मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले का कुंडीबे गांव पिछले साल दिसंबर में राष्ट्रीय चर्चा में आया था — भोपाल संभाग का पहला गांव जहाँ 24 घंटे, सातों दिन नल से पानी मिलेगा। पाँच महीने भी नहीं बीते और यह सपना टूट चुका है। अब गांव में सिर्फ दो घंटे पानी आता है।
वजह कोई तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक सीधा आर्थिक संकट है — जलकर का बिल जो पहले 9-10 हजार रुपए महीना था, अचानक चौगुना होकर 35 हजार रुपए पहुँच गया। और इसे चुकाने की क्षमता न ग्रामीणों में है, न ग्राम पंचायत में।
| कुंडीबे में नल कनेक्शन | नया मासिक बिल | अब रोज़ पानी मिलता है |
|---|---|---|
| 147 | ₹35,000 | 2 घंटे |
उत्सव से शुरू हुई कहानी
23 दिसंबर 2024 को जिला प्रशासन ने कुंडीबे में देश का पहला “जल अर्पण दिवस” मनाया। धूमधाम से कार्यक्रम हुआ, सरपंच को प्रशंसा पत्र मिला और गांव को 24×7 नल जल वाला गांव घोषित किया गया। परियोजना औपचारिक रूप से ग्राम पंचायत को सौंप दी गई।
लेकिन ग्राम पंचायत के सचिव अजीत सिंह और सरपंच प्रतिनिधि अमृतलाल तोमर बताते हैं कि यह उत्सव उनके लिए चेतावनी की घड़ी थी। “हमने कार्यक्रम से पहले ही लिखित में अधिकारियों को सूचित किया था कि 24 घंटे पानी देने के बाद बिल चौगुना हो गया है और हम इसे वहन नहीं कर सकते। लेकिन आश्वासन देकर कार्यक्रम करा लिया गया।”
बिल कैसे बढ़ा?

सचिव अजीत सिंह के मुताबिक, 27 नवंबर 2024 को जब 24 घंटे जल आपूर्ति शुरू की गई तब तक दो महीने ऑफलाइन बिल आता रहा और राशि सामान्य थी। लेकिन जैसे ही पोर्टल से बिल जनरेट होने लगा, जलकर की राशि अचानक बढ़ गई।
गांव में जल जीवन मिशन के तहत कुंडीबे, मोखमपुरा, किशनपुरिया और परसपुरा को मिलाकर कुल 227 नल कनेक्शन हैं। इनका सम्मिलित बिल पहले 9-10 हजार रुपए था जो बढ़कर 35 हजार रुपए हो गया। ग्राम पंचायत के पास ग्रामीणों से जमा जलकर की 2 लाख रुपए की राशि है, जबकि बकाया 3 लाख रुपए पड़ा है।
सरपंच प्रतिनिधि अमृतलाल तोमर कहते हैं “ग्रामीणों से सौ रुपए से अधिक की वसूली नहीं की जा सकती। और गांव के विकास का पैसा हम इसमें नहीं लगा सकते। अगर जलकर की राशि संशोधित कर दें तो हम 24 घंटे योजना फिर चालू कर देंगे।”
गांव में वापस लौटे पुराने दिन

जिस सुविधा को पाकर गांव की महिलाएं कुएं से मुक्त हुई थीं, वह फिर छिन गई है। गांव की कुलताबाई कहती हैं — “एक साल नल 24 घंटे चले, हमें कुएं से पानी खींचने से राहत मिली थी। लेकिन अब फिर दो घंटे हो गए और उसमें भी लोग मोटर लगाकर पानी खींचते हैं तो हमारे नल में आता ही नहीं।”
पंप ऑपरेटर पर्वत सिंह सोलंकी बताते हैं कि दो माह में गांव में 25-30 पानी की मोटरें लग चुकी हैं। “जिसने पहले लगाई, उसे देखकर बाकियों ने भी लगा ली। जिनके पास मोटर नहीं, उन तक पानी ही नहीं पहुँचता।” यह वही समस्या है जो 2022 में योजना हैंडओवर के वक्त थी।
प्रशासन का पक्ष: गेंद पंचायत के पाले में

जल निगम के महाप्रबंधक उमाकांत चौधरी कहते हैं कि जो बिल आ रहा है वह एमओयू और गांव की वास्तविक जल खपत के आधार पर है। उनका कहना है कि यदि ग्राम पंचायत को आपत्ति है तो वह जनपद सीईओ के माध्यम से लिखित आवेदन दे — तब ठोस निर्णय लिया जा सकता है।
गोरखपुरा ग्रामीण समूह जल प्रदाय योजना के प्रोजेक्ट मैनेजर अजय विश्नोई का कहना है कि 24 घंटे पानी मिलने पर ग्रामीण जल बर्बाद करते थे — उन्हें बार-बार समझाना पड़ा। अब जब बिल बढ़ा तो पंचायत ने खुद आपूर्ति काट दी।
| पंचायत की माँग | प्रशासन का जवाब |
|---|---|
| पुराने बिलों में संशोधन करें, जलकर घटाएं — तभी 24×7 योजना दोबारा चालू होगी | जनपद सीईओ के माध्यम से लिखित निवेदन दें — तब विचार होगा |
कुंडीबे की कहानी दरअसल देश भर में लागू हो रही जल जीवन मिशन की उस बड़ी चुनौती को रेखांकित करती है, जिसमें योजना बनाना आसान है, उसे टिकाऊ बनाना मुश्किल। जब तक जलकर की दरें ग्राम पंचायतों की वास्तविक क्षमता के अनुरूप नहीं होंगी, ’24×7 नल जल’ सिर्फ उद्घाटन की खबर बनता रहेगा।
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