मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से एक दर्दनाक खबर सामने आई है। जहां पेंच टाइगर रिजर्व के पास एक युवक की बाघ के हमले में मौत हो गई। यह घटना सोमवार को पेंच टाइगर रिजर्व के जमतरा गेट क्षेत्र में देर रात हुई। इस घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने जमतरा गेट पर देर रात विरोध-प्रदर्शन कर अपनी मांगे रखी।
क्या हुआ जंगल में
बताया जा रहा है कि नाहरझिर निवासी 32 वर्षीय दिनेश रेवतकर निजी काम से जंगल की ओर से निकल रहा था। तभी बाघ ने उस पर हमला कर दिया। हमला इतना अचानक हुआ कि दिनेश को संभलने का मौका भी नहीं मिला। उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
जब देर शाम तक दिनेश घर नहीं लौटा तो उसकी तलाश शुरू हुई। देर शाम को जंगल में दिनेश का शव मिला। ग्रामीणों के अनुसार वह बुरी तरह क्षत-विक्षत हालत मिला था। शरीर के तीन टुकड़े हो चुके थे, जो जंगल में बिखरे हुए मिले।
देर रात शुरू हुआ विरोध

घटना की खबर गांव तक पहुंचते ही नाहरझिर, जमतरा और आसपास के इलाकों में मातम के साथ गुस्सा भी फैल गया। ग्रामीण बड़ी संख्या में जमतरा गेट पर जमा हुए। देर रात शुरू हुआ हंगामा, काफी देर तक चला।
इस दौरान ग्रामीणों ने वन विभाग पर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले करीब 15 दिन से इलाके में बाघ की मौजूदगी बनी हुई। इस की सूचना वन विभाग को दी गई थी। लेकिन समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, नहीं तो आज दिनेश जिंदा होता। ग्रामीणों की मुख्य मांगी है कि परिवार को तुरंत मुआवजा दिया जाए, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाए।
मौके पर प्रशासन, मुआवजा प्रक्रिया हुई शुरू
स्थिति को संभालने के लिए प्रशासन काे देर रात ही मौके पर पहुंचना पड़ा। इस दौरान एसडीएम चौराई, प्रभात मिश्रा, एसडीओ, फॉरेस्ट, अतुल पारधी, थाना प्रभारी, चांद, राकेश सिंह बघेल के साथ तहसीलदार और भारी पुलिस बल मौजूद रहा। करीब तीन से चार घंटे तक की समझाइश के बाद हालात काबू में आए।
वन विभाग की ओर से पुनीत गोयल, उपसंचालक, पेंच टाइगर रिजर्व ने बताया, ”गश्त के दौरान टीम को कोर एरिया में शव मिला, जिसके बाद पुलिस और स्थानीय ग्रामीणों की मदद से पहचान हुई।”
पुनीत ने आगे जोड़ते है, ”मृतक के परिजनों को शासन के नियमानुसार मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।”
हालांकि ग्रामीणों का आरोप है कि हर बार यही होता है, पहले हमला, फिर मुआवजा, लेकिन सुरक्षा नहीं। ग्रामीण पूछ रहे है कि जान की कीमत क्या सिर्फ पैसा है।
क्या यह बन रहा पैटर्न और क्या है समाधान
पेंच के बफर जोन में यह पहली घटना नहीं है। जनवरी 2026 में भी एक किसान कमल उइके की बाघ हमले में मौत हुई थी। वे पेंच नदी के किनारे मछली पकड़ने गया था। उस घटना के बाद भी निगरानी और सुरक्षा बढ़ाने की मांग उठी थी, लेकिन यह सीमित ही रहा। हालांकि वन विभाग की नीतियों में समाधान मौजूद हैं, लेकिन जमतरा, नाहरझिर जैसे गांवों में हकीकत इसके उल्ट नजर आती है।
वहीं वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक समस्या है।
सतपुड़ा फाउंडेशन के डिप्टी डायरेक्टर, मंदर पिंगले कहते हैं, ”पेंच में टाइगर की डेंसिटी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में युवा बाघ अपने क्षेत्र की तलाश में बफर जोन में जा रहे हैं। साथ ही इन इलाकों में मानवीय गतिविधियां ( जैसे खेती, चराई, जंगल पर निर्भरता) भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं। ऐसे टकराव बढ़ना लगभग तय है। ”
उनके मुताबिक, यह सिर्फ बाघ बनाम इंसान का मुद्दा नहीं है, बल्कि स्पेस (जगह) और रिसोर्स (संसाधन) के ओवरलैप का परिणाम है।
पिंगले आगे जोड़ते हैं, ”ऐसे मामलों में बाघ को पकड़कर हटाना (रेसक्यू) स्थायी समाधान नहीं है। इससे समस्या सिर्फ एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिफ्ट होती हैं।”
पिंगले, समाधान के तौर पर तीन अहम चीजों पर जोर देते हैं:
- अर्ली वार्निंग सिस्टम ( जैसे- एआई मूवमेंट अर्लट, एसएमएस/व्हाट्एस अर्लट, लोकल वॉच ग्रुप)
- स्थानीय समुदाय की भागीदारी
- ग्राउंड लेवल पर लगातार संवाद और भरोसा बनाना।
उनका मानना है कि जब तक गांव के लोग खुद सिस्टम का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक ऐसे टकराव कम नहीं होंगे।
दरअसल, सतपुड़ा फाउंडेशन पिछले दो दशक से महाराष्ट्र पेंच टाइगर रिजर्व के बफर गांवों में काम करते हुए यही मॉडल अपनाता रहा है। जहां स्वास्थ्य, जागरूकता और विश्वास के जरिए समुदायों को संरक्षण से जाेड़ा जाता है।
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