ट्रेड डील जल्द लागू हो सकती है, तमिलनाडु में पूर्वोत्तर मानसून, कश्मीर में सेब किसानों की चिंता बढ़ी, मप्र में भावान्तर से सोयाबीन खरीद। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप दे दिया गया है और फिलहाल इसका कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने उम्मीद जताई कि समझौते को जल्द लागू किया जा सकेगा।
तमिलनाडु में पूर्वोत्तर मानसून 15 अक्टूबर को सामान्य समय से पांच दिन पहले पहुंच गया। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने नीलगिरी, मदुरै समेत छह जिलों में भारी से बहुत भारी बारिश की आशंका के चलते ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। राज्य में 21 अक्टूबर तक बारिश का दौर जारी रहने का अनुमान है।
जम्मू कश्मीर के उपरी हिस्से में सीजन की पहली बर्फ़बारी हुई है. बारिश, तेज हवाओं और ओलावृष्टि की आशंका के चलते किसान सेब की गुणवत्ता खराब होने और बाजार में कम कीमत मिलने के डर से काम के घंटे बढ़ा रहे हैं। मौसम विभाग ने 17 से 24 अक्टूबर के बीच शुष्क मौसम रहने का अनुमान जताया है और किसानों को कटे हुए सेब सुरक्षित रखने की सलाह दी है।
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज बाधित होने से उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति रुक सकती है। आपूर्ति बाधित रहने पर अनाज और खाद्यान्न के दाम 81% तथा तिलहन फसलों के दाम 66% तक बढ़ सकते हैं।
मध्य प्रदेश कैबिनेट ने खरीफ 2026 सीजन के लिए सोयाबीन उत्पादकों हेतु भावांतर भुगतान योजना को स्वीकृति दी। योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को 17 अक्टूबर तक ई-उपार्जन पोर्टल पर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा।
मध्य प्रदेश में सरकार द्वारा हानिकारक माने गए कीटनाशक (पैराक्वाट) युक्त मूंग की खरीद जारी रहने की बात सामने आई। केंद्र के कोटे से अधिक मूंग खरीदकर उसे बाजार में 20 से 30% कम दाम पर बेचा गया। इस पूरी प्रक्रिया के कारण राज्य सरकार के खजाने को सालाना ₹1,000 करोड़ और तीन वर्षों में कुल ₹3,062 करोड़ का घाटा हुआ।
विस्तृत चर्चा
एक रिपोर्ट के अनुसार अलर्ट मिलने के बावजूद तीन में से एक व्यक्ति आपदा की चेतावनी पर कार्रवाई नहीं कर पाता। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं पल्लव जैन।
अर्ली वार्निंग के बाद भी 36% लोग कोई कदम नहीं उठा सके
140 देशों में किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण वर्लड रिस्क पोल से पता चला है कि आपदा से प्रभावित 80% एडल्ट्स को अर्ली वॉर्निंग अलर्ट मिल गया था, लेकिन 36% लोग बचाव के लिए कोई कदम नहीं उठा सके; चेतावनी पहुँच और तैयारियों के मामले में गरीब देशों में सबसे बड़ी कमियां देखने को मिलती हैं।
140 देशों और क्षेत्रों में 143,000 से अधिक लोगों के साक्षात्कारों पर आधारित इस रिपोर्ट से पता चला है कि कम आय वाले देशों के एडल्ट्स आपदाओं का सामना करने की संभावना, उच्च आय वाले देशों के एडल्ट्स की तुलना में लगभग दोगुनी थी।
कम आय वाले देशों में ‘अर्ली वार्निंग’ की पहुंच 64% थी, जबकि उच्च-मध्यम और उच्च आय वाले देशों में यह 84% थी; मध्य और पश्चिमी अफ्रीका में यह पहुंच सबसे कम, यानी 47% दर्ज की गई।
वयस्कों को नहीं मिली चेतावनी
आपदा से प्रभावित 170 मिलियन से अधिक ऐसे वयस्क थे, जिन्हें कोई चेतावनी नहीं मिली, लेकिन उनके पास मोबाइल फोन थे। इससे पता चलता है कि ‘अर्ली वार्निंग’ सिस्टम तक लोगों की पहुंच बढ़ाने की काफी संभावनाएं मौजूद हैं।
कुछ दिनों पहले जो नेपाल में बाढ़ आई थी उसमें लोगों को एसएमएस के माध्यम से सुबह 6 बजे चेतावनी दी गई और दो बार दी गई, इसका असर यह हुआ कि एक भी व्यक्ति की मौत इस आपदा में नहीं हुई वहीं जो इससे पहले नेपाल के भोटेकोशी में बाढ़ आई थी उसमें बड़े स्तर पर लोगों की मौत हो गई थी। तो हम कह सकते हैं कि अर्ली वॉर्लिंग अलर्ट्स बहुत इँपॉर्टैंट हैं डिज़ास्टर से बचने के लिए। उसी ओर यह सरवे इशारा करता है।
जागरूकता भी ज़रूरी
महत्वपूर्ण बात ये है कि मैसेज कैसा है और वह कितने लोगों तक पहुंच रहा है? उतनी ही बेहतर प्रिपेयरड्नेस होगी। सर्वे यह बताता है कि सिर्फ अलर्ट मिल जाना ही काफी नहीं है, लोगों को जागरुक करना भी ज़रुरी है कि अब आगे करना क्या है।
क्लाईमेट चेंज की वजह से प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं, हम इन आपदाओं को रोक तो नहीं सकते लेकिन लोगों को तैयार करके, नुकसान को कम कर सकते हैं। इसमें अर्ली वॉर्निंग ही एक विकल्प हमारे पास है कि यह मैकेनिज़्म बेहतर, सटीक और व्यापक पहुंच वाला हो।
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