वेस्टर्न घाट के संरक्षण पर राज्यों की आपत्ति, पुणे में हर गुरूवार पानी की कटौती, गूगल के डेटा सेंटर का विरोध, मप्र में बिजली संकट। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
केंद्र सरकार ने पश्चिमी घाट के 56 हज़ार 825.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने का प्रस्ताव रखा है। गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु इस प्रस्ताव में बदलाव या कुछ क्षेत्रों को बाहर रखने की मांग कर रहे हैं। मसौदे में खनन, पत्थर की खदानों, नई थर्मल पावर परियोजनाओं और कुछ बड़े निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है, लेकिन खेती पर पूर्ण प्रतिबंध या लोगों को विस्थापित करने का प्रावधान नहीं है।
पुणे नगर निगम (PMC) ने अल नीनो के प्रभाव और भविष्य में जल संकट की आशंका को देखते हुए 15 अक्टूबर से 31 अगस्त 2027 तक प्रत्येक गुरुवार को पूरे शहर में जलापूर्ति बंद रखने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य पानी की खपत में कम से कम 10% की कमी लाना है।
तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और त्रिपुरा सहित कम से कम 5 राज्यों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) के लिए तत्काल फंड जारी करने और NULM 2.0 पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। राज्यों ने चेतावनी दी है कि वित्तीय स्पष्टता न होने से शहरी गरीबों की सामाजिक सुरक्षा पर बुरा असर पड़ेगा।
विशाखापट्टनम में गूगल के तीन डेटा सेंटर कैंपस बनाने के लिए राज्य सरकार ने 3 गांवों की 586 एकड़ जमीन आवंटित की है, जिसके तहत 160 एकड़ में जंगल काटने और पहाड़ियां समतल करने का आरोप है। वन्यजीव अभयारण्य और जलाशय के पास होने के कारण पर्यावरणविद और ग्रामीण आजीविका छिनने को लेकर विरोध कर रहे हैं।
भारतीय किसान संघ ने मध्य प्रदेश में भावांतर योजना को अस्वीकार करते हुए सोयाबीन, धान, मक्का, बाजरा, मूंग, उड़द और मूंगफली सहित 7 फसलों की शत-प्रतिशत खरीद केंद्र की MSP पर करने की मांग की है। संघ ने प्रभावित जिलों को तत्काल सूखाग्रस्त घोषित करने, रबी सीजन में 12 घंटे बिजली देने, फसलों के नुकसान का सैटेलाइट के बजाय प्रत्यक्ष मैदानी सर्वे (नेत्रांकन) कराने और जले ट्रांसफॉर्मर बदलने हेतु ‘ट्रांसफॉर्मर बैंक’ बनाने की मांग रखी।
मध्य प्रदेश में 800 मेगावाट बिजली की कमी चल रही है, जिसके चलते ग्रामीण इलाकों में अघोषित बिजली कटौती हो रही है। ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने कहा कि जरूरत पड़ने पर बिजली खरीदी जाएगी, घरेलू आपूर्ति 24 घंटे रखी जाएगी और किसानों को 10 घंटे बिजली देने की प्रतिबद्धता पूरी की जाएगी।
विस्तृत चर्चा
मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) में छह महीनों में कम से कम 80 नवजात शिशुओं की मौत हुई। पल्लव जैन बता रहे हैं पूरा मामला क्या है?
जिला अस्पताल में बच्चों की मौत
इंडियन एक्सप्रेस में आज एक खबर प्रकाशित हुई जिसके मुताबिक मध्य प्रदेश के सिवनी ज़िला अस्पताल के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) में छह महीने के दौरान कम से कम 80 नवजात शिशुओं की मौत हो गई है।
विधायक का औचक निरिक्षण
सिवनी विधायक दिनेश राय मुनमुन का कहना है कि जब उन्हें पता चला कि अस्पताल में परिजनों से पैसे मांगे जाते हैं और बच्चों की मौतें बढ़ रही हैं तो उन्होंने जिला अस्पताल का औचक निरीक्षण किया। राय के अनुसार, उनके दौरे के समय वहाँ कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया, कि “सांस लेने में तकलीफ़ के कारण 46 बच्चों की मौत हो गई। अस्पताल में सांस लेने में तकलीफ़ वाले बच्चों के लिए वेंटिलेटर है और इसके लिए एक डॉक्टर की नियुक्ति होनी चाहिए। लेकिन डॉक्टर रात में वहां नहीं रहते हैं। नर्सें इस काम के लिए ट्रेंड नहीं हैं।”
सिविल सर्जन का पक्ष
इस मामले पर सिविल सर्जन डॉक्टर विनोद कुमार नवकर का भी बयान आया है। उन्होंने कहा कि एसएनसीयू में ज़िले के दूर-दराज़ ग्रामीण इलाकों से गंभीर रूप से बीमार नवजात शिशुओं को रेफर करके लाया जाता है। कई बार ये बच्चे छह, सात या आठ महीने में पैदा होते हैं। उन्हें कई तरह की दिक्कतें होती हैं और उन्हें खास देखभाल की ज़रूरत होती है। समय से पहले पैदा होने वाले और कम वज़न वाले बच्चों में मौत का ख़तरा काफ़ी ज़्यादा होता है।
वो कहते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, बच्चे का जन्म के समय सामान्य वज़न 2.5 किलोग्राम होना चाहिए। जब बच्चा समय से पहले पैदा होता है और उसका वज़न इससे कम होता है, तो मृत्यु दर 48 प्रतिशत तक हो सकती है।
नवकार ने बताया कि ज़िला अस्पताल ने पिछले छह महीनों में 1,188 नवजात शिशुओं का इलाज किया, जिनमें से 642 – यानी आधे से ज़्यादा – का जन्म के समय वज़न सामान्य से कम था।
मौत के आंकड़ों पर तर्क
अस्पताल के मुताबिक अप्रैल से जून के बीच लगभग 34 मौतें हुईं, और उसके बाद जुलाई से सितंबर के बीच 46 मौतें हुईं।
अस्पताल के कामकाज का बचाव करते हुए नवकार ने कहा कि SNCU में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर 7.5 प्रतिशत से कम थी, जो जबलपुर डिवीज़न के अन्य ज़िलों की तुलना में कम है। उन्होंने नवजात शिशु इकाइयों के लिए मृत्यु दर का सुझाया गया मानक 10% बताया।
विधायक ने प्रशासन के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि अस्पताल में शिशु मृत्यु दर दूसरे ज़िलों की तुलना में कम थी। उन्होंने तर्क दिया कि दर्ज की गई मौतों से समस्या की पूरी गंभीरता का पता नहीं चल सकता, क्योंकि गंभीर रूप से बीमार नवजात शिशुओं को दूसरी जगह रेफर किया जा रहा था।
बीजेपी विधायक दिनेश राय मुनमुन ने इन मौतों की जांच की मांग की है।
मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यू दर पहले ही बहुत ज्यादा है, ऐसे में अगर अस्पताल प्रशासन की तरफ से लापरवाही बरती जा रही है तो यह मामला बेहद गंभीर हो जाता है।
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