मध्य प्रदेश सहित देश भर में बीते 2 दिनों में अचानक हुई बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। प्रदेश में इस वक़्त गेहूं की फसल काटने के लिए तैयार हो रही है। कुछ जगहों पर जहां कटाई होना शुरू हो गई है वहीं देर से बोवाई के कारण कुछ जगहों पर अभी भी फसल खेतों में खड़ी है। इसी तरह मक्का, संतरा और केले की फसल को नुकसान हुआ है।
केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार 20 मार्च को आयोजित बैठक में कहा कि उन्होंने अधिकारियों की जल्द से जल्द फील्ड सर्वे करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का फोकस केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि फसल-क्षति के वैज्ञानिक आकलन, बीमे के सही क्लेम और किसानों की त्वरित सहायता पर भी है।
मगर कुछ किसान कहते हैं कि उनकी फसल का गलत सर्वे किया जा रहा है वहीं कुछ के खेतों का सर्वे हो ही नहीं रहा है।

मक्का-गेहूं की फसल को पहुंचा नुकसान
मध्य प्रदेश के पश्चिमी हिस्से के बड़वानी जिले के तालून गांव के रहने वाले राहुल काचरा 6 एकड़ में मक्के की फसल उगाते हैं। उनको उम्मीद थी कि अगले 15-20 दिन में उनका मक्का पूरी तरह पक जाएगा जिसके बाद वह इसके निकाल लेंगे। मगर 19 और 20 मार्च में आई आंधी और बारिश ने उनका गणित बिगाड़ दिया।
मौसम विभाग द्वारा जारी बुलेटिन के अनुसार 20 मार्च सुबह 8:30 मिनट से 24 घंटे के अंदर पश्चिमी मध्य प्रदेश में 50 से 81 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से हवाएं चली हैं।
उनकी लगभग 4।5 एकड़ की मक्का की फसल ज़मीन पर बिछ गई है। काचरा को उम्मीद थी कि इस फसल से उनको 5 से 5।5 लाख रूपए तक की कमाई होगी। मगर वह कहते हैं, “मक्के के दाने अभी पके नहीं हैं, पौधे गिरने के बाद अब उनका विकास सही तरह से नहीं होगा तो उत्पादन 80% तक गिर जाएगा।” वह कहते हैं कि अब उन्हें यह मक्का 1 से 1।5 लाख रूपए तक में बेचना पड़ेगा।
वहीं विदिशा के लेटनी गांव के छोटे सिंह दांगी ईटीवी भारत को बताते हैं कि ओलावृष्टि के कारण उनकी 60 बीघा गेहूं की फसल को नुकसान हुआ है। इसके अलावा उनकी चने की फसल के दाने भी झड़ गए हैं। ऐसा ही नुकसान श्योपुर के रामलखन सिंह मीणा को भी हुआ है। उन्होंने 15 बीघा में में गेहूं की फसल लगाईं थी। इसका 40% हिस्सा आंधी के कारण ज़मीन पर बिछ गया है।
मीणा बताते हैं कि उन्होंने लगभग पांच से 10,000 रूपए प्रति बीघा की लागत से यह फसल उगाई है। इससे पहले उन्होंने धान की फसल उगाई थी जो अत्यधिक बारिश के चलते खराब हो गई थी। ऐसे में लगातार दूसरे सीजन का नुकसान उनके लिए बड़ी बात है।

हॉर्टिकल्चर की फसलों को भी हुआ नुकसान
पांढुर्णा ज़िला अपने संतरा उत्पादन के लिए प्रसिद्द है। जिले के 2 ब्लॉक पांढुर्णा और सौंसर में क्रमशः 2,50,500 और 15,5000 मीट्रिक टन संतरे का उत्पादन होता है। यह इसकी मृग बहार के फलों के टूटने का समय होता है। कलम गांव के उमेश पाल 12 से 13 एकड़ में संतरे की खेती करते हैं। अभी उनके खेतों के फलों को टूटने में थोड़ा समय था तभी आंधी और ओलावृष्टि के कारण उनकी 20% तक फसल नीचे गिर गई है।
वह कहते हैं कि उन्हें एक एकड़ के रखरखाव में सालाना 70 से 80 हज़ार रुपए का खर्च आता है। उन्होंने लगभग 60 टन उत्पादन का अनुमान लगाया है मगर लगभग 2 टन माल गिर चुका है। वह कहते हैं कि इससे उन्हें लगभग 2 से 2।5 लाख रूपए का नुकसान हुआ है। हालांकि उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है। 2024 में भी उन्हें ऐसे ही घाटे का सामना करना पड़ा था। वह कहते हैं, “अब 5 में से 3 साल तो ऐसे असमय ओला या बारिश आती ही है।”
पांढुर्णा से लगभग 311 किमी दूर खरगोन जिले के धुलवाड़ा के किसान हरिओम मलगाया ने गेहूं की पारंपरिक खेती से तरबूज की आधुनिक खेती की ओर बढ़ने का निश्चय किया था। इसके लिए उन्होंने एक एकड़ खेत में तरबूज की फसल लगाई थी। वह बताते हैं कि एक एकड़ में लगभग 5700 पौधे रोप थे जिसकी संपूर्ण लागत 80,000 के करीब आई थी। मलगाया बताते हैं कि उनकी फसल में एक महीने के दौरान 3 मौसमी आपदाएं आई हैं। इसे विस्तार में बताते हुए वह कहते हैं,
“एक महीने पहले भी ओलावृष्टि हुई थी उस दौरान मेरे तरबूज के फलों और पौधों को नुकसान हुआ था। फिर लगभग 15 से 20 दिन तेज़ धूप और गर्मी का मौसम रहा। इससे फल अंदर से सड़ना शुरू हो गए। अब आंधी ने बगीचे को ही नुकसान पहुंचाया है।”
उन्होंने सोचा था कि इस खेती के माध्यम से वह कपास में हुए घाटे को कम कवर कर लेंगे मगर अब उन्हें दोहरा घाटा झेलना पड़ रहा है। “मैंने 5 एकड़ में मुख्य फसल के रूप में चना लगाया था। मगर एक महीने पहले की ओलावृष्टि ने उसका उत्पादन भी आधा कर दिया। अब तरबूज की बची हुई फसल भी कोई व्यापारी लेने के लिए तैयार नही हैं।”

सरकार ने राहत के लिए क्या किया?
किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के प्रदेश प्रवक्ता अनिल सिंह कहते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से किसान का नुकसान रोक पाना कठिन है। मगर वह यह भी जोड़ते हैं कि सरकार अगर नुकसान की भरपाई और बची हुई फसल का उचित दाम दे तो किसान को घाटे से उभरने में मदद मिल जाती है। वह कहते हैं, “आपदा के बाद सर्वे और मुआवज़े को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तो होती है मगर धरातल पर किसान को कुछ नहीं मिलता। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तो केवल नाम के लिए किसानों की योजना है असल लाभ तो बीमा कंपनी को ही होता है।”
हालांकि केन्द्रीय कृषि मंत्री चौहान ने कहा कि जिन क्षेत्रों में तेज बारिश, ओलावृष्टि या मौसम की अन्य प्रतिकूल स्थितियों से नुकसान हुआ है, वहां फील्ड स्तर पर समयबद्ध कार्रवाई अनिवार्य है ताकि किसी भी किसान को राहत के लिए इंतजार न करना पड़े। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के अधिकारियों को राज्यों के साथ संवाद करने के लिए कहा गया है ताकि क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट हो और वैज्ञानिक तरीके से किसानों के बीमा क्लेम बन जाएं।
मगर सरकारी बयानों के बरक्स किसान सर्वे के बारे में कुछ और ही कहानी कहते हैं। बड़वानी के राहुल काचरा के खेत में पटवारी द्वारा सर्वे तो किया गया मगर बकौल काचरा, 80% से ज्यादा नुकसान होने पर भी यह कहा गया कि चूंकि फसल में दाने हैं इसलिए 50% से अधिक का नुकसान नहीं माना जाएगा। वहीं खरगोन के हरिओम मलगाया की फसल जब एक महीने पहले प्रभावित हुई थी तो उन्होंने स्थानीय पटवारी, तहसीलदार और एसडीएम को भी सर्वे के लिए फोन लगाया। मगर वह आज तक उनके खेत तक नहीं पहुंचे।

वहीं जितने भी किसानों से हमने बात की सभी ने कहा कि उनके द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत बीमा नहीं करवाया गया था। इसका कारण वह प्रीमियम जमा करने के बाद भी योजना का लाभ न मिलना बताते हैं। पांढुर्णा के उमेश पाल ने बताया कि संतरे की फसल को इस योजना के अंतर्गत शामिल ही नही किया गया है।
केंद्र सरकार की ओर से भले ही मदद का आश्वासन दिया गया हो मगर प्रदेश सरकार ने अब तक इस पर कोई भी आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। 21 मार्च को भारत मौसम विभाग द्वारा जारी बुलेटिन में बताया गया कि प्रदेश के 9 जिलों में ओलावृष्टि हुई है। वहीं चंबल, ग्वालियर, सागर और रीवा संभव के लगभग पूरे क्षेत्र में बारिश और वज्रपात की घटना दर्ज की गई हैं। खुद केन्द्रीय मंत्री ने भी मौसम विभाग के हवाले से दो और पश्चिमी विछोभ आने की संभावना जताई है। ऐसे में ज़रूरी है कि असल में और उचित तरीके से फील्ड सर्वे करके किसानों को मुआवज़ा दिया जाए।
बैनर ईमेज – मध्य प्रदेश की प्रमुख रबी फसल गेहूं को भी नुकसान पहुंचा है | फ़ोटो: पल्लव जैन
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