 1988 पैदल यात्रियों के अधिकारों को सुरक्षित करने में कई मायनों में कमजोर साबित हुआ है। स्थानीय स्तर पर (जैसे भोपाल में) किए गए विश्लेषणों से पता चलता है कि फुटपाथ और क्रॉसिंग की खराब स्थिति न केवल पैदल यात्रियों बल्कि साइकिल सवारों के लिए भी जानलेवा बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि सड़कों पर पैदल चलना सुगम और सुरक्षित बनाना अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक आवश्यकता है।
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