मध्यप्रदेश में गेहूं उपार्जन का मौसम है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हेलीकॉप्टर से औचक दौरे कर रहे हैं, 41 लाख मीट्रिक टन खरीदी के सरकारी आंकड़े जारी हो रहे हैं — लेकिन राजगढ़ के एक किसान की कहानी बताती है कि जमीन पर हालात कितने अलग हैं।
| धूप में इंतज़ार | ट्रैक्टर किराया बर्बाद | आखिरकार बिका |
|---|---|---|
| 5 दिन | ₹2,500 | 30 क्विंटल |
एक किसान, पाँच दिन, और ‘अमानक’ का ठप्पा

राजगढ़ जिले के भाटखेड़ी गांव के किसान धीरप सिंह यादव ने 22 अप्रैल को देवलखेड़ा उपार्जन केंद्र पर पंजीयन कराया। उन्हें 28 अप्रैल से 5 मई का स्लॉट मिला। वे 30 क्विंटल गेहूं से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर 30 अप्रैल को ही केंद्र पहुँच गए।
अगले पाँच दिन वे चिलचिलाती धूप में अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। ट्रैक्टर-ट्रॉली का किराया ₹500 रोज़ था — यानी पाँच दिन में ₹2,500 सीधे जेब से गए। और जब 5 मई को तुलाई का नंबर आया, तो सर्वेयर ने गेहूं को ‘चमकहीन’ बताकर रिजेक्ट कर दिया।
धीरप सिंह यादव, किसान कहते हैं “अगर मेरा गेहूं खराब था, तो पहले दिन क्यों नहीं बताया? पाँच दिन लाइन में क्यों खड़ा रखा? क्या सर्वेयर को किसान के वक्त और पैसे की कोई कद्र नहीं?”
जब हार नहीं मानी — सैंपल लेकर पहुँचे कलेक्ट्रेट

धीरप सिंह ने झुकने की बजाय लड़ने का रास्ता चुना। उन्होंने गेहूं का सैंपल एक पन्नी में भरा और सीधे राजगढ़ कलेक्ट्रेट पहुँच गए। उनका तर्क था — “तेज हवा और हार्वेस्टिंग की वजह से चमक थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन इससे गेहूं की गुणवत्ता खराब नहीं होती।” उन्होंने साफ कहा कि ज़रूरत पड़ी तो मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री तक जाएंगे।
यह भी उल्लेखनीय है कि देवलखेड़ा केंद्र पर उस दिन 7-8 अन्य किसानों के सैंपल भी रिजेक्ट हुए थे। लेकिन वे आवाज उठाना नहीं जानते थे। धीरप सिंह उन सबकी खामोश तकलीफ की आवाज़ बन गए।
प्रशासन हरकत में आया — ‘चलना’ लगा, गेहूं पास हुआ
मामले की गंभीरता देखकर ब्यावरा तहसीलदार ने खुद केंद्र पर पहुँचकर दखल दिया। उन्होंने केंद्र पर ‘चलना’ (गेहूं सफाई की प्रक्रिया) लगवाया। अशुद्धियाँ दूर होते ही पूरी 30 क्विंटल फसल की तुलाई हो गई।
जो गेहूं कुछ घंटे पहले ‘अमानक’ था, वही प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद ‘मानक’ हो गया। इससे यह साफ हो गया कि दिक्कत गेहूं में नहीं, केंद्र पर बुनियादी सुविधाओं और सही मार्गदर्शन की कमी में थी।
यह अकेला मामला नहीं है

राजगढ़ की यह घटना कोई अपवाद नहीं। प्रदेश के कई जिलों से ऐसी तस्वीरें आती रही हैं:
शाजापुर — चक्काजाम – कालापीपल के खरदोन कला केंद्र पर बार-बार गेहूं रिजेक्ट होने से नाराज़ किसानों ने नेशनल हाईवे जाम किया। आरोप — अधिकारी नमी का बहाना बनाकर किसानों को लौटाते रहे।
शाजापुर — भुगतान कटौती– किसान नंदकिशोर पाटीदार ने 61 क्विंटल गेहूं बेचा। कर्ज पहले ही चुका दिया था, रसीदें भी थीं — फिर भी सोसाइटी मैनेजर ने ₹78,842 काट लिए।
रायसेन — सर्वर और सड़क– तुलाई में देरी, सर्वर ठप, खुले में पड़ी फसलें खराब — एसडीएम के आश्वासन के बाद ही चक्काजाम हटा।
वसूली और भाई-भतीजावाद के आरोप
नरसिंहपुर के किसान अतुल कौरव कहते हैं कि उपार्जन केंद्रों पर हम्माल तुलाई के बदले पैसे माँगते हैं। जो दे देता है उसकी फसल जल्दी तुलती है, जो नहीं दे पाता वह लटका रहता है।
भगवान सिंह पटेल, भारतीय किसान यूनियन महाशक्ति कहते हैं “राजगढ़ की कालीपीठ सोसाइटी में एक ही गांव और एक ही समाज के कर्मचारी हैं — जो स्लॉट बुकिंग से लेकर खरीदी तक सब प्रभावित करते हैं। अलग-अलग गांव के लोगों को अलग-अलग केंद्रों पर लगाएं तो व्यवस्था सुधर सकती है।”
हेलीकॉप्टर से दिखती नहीं ज़मीन की तकलीफ
मुख्यमंत्री का यह कहना सही है कि वे कहीं भी हेलीकॉप्टर उतार सकते हैं। लेकिन धीरप सिंह की कहानी यह भी बताती है कि असली समस्या उपार्जन केंद्र पर प्रवेश के वक्त गुणवत्ता जाँच न होना, ‘चलना’ जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी और सर्वेयरों की मनमानी है — ये चीज़ें हवाई निरीक्षण में नहीं दिखतीं।
ब्यावरा तहसीलदार की तत्काल कार्रवाई और धीरप सिंह की हिम्मत ने यह ज़रूर साबित किया — जवाबदेही होती है तो रास्ता निकलता है। लेकिन हर किसान न तो पढ़ा-लिखा है, न इतना हिम्मती। जब तक सिस्टम खुद जवाबदेह नहीं बनेगा, तब तक कलेक्ट्रेट की धूल फाँकना किसान की नियति बनी रहेगी।
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