भोपाल के नीलबड़ इलाके में एक वर्कशॉप में गणेश प्रतिमाओं की कतार लगी है। पहली नजर में ये प्रतिमाएं दूसरी पारंपरिक मूर्तियों जैसी ही दिखाई देती हैं, लेकिन इनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला मुख्य कच्चा माल अलग है। यहां गणेश प्रतिमाओं के साथ पूजा की थाली, चौकी, सिंहासन और बाल गोपाल को बैठाने के लिए पटले तक गोबर से बनाए जा रहे हैं।
इस काम को शुरू करने वाले युवा आशीष पाटीदार के मुताबिक, इसके पीछे उनके पिता का विचार था कि गाय के दूध देना बंद करने के बाद किसानों द्वारा उन्हें छोड़ देना एक बड़ी समस्या है। ऐसे में गोबर और गोमूत्र के उपयोग को आय के साधन से जोड़कर गायों और गौशालाओं के लिए एक वैकल्पिक आर्थिक मॉडल तैयार किया जा सकता है।
आशीष के मुताबिक, उनकी गणेश प्रतिमाओं में करीब 95 फीसदी गोबर का पाउडर इस्तेमाल होता है। बाकी हिस्सा प्राकृतिक बाइंडिंग एजेंट का होता है। इसके लिए मैदा, लकड़ी की छाल के पाउडर और विकल्प के तौर पर ग्वार गम का इस्तेमाल किया जाता है। इन सामग्रियों को आटे और पानी के साथ मिलाकर मूर्ति का मिश्रण तैयार किया जाता है।
लेकिन गोबर को मूर्ति का आकार देना इस प्रक्रिया का सबसे कठिन हिस्सा नहीं है। असली समय इसके बाद लगता है। सांचे में ढालने के बाद एक प्रतिमा को सूखने में करीब 15 से 20 दिन लगते हैं। इसके बाद फिनिशिंग में पांच से छह दिन और लगते हैं। यानी कच्चे गोबर से लेकर तैयार प्रतिमा तक करीब 25 दिन का समय लग सकता है।
गणेश चतुर्थी के आसपास मांग बढ़ने के कारण इस काम में पूरा परिवार जुट जाता है। आशीष के साथ काम करने वाली महिलाएं और उनके परिवार के सदस्य भी प्रतिमाओं की बारीकियों में मदद करते हैं। किसी प्रतिमा में आंखें बनानी होती हैं तो किसी में चूहा या अन्य सजावटी हिस्से तैयार करने होते हैं।
यह काम अब केवल घरेलू स्तर की गतिविधि नहीं रह गया है। आशीष के अनुसार, इस वर्ष उन्होंने करीब 15,000 प्रतिमाएं तैयार कीं। इनकी कीमत छोटी पांच इंच की प्रतिमा के लिए करीब 100 रुपये से शुरू होती है और बड़ी प्रतिमाएं 2,100 रुपये तक जाती हैं। शुरुआती वर्षों की तुलना में उनके ग्राहकों की संख्या भी कई गुना बढ़ी है।
इस काम से स्थानीय महिलाओं को भी आय का अवसर मिल रहा है। आशीष के मुताबिक, आसपास की पांच-छह महिलाएं साल भर इस काम से जुड़ी रहती हैं।
गोबर की यह अर्थव्यवस्था केवल मूर्तियों तक सीमित नहीं है। पूजा की चौकी, थाली और सिंहासन जैसे उत्पादों को मिलाकर साल भर में करीब 60-70 हजार किलो गीले गोबर का इस्तेमाल होने का दावा आशीष करते हैं। प्रसंस्करण और सुखाने के बाद इसका वजन काफी कम हो जाता है। इसके लिए गोबर स्थानीय गौशालाओं से खरीदा जाता है और आशीष के मुताबिक, इससे गौशालाओं को सालाना करीब दो से तीन लाख रुपये का भुगतान होता है।
क्या गोबर की मूर्ति सच में पर्यावरण के लिए सुरक्षित है?
इस मॉडल का एक महत्वपूर्ण पहलू गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन से जुड़ा है। भारत में गणेशोत्सव के बाद प्रतिमाओं को जल स्रोतों में विसर्जित करने की परंपरा है। प्लास्टर ऑफ पेरिस और कुछ रासायनिक रंगों से बनी प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर जल प्रदूषण की चिंता लंबे समय से सामने आती रही है।
आशीष का कहना है कि उनकी प्रतिमाओं में लेड-फ्री और वाटर-बेस्ड रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। फिनिशिंग के लिए भी खाने योग्य गोंद से तैयार लेप इस्तेमाल किया जाता है। उनका दावा है कि इस वजह से प्रतिमाएं पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल हैं और पानी में जाने पर नुकसान नहीं करतीं।
हालांकि, इस दावे को लेकर सावधानी जरूरी है। गोबर प्राकृतिक सामग्री जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बड़ी मात्रा में गोबर को जल स्रोत में डालना अपने आप पर्यावरण के लिए सुरक्षित हो जाता है। आफ्रिका में हुए एक शोध के मुताबिक गोबर में नाइट्रोजन, फास्फोरस और कार्बनिक पदार्थ होते हैं। पानी में इनकी मात्रा बढ़ने से पोषक तत्वों की अधिकता, शैवाल की अत्यधिक वृद्धि और घुलित ऑक्सीजन में कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए गोबर से बनी प्रतिमाओं के विसर्जन का वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव समझने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण और स्वतंत्र अध्ययन की जरूरत है।
आशीष खुद भी इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत बताते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसा पूरा इकोसिस्टम तैयार करना है जिसमें कच्चे माल की उपलब्धता, उत्पादन, डिजाइन, बाजार और बिक्री अलग-अलग स्तर पर विकसित हों। फिलहाल कच्चे माल की तैयारी से लेकर उत्पाद बनाने, मार्केटिंग और बिक्री तक का काम उन्हें खुद संभालना पड़ता है।
उनके वर्कशॉप में इसका एक उदाहरण लकड़ी के विकल्प के तौर पर तैयार किया गया बुक स्टैंड है। आशीष का दावा है कि गोबर से तैयार यह उत्पाद मजबूती और टिकाऊपन में लकड़ी के करीब है।
गोबर को केवल कचरे या गौशाला से निकलने वाले अपशिष्ट के रूप में देखने के बजाय उसे उत्पाद और आय के स्रोत में बदलने की कोशिश यहां दिखाई देती है। लेकिन इस मॉडल की वास्तविक पर्यावरणीय उपयोगिता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि उत्पाद प्राकृतिक सामग्री से बना है। इसकी कसौटी यह भी होगी कि उत्पादन में संसाधनों का इस्तेमाल कितना होता है, उत्पाद के इस्तेमाल और निपटारे के बाद पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या इसे बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक रूप से टिकाऊ बनाया जा सकता है।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
अन्य वीडियो रिपोर्ट्स
मूंग किसानों का आंदोलन जारी, क्या हैं प्रमुख मांगें?
मध्य प्रदेश की खाद ई-टोकन व्यवस्था क्यों हो गई फेल?
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।



