कांगो और युगांडा में इबोला का संकट, दिल्ली में जलाशय बचाने के लिए अभियान, और मप्र की आंगनवाड़ियों में 3 महीने से नहीं पहुंचे टेक होम राशन। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप को ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित किया है। बुंडीबुग्यो वायरस के इस स्ट्रेन से अब तक कई संदिग्ध मौतें और संक्रमण के मामले सामने आए हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री को पत्र लिखकर ग्रेट निकोबार परियोजना को ‘पारिस्थितिक आपदा’ का नुस्खा करार दिया है। उन्होंने इस व्यावसायिक उद्यम के बजाय मौजूदा रक्षा संपत्तियों के विस्तार का विकल्प सुझाया है।
केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन परियोजनाओं में लागत बढ़ने से रोकने के लिए ‘टेंडर प्रीमियम’ नियमों को फिर से लागू किया है। इससे राज्यों द्वारा केंद्रीय फंड का उपयोग करके ठेकेदारों की बढ़ी हुई बोलियों को कवर करने की प्रथा पर रोक लगेगी।
दिल्ली में 101 जलाशयों को पुनर्जीवित करने के लिए ‘जल संचय अभियान’ शुरू किया गया है। इस पहल का उद्देश्य जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत करना है, जिसे अगस्त 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है, जिसमें सारंडा के साल जंगलों को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का निर्देश दिया गया था। यह क्षेत्र जैव विविधता और हाथियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मध्य प्रदेश के पेंच, कान्हा और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में अब ‘कम्युनिटी मुखबिर मॉडल’ लागू किया जा रहा है। इसके तहत स्थानीय शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार देकर उन्हें जंगलों में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सहयोगी बनाया जाएगा।
विस्तृत चर्चा
तीन महीने से राशन के लिए तरसतीं आंगनवाड़ियां
मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य में पोषण आहार टेक होम राशन की व्यवस्था को सुधारने के लिए पहले आजीविका मिशन द्वारा चलाए जा रहे पोषण आहार संयंत्रों को बंद कर दिया और नई व्यवस्था भी लागू नहीं की। नतीजा यह हुआ कि कई संभागों में आंगनवाड़ियों में गर्भवती महिलाओँ और बच्चों को पोषण आहार नहीं मिल रहा है।
ग्राउंड रिपोर्ट ने इस पर ज़मीनी रिपोर्टिंग की थी कि कैसे इन पोषण आहार संयंत्रों में टेक होम राशन बनाया जाता था और इनके बंद हो जाने से कई महिलाओँ को रोज़गार छिन गया। हद तो इस मामले में यह रही की फैक्ट्री बंद होने के बारे में कर्मचारियों से कोई संवाद नहीं किया गया और तो और नई व्यवस्था पर भी कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया कि अब राज्य में कैसे बनेगा पोषण आहार।
अभी की स्थिति यह है कि राज्य के 7 पोषण आहार संयंत्र जो आजीविका मिशन चला रहा था, उन पर ताले नहीं डले हैं लेकिन इन फैक्ट्रियों को रॉ मटेरियल ही नहीं मिल रहा है क्योंकि प्राईवेट वेंडर्स का भुगतान नहीं हुआ है। जिससे फैक्ट्री खुली तो है लेकिन कामकाज बंद है। राज्य के करीब 30 जिलों में टेक होम राशन की सप्लाय बाधित है। सबसे बुरे हाल सागर संभाग के हैं जहां 26 फरवरी से आंगनवाड़ियों में टेक होम राशन नहीं पहुंचा है।
दैनिक भास्कर में जो आज खबर छपी है उसके मुताबिक टेक होम राशन संयंत्रों पर 300 करोड़ की उधारी है, शासन ने 134 करोड़ रुपए मंजूर किये लेकिन राशि जारी नहीं की है।
मध्य प्रदेश में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। अगर आंगनवाड़ियों में पोषण आहार नहीं पहुंचेगा तो बच्चों और गर्भवति महिलाओं के पोषण पर प्रभाव पड़ेगा। यह बेहद अचरज की बात है कि मध्य प्रदेश सरकार के पास इस बात का कोई जवाब भी नहीं है कि वो आगे क्या करने वाली है, तो आप समझ सकते हैं कि कितनी गंभीरता से मध्य प्रदेश में पोषण के मामले को देखा जाता है।
असम में हूलॉक गिब्बन द्वारा कृत्रिम पुल का उपयोग
आसाम के होलोंगपार गिब्बन अभयारण्य से एक ऐतिहासिक खबर सामने आई है। यहां पहली बार एक पश्चिमी हूलॉक गिब्बन (भारत की एकमात्र एप प्रजाति) को रेलवे लाइन पार करने के लिए आर्टिफिशियल कैनोपी ब्रिज का उपयोग करते हुए रिकॉर्ड किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह दुनिया में अपनी तरह की पहली घटना है जहाँ इस प्रजाति ने रेलवे लाइन क्रॉस करने के लिए कृत्रिम पुल का सहारा लिया है।
इस चर्चा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
प्राकृतिक आवास की चुनौती: होलोंगपार गिब्बन अभयारण्य केवल 21 वर्ग किमी में फैला है, जिसके बीच से गुजरने वाली एक रेलवे लाइन ने जंगल की कैनोपी (पेड़ों की ऊपरी छतरी) को दो हिस्सों में बांट दिया था। हूलॉक गिब्बन जमीन पर बहुत कम आते हैं और पेड़ों की शाखाओं के सहारे झूलकर आवाजाही करते हैं,। कैनोपी टूटने से उनकी आवाजाही रुक गई थी, जिससे उनकी ब्रीडिंग और जेनेटिक डायवर्सिटी (अनुवांशिक विविधता) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था।
ब्रिज का विकास और सफलता: पहला आर्टिफिशियल ब्रिज 2015 में लगाया गया था, लेकिन वह गिब्बन्स की आवाजाही के हिसाब से स्थिर (stable) नहीं था, इसलिए उन्होंने इसका उपयोग नहीं किया।
इसके बाद, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की सलाह पर 2022 में नए डबल-रोप कैनोपी ब्रिज लगाए गए, जिनमें सुरक्षा जाल (safety nets) और विशेष रस्सियों का उपयोग किया गया।
इस साल फरवरी और मार्च के बीच एक नर हूलॉक गिब्बन को सफलतापूर्वक इस ब्रिज का उपयोग करते हुए देखा गया।
वैश्विक और राष्ट्रीय संदर्भ: इस तरह के पुलों का उपयोग ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ-साथ भारत के तमिलनाडु, केरल और उत्तराखंड में भी वन्यजीवों की आवाजाही के लिए किया गया है,।
विशेषज्ञों की चिंताएं: इसे एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थायी समाधान नहीं है। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
आर्टिफिशियल ब्रिज वन्यजीवों की आवाजाही को बहुत अधिक अनुमानित (predictable) बना देते हैं।
विभिन्न समूहों द्वारा एक ही क्रॉसिंग का उपयोग करने से बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ सकता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि ऐसे ढांचे वन विखंडन (forest fragmentation) को उचित ठहराने का औजार न बन जाएं।
अंततः विशेषज्ञों का मानना है कि असली समाधान केवल पुल बनाना नहीं, बल्कि जंगलों का संरक्षण करना और उनके प्राकृतिक आवास को फिर से जोड़ना है।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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