बुरहानपुर जिले में पांगरी मध्यम सिंचाई परियोजना को लेकर किसान, प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। बुरहान के खकनार तहसील के पंगरी और बसाली गांवों के किसान आरोप लगा रहे हैं कि उनकी कृषि भूमि अधिग्रहित की जा रही है। उनका आरोप है कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मिलने वाला पूरा मुआवजा और पुनर्वास उन्हें नहीं दिया जा रहा। इसी असंतोष के चलते किसान अब प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शनों के जरिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं।
यह विवाद पांगरी मध्यम सिंचाई परियोजना से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में सिंचाई सुविधा बढ़ाना बताया गया है। लेकिन जिन किसानों की जमीन डूब क्षेत्र में जा रही है, उनका कहना है कि विकास की कीमत उनसे कानून से कम देकर वसूली जा रही है।
क्या कहते हैं परियोजना से जुड़े सरकारी दस्तावेज
पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े सरकारी दस्तावेजों के अनुसार पांगरी मध्यम सिंचाई परियोजना खकनार तहसील के पंगरी गांव के पास उतावली नदी पर प्रस्तावित है, जो तापी नदी की एक सहायक नदी है। परियोजना की कुल जल भंडारण क्षमता लगभग 18.5 मिलियन क्यूबिक मीटर बताई गई है। इससे 10 गांवों की लगभग 4,400 हेक्टेयर खेती योग्य भूमि को सिंचाई सुविधा देने का दावा किया गया है। सिंचाई प्रणाली पाइपलाइन आधारित होगी और खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए स्प्रिंकलर सिस्टम का उपयोग किया जाएगा।
इस परियोजना के तहत लगभग 20.60 मीटर ऊंचा और 1986 मीटर लंबा एक मिट्टी का बांध बनाया जाना है। बांध में 120 मीटर लंबा कंक्रीट स्पिलवे होगा, जिसमें छह रेडियल गेट लगाए जाएंगे।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इस परियोजना से कुल 348 हेक्टेयर भूमि जलमग्न होगी। इसमें पांगरी और बसाली गांव की निजी और सरकारी कृषि भूमि शामिल है। दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि किसी भी हिस्से में वन भूमि शामिल नहीं है और परियोजना को श्रेणी बी2 में रखा गया है। इस श्रेणी के तहत विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट जरूरी नहीं मानी गई है। हालांकि मंजूरी से पहले समिति ने मिट्टी प्रबंधन, पेड़ों की संख्या, गाद जमाव और कैचमेंट क्षेत्र से जुड़े कई सवाल उठाए थे।
मुआवजे की गणना को लेकर उठते सवाल
किसानों का मुख्य विवाद मुआवजे की गणना को लेकर है। 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में मुआवजा केवल सर्किल रेट पर नहीं दिया जा सकता है। इसमें सबसे पहले जमीन का बाजार मूल्य तय किया जाता है, जिसमें सर्किल रेट, हाल की बिक्री दरें और सहमति से तय कीमत में से जो ज्यादा हो, उसे आधार माना जाता है। इसके साथ जमीन पर मौजूद पेड़, फसल और संरचनाओं की कीमत भी जोड़ी जाती है।
यदि ग्रामीण इलाके में जमीन ली जाती है, तो सरकार जमीन की जो कीमत तय करती है, उसे एक से दो गुना तक बढ़ाना जरूरी होता है। मिसाल के तौर पर अगर किसी किसान की जमीन की कीमत 10 लाख रुपये मानी गई, तो कानून के हिसाब से वही कीमत बढ़कर 20 लाख रुपये तक मानी जाएगी। इसके बाद ही आगे का मुआवजा जोड़ा जाता है। यानी बाजार मूल्य को दोगुना किया जाता है। इसके ऊपर 100 प्रतिशत सोलैटियम यानी सरकार जमीन की तय की गई कीमत के बराबर उतनी ही अतिरिक्त रकम को जोड़ा जाता है। क्योंकि जमीन की बिक्री स्वेच्छा से नहीं हो रही है। इस प्रक्रिया के बाद मुआवजे की राशि मूल बाजार मूल्य की लगभग चार गुना तक पहुंच जाती है।
इसके अलावा कानून पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अलग अधिकार देता है। सिंचाई परियोजनाओं में जहां संभव हो, वहां जमीन के बदले जमीन देने का प्रावधान है। इसके साथ विस्थापन भत्ता, आवास सहायता और आजीविका से जुड़े अन्य लाभ भी शामिल हैं।
किसानों का कहना है कि प्रशासन इस पूरी प्रक्रिया को लागू नहीं कर रहा। उनके अनुसार उन्हें केवल सामान्य दर पर मुआवजा देने की बात हो रही है, जबकि कानून के मुताबिक उन्हें इससे कहीं अधिक मिलना चाहिए। इसी अंतर को वे “एक गुना” और “दोगुना मुआवजा” के रूप में समझाते हैं, जबकि असल में यह कानून में तय पूरा पैकेज है।
प्रदर्शन का रास्ता क्यों चुना गया
किसानों का कहना है कि वे पिछले तीन वर्षों से ज्ञापन, धरना और बातचीत के जरिए समाधान की मांग कर रहे थे, लेकिन कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया। हाल के महीनों में उन्होंने प्रतीकात्मक विरोध का रास्ता चुना। केले के पत्तों और सागौन के पत्तों के साथ प्रदर्शन कर वे यह दिखाना चाहते हैं कि अगर जमीन और आजीविका छिन गई, तो उनका जीवन बुनियादी गरिमा से भी नीचे चला जाएगा।
एक अन्य प्रदर्शन में किसानों ने सिर पर पौधे रखकर विरोध जताया। उनका तर्क है कि सरकार की नीति उन्हें ऐसी स्थिति में ला रही है जहां खेती जमीन पर नहीं, प्रतीक के रूप में सिर पर करनी पड़ रही है। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि यह केवल मुआवजे का नहीं, बल्कि सम्मान के साथ जीने के अधिकार का सवाल है।
फिलहाल प्रशासन की ओर से मुआवजे और पुनर्वास को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक जवाब नहीं दिया गया है।
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