पन्ना जिले की मझगाय और रुंझ सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित ग्रामीणों ने बीते दिनों स्थानीय कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन किया। इसमें परियोजना से संबंधित भूमि अधिग्रहण, मुआवजे और पुनर्वास से जुड़े सवालों को लेकर चिंता ज़ाहिर की गई। 11 और 12 मार्च के दौरान चले इस प्रदर्शन का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने किया। यहां आंदोलन के दूसरे दिन स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
गुरूवार 12 मार्च को जिला प्रशासन ने धारा 163 लागू करते हुए जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में चार से अधिक लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में पानी की सप्लाई भी रोक दी गई। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बन गई।

इन दोनों सिंचाई परियोजना के कारण पन्ना और आसपास के इलाकों के दर्जनों गांव प्रभावित हो रहे हैं। इन गांवों के किसानों और आदिवासी परिवारों का आरोप है कि उनकी जमीन अधिग्रहित की जा रही है लेकिन उन्हें उचित मुआवजा और पुनर्वास का स्पष्ट रोडमैप नहीं दिया गया। इन्हीं मुद्दों को लेकर अब प्रशासन और ग्रामीण आमने-सामने हैं।
विस्थापित ग्रामीणों और प्रशासन के बीच टकराव जारी
प्रदर्शन में शामिल सुमित्रा आदिवासी ने कहा है कि सरकार जमीन तो ले रही है लेकिन परिवारों को यह नहीं बताया जा रहा कि वे आगे कहां बसेंगे और उनकी आजीविका कैसे चलेगी? सुमित्रा का कहना है कि उन्हें लगभग पांच लाख रुपये तक का मुआवजा देने के लिए कहा गया है जबकि इतने पैसे में नया घर या जमीन खरीदना संभव नहीं है।
इन परियोजनाओं से जुड़े दस्तावेज़ और प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठाते हुए 11 मार्च को हजारों किसान और आदिवासी परिवार पन्ना कलेक्ट्रेट पहुंचे। जय किसान संगठन के बैनर तले सतना नाका से कलेक्ट्रेट तक रैली निकाली गई।

भटनागर का आरोप है कि प्रशासन भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का सही तरीके से पालन नहीं कर रहा। उनके मुताबिक कानून के अनुसार विस्थापित परिवारों को कम से कम 7.36 लाख रुपये का पैकेज मिलना चाहिए लेकिन कई मामलों में इससे कम राशि दी जा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई जगहों पर सिंचित जमीन को असिंचित बताकर मुआवजे की राशि घटा दी गई है।
आरोप है कि कई गांवों में लोगों को पूरा मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना ही उनके घर गिरा दिए गए और खेतों में खड़ी फसलों पर मशीनें चला दी गईं।
आंदोलनकारियों का कहना था कि वे प्रशासन से भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास से जुड़े सभी दस्तावेज़ मांग रहे हैं ताकि प्रभावित गांवों के लोग पूरी जानकारी के साथ आगे का फैसला कर सकें।
दूसरे दिन बढ़ा तनाव, समझौते के बाद धरना स्थगित
कलेक्ट्रेट पहुंचने के बाद लोगों ने धरना शुरू कर दिया जिसे ‘न्याय सत्याग्रह’ नाम दिया गया। लेकिन आंदोलन का दूसरा दिन 12 मार्च को और तनावपूर्ण हो गया। हजारों किसान और आदिवासी महिलाएं कलेक्ट्रेट परिसर में डटी रहीं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन ने भीड़ कम करने के लिए परिसर में पानी की सप्लाई बंद कर दी।
भटनागर ने यह भी आरोप लगाया कि परिसर में मौजूद पानी के टैंकर से भी पानी भरने नहीं दिया गया। इस बीच भीड़ लगातार बढ़ती रही। स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब प्रशासन ने कलेक्ट्रेट परिसर के कुछ हिस्सों को बंद कर दिया और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया।
बताया जाता है कि प्रशासन ने आंदोलन के नेता अमित भटनागर को बातचीत के लिए कलेक्ट्रेट के अंदर बुलाया।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि इसी दौरान परिसर में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू कर दी गई और उन्हें नोटिस थमा दिया गया। इस धारा के तहत कलेक्ट्रेट परिसर में 4 से अधिक लोगों के इकट्ठे होने और नारेबाजी को प्रतिबंधित कर दिया गया।
इसके बाद भटनागर ने गिरफ्तारी देने की घोषणा कर दी। उनके समर्थन में बड़ी संख्या में मौजूद महिलाओं और किसानों ने भी गिरफ्तारी देने की बात कही। इसी दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की हुई और लाठीचार्ज भी किया गया।
हालांकि बाद में प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच हुई बातचीत के बाद कुछ शर्तों के साथ आंदोलन को स्थगित करने की घोषणा की गई।

प्रदर्शनकारियों द्वारा दिए गए ज्ञापन के अनुसार प्रशासन ने वादा किया कि केन–बेतवा लिंक परियोजना, मझगाय मध्यम सिंचाई परियोजना और रुंझ सिंचाई परियोजना से जुड़े सभी प्रशासनिक आदेश, धारा 11 की कार्रवाई, ग्राम सभा की कार्यवाही और अवॉर्ड समेत परियोजना से संबंधित दस्तावेज़ों की प्रमाणित प्रतियां पांच दिन के भीतर प्रभावित ग्रामीणों को उपलब्ध कराई जाएंगी। साथ ही प्रभावित गांवों की समस्याओं को सात दिन के भीतर सुनकर उनके समाधान की प्रक्रिया शुरू करने और तब तक किसी भी प्रकार की बेदखली की कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया गया।
इस लिखित सहमति के आधार पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने आंदोलन को फिलहाल स्थगित करने की घोषणा की। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तय समय में कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन फिर से शुरू किया जाएगा।
जिन परियोजनाओं को लेकर विवाद
विवाद जिन तीन परियोजनाओं को लेकर है उनमें केन–बेतवा लिंक परियोजना के साथ पन्ना जिले की दो (रुंझ और मझगाय) मध्यम सिंचाई परियोजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं को बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की समस्या कम करने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार ने 2023 में कैबिनेट बैठक में पन्ना जिले की रुंझ और मझगाय मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को संशोधित स्वीकृति दी थी। रुंझ परियोजना के तहत लगभग 14,450 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा विकसित करने की योजना है और इसके लिए लगभग 513 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस परियोजना से अजयगढ़ तहसील के लगभग 47 गांवों को लाभ मिलने की बात कही गई है।
दूसरी ओर मझगाय मध्यम सिंचाई परियोजना का उद्देश्य लगभग 1,360 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना है। इसके लिए लगभग 693 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। बताया गया है कि इससे पन्ना जिले की अजयगढ़ तहसील के लगभग 38 गांवों को लाभ मिलेगा।
मध्य प्रदेश जल संसाधन विभाग के एक परियोजना दस्तावेज़ के अनुसार मझगाय परियोजना के तहत लगभग 1,523 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता बताई गई है जिसमें राजस्व भूमि, निजी भूमि और वन भूमि शामिल है। इस परियोजना के कारण 930 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि प्रभावित हो सकती है और लगभग 999 परिवारों के विस्थापित होने का अनुमान लगाया गया है।
परियोजना दस्तावेज़ में यह भी उल्लेख है कि प्रभावित गांवों की कुल आबादी लगभग 16,896 है जिनमें 16.4 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 22 प्रतिशत जनजाति समुदाय का बड़ा हिस्सा शामिल है।
इन परियोजनाओं को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी पहले चर्चा हो चुकी है। खजुराहो से सांसद विष्णु दत्त शर्मा ने लोकसभा में मझगाय बांध परियोजना को जल्द पूरा करने की मांग उठाई थी और कहा था कि इससे उनके संसदीय क्षेत्र खजुराहो, पन्ना जिले और बुंदेलखंड के सैकड़ों गांवों को पेयजल और सिंचाई का लाभ मिल सकता है।
पन्ना कलेक्टर उषा परमार ने ग्राउंड रिपोर्ट से फोन पर बताया कि, “प्रभावित लोगों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात हुई है। उनकी मांग थी कि उन्हें भूमि अधिग्रहण से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं। उन्हें यह दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएंगे।”
वहीं भटनागर ने कहा है कि आंदोलन स्थगित किया गया है, समाप्त नहीं। उनका कहना है कि यदि तय समय में कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन और व्यापक होगा।
केन बेतवा लिंक परियोजना के तहत बनाए जा रहे दौधन बांध से विस्थापित होने वाले गांवो में पुनर्वास की ज़मीनी स्थिति को ग्राउंड रिपोर्ट ने विस्तार से कवर किया है। आप यह रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं।
बुंदेलखंड को पानी देने की कीमत चुकाते 20 गांव, जिन्हे मुआवजे की मांग पर मिली लाठी
एक तरफ सरकार और जनप्रतिनिधि इन परियोजनाओं को क्षेत्र के विकास, सिंचाई और पेयजल के लिए जरूरी बता रहे हैं। दूसरी तरफ प्रभावित गांवों के लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि विकास की कीमत कौन चुका रहा है और क्या विस्थापित परिवारों को कानून के अनुसार अधिकार मिल रहे हैं।
आने वाले दिनों में प्रशासन द्वारा दस्तावेज उपलब्ध कराने और शिकायतों पर कार्रवाई का वादा इस विवाद की दिशा तय कर सकता है। फिलहाल आंदोलनकारी यह कह रहे हैं कि यदि उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो संघर्ष फिर से शुरू होगा।
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