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कपास-मिर्च के बजाए जैविक हल्दी-अदरक उगा रहे खरगोन के ये दंपत्ति

मिर्च और कपास उत्पादन के लिए मशहूर खरगोन में महेश पाटीदार और उनकी पत्नी संगीता पाटीदार हल्दी और अदरक का उत्पादन कर रहे हैं। जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर रजूर गांव के यह किसान दंपत्ति बीते 4 से भी अधिक सालों से जैविक विधि से फसलें उगा रहे हैं। इनका कहना है कि केवल एक एकड़ खेती में भी किसान कम से कम 5 लाख तक कमा सकता है।   

खरगोन जिले के अन्य किसानों की तरह यह दंपत्ति भी पहले सिर्फ कपास और मिर्च की खेती करते थे। मगर बढ़ती लागत, इल्लियों का प्रकोप, मजदूरों का संकट और गिरते दामों ने उन्हें निराश कर दिया। अंततः दोनों ने मिलकर जैविक कृषि करने का फैसला लिया। उन्होंने पहले अरहर की दाल और फिर हल्दी और अदरक की खेती शुरू की। वह कहते हैं कि इससे उनको खुद के खाने के लिए शुद्ध मसाले मिले हैं और बेहतर रिटर्न भी। 

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2021 में अरहर की जैविक खेती के बाद 2023 में इस दंपत्ति ने हल्दी की खेती शुरू की | खरगोन | क्रेडिट शिशिर अग्रवाल

कैसे शुरू हुई हल्दी की खेती?

महेश और संगीता जैविक तरीके से हल्दी उगाने का निर्णय लेने से पहले बहुत दुविधा में थे। संगीता को डर था कि कहीं उनकी लागत न डूब जाए। मई 2023 में उन्होंने अपने एक एकड़ खेत में ही हल्दी और अदरक की खेती करने का निर्णय लिया। गांव के एक अन्य किसान रामचंद्र पाटीदार के ज़रिए उन्हें इसके लिए बीज मिले। बीते साल भी उन्होंने 75,000 रु की लागत से एक एकड़ में 6 क्विंटल हल्दी के बीज लगाए।

महेश के अनुसार इसे लगाने के लिए पांच से सात हज़ार का लेबर खर्च आता है। हल्दी के बेड बनाने में 3000 रुपए तक की लागत आती है। कुल मिलाकर एक एकड़ में लगभग 1 लाख रूपए निवेश करने पड़ते हैं। मगर इससे 50 से 60 क्विंटल हल्दी का उत्पादन होता है। पिछले साल उन्होंने 50 क्विंटल हल्दी 14,000 प्रति क्विंटल के भाव से बेची थी। उन्हें उम्मीद है कि इस साल उत्पादन 60 से 70 क्विंटल तक रहेगा।

संगीता बताती हैं कि यह फसल 10 से 12 महीने में पकती है। “अगर आपने मई में हल्दी लगाईं है तो अगले साल मई में ही इसे निकालना है, उससे पहले नहीं।” 

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संगीता पाटीदार हल्दी के बेड से खरपतवार निकाल रही हैं। | खरगोन | क्रेडिट: शिशिर अग्रवाल

वह कहती हैं कि हल्दी का उत्पादन जैविक तरीके से बेहतर और कम खर्च में होता है। वह मल्चिंग के लिए भी प्लास्टिक शीट की जगह फसलों के अवशेष का इस्तेमाल करती हैं। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और कार्बन की मात्रा भी बढ़ती है साथ ही प्लास्टिक से मिट्टी दूषित भी नहीं होती। वहीं रासायनिक दवाओं के बजाए गाय के गोबर, जीवामृत और विभिन्न प्रकार के अर्क बनाकर वह मिट्टी को पोषण देते हैं।

हल्दी उगाने के लिए 20 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान सबसे उपयुक्त होता है जहां 1500 मिमी या उससे अधिक बारिश होती हो। इसे किसी भी मिट्टी में उगाया जा सकता है लेकिन यह अच्छी पानी निकासी वाली लाल या चिकनी दोमट मिट्टी जिसका पीएच रेंज 4.5-7.5 हो, में सबसे अच्छी तरह उगती है।

मोबाइल से पता चला नई खेती के बारे में

महेश पहले खरगोन में ही एक कपड़ा बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे। मगर 2019 में निजी नौकरी छोड़ वापस गांव आ गए। इसी दौरान उन्होंने अपनी पैतृक ज़मीन पर खेती करने का सोचा। वह बताते हैं, “हमारे बाप-दादा कपास और मिर्च की खेती करते थे। गांव में भी सभी लोग इसी की खेती करते हैं। इसलिए हमने भी कपास और मिर्च की खेती करना शुरू कर दिया।”

मगर पहले ही 2 सालों में उन्हें इस खेती की कठिनाइयों का अंदाज़ा होने लगा। “कपास की बोवनी से लेकर चुनाई तक हर काम में हम मजदूरों पर निर्भर थे। मगर मजदूर मिलना बहुत कठिन था।” इसके साथ ही उन्होंने यह अनुभव किया कि इस खेती में लागत के मुकाबले लाभ कम है। “हर साल मंडी में कपास का रेट गिर जाता है जबकि लागत तो कम नहीं होती।” महेश कहते हैं।

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निजी नौकरी करने वाले महेश अब हल्दी से सालाना लाखों रूपए कमा रहे हैं। | खरगोन | क्रेडिट: शिशिर अग्रवाल

महेश की बात प्रदेश के आंकड़ों में भी सच होती दिखती है। प्रदेश में कपास के उत्पादन में 3.78% की गिरावट आई है। 2023-24 में इसका उत्पादन 873 हज़ार टन था जो 2024-25 में घटकर 840 हज़ार टन रह गया। प्रदेश के हालिया आर्थिक सर्वे में भी इसका कारण कीटों के प्रकोप, मौसमी अस्थिरता और मूल्य अनिश्चितता को बताया गया है। 

2020 में महेश ने अपने 5 एकड़ खेत में कपास लगाया था। उन्हें उम्मीद थी कि इससे प्रति एकड़ 12 से 15 क्विंटल उत्पादन होगा। मगर गुलाबी इल्लियों के चलते बामुश्किल 5 क्विंटल प्रति एकड़ ही उत्पादन हो सका। जब इसे बेचने वह मंडी गए तो वहां भी 4500 से 5000 रूपए प्रति क्विंटल का भाव मिला। 

इसके बाद उन्होने जैविक खेती करने का निर्णय लिया और मोबाइल पर इससे जुड़े वीडियो देखना शुरू कर दिए। “हमने कई वीडियो देखे जैसे मशरूम की खेती के, हल्दी-अदरक और अरहर की खेती के मगर हल्दी और अदरक सबसे सही समझ आया।” इसका कारण पूछने पर वह कहते हैं कि इसकी खेती में लागत और मेहनत अपेक्षाकृत कम और दाम अधिक मिलने की उम्मीद है। 

मध्य प्रदेश में हल्दी का बढ़ता उत्पादन (Line chart)

बाज़ार का संकट

यह दंपत्ति कहते हैं कि कपास से हल्दी की खेती कई मायनों में अच्छी है। मगर कपास के उलट हल्दी के लिए यहां कोई बड़ा बाज़ार नहीं है। महेश ने जिस व्यापारी से बीज खरीदे थे उसी को वह अपनी फसल भी बेचते हैं। इसके अलावा भी कुछ स्थानीय व्यापारियों को वो अपनी फसल बेचते हैं। मगर सीधे मसाला निर्माताओं को बेचने के लिए उन्हें अब तक कोई मौका नहीं मिला है।

खरगोन प्रदेश के प्रमुख कपास उत्पादक जिलों में से एक है जहां 405.7 लाख हेक्टेयर में से 211.45 लाख हेक्टेयर में कपास का उत्पादन होता है। वहीं 17.58 लाख हेक्टेयर में मिर्च की खेती होती है। 

महेश बाज़ार न होने की शिकायत करते हैं मगर जिला स्तर पर तो विभाग को यह भी नहीं पता कि खरगोन में हल्दी का कितना उत्पादन होता है। हालांकि भारतीय मसाला बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार 2020 से 2024 के बीच प्रदेश में हल्दी का उत्पादन और रकबा लगातार बढ़ा है। 2024 में प्रदेश में कुल 26,051 हेक्टेयर में 96,437 मीट्रिक टन हल्दी का उत्पादन हुआ है।

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संगीता मानती हैं कि आने वाले कुछ सालों में और भी किसान उनसे ज़रूर जुड़ेंगे।| खरगोन | क्रेडिट: शिशिर अग्रवाल

महेश कहते हैं कि वह साल भर में 15 से 20 लाख रूपए तक कमा लेते हैं जो कपास और मिर्च से होने वाली कमाई से कहीं ज्यादा है। इससे उनके 6 सदस्यीय परिवार पर भी असर पड़ा है। वह कहते हैं, “अब पहले जैसे पैसे की तंगी नहीं रहती।” महेश और संगीता के 2 बच्चे हैं। इनमें से एक इंजीनियर है तो वहीं दूसरे को वह डॉक्टर बनाना चाहते हैं। इसके लिए वह राजस्थान में उसे एक कोचिंग सेंटर में पढ़ा रहे हैं। वह कहते हैं, “कमाता नहीं तो फीस कैसे भरता? कपास से तो नहीं पढ़ा पाता लड़के को।”

संगीता कहती हैं कि लोग सड़क से निकलते हुए उनका मजाक भी उड़ाते हैं कि इस खेती से कुछ भी नहीं होता। मगर इस दंपत्ति ने इससे आगे बढ़कर जैविक कृषि में और भी प्रयोग करने का मन बना लिया है। महेश कहते हैं कि उन्हें अपने जैसे और भी किसानों को जोड़ना है ताकि “ज्यादा से ज्यादा किसान अच्छा उगा भी सके और अच्छा कमा भी सके”। हालांकि इस दिशा में अब तक उनको बहुत सफलता नहीं मिली। मगर संगीता मानती हैं कि लंबे समय में लोग उनसे ज़रूर जुड़ेंगे। 

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Authors

  • Shishir identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers the rural landscape with a socio-political angle. He loves reading books, watching theater, and having long conversations.

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  • A journalist with over 16 years of experience in the field. Has served as Bureau Chief at Nai Duniya and Patrika, and has also worked with Raj Express, BSTV, and Punjab Kesari. Author of two poetry collections and one travelogue.

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