भोपाल से लगभग 200 किलोमीटर दूर कुंडला आगर गांव के ग्रामीणों ने 21 जुलाई को बारिश के बीच विरोध प्रदर्शन किया था। ग्रामीणों का कहना था कि गांव में स्थित इथेनॉल फैक्ट्री दूषित पानी नाले में बहा रही है। कुंडला आगर गांव के ग्रामीणों का आरोप है कि फैक्ट्री से निकलने वाला पानी नाले के जरिए गांव के जलस्रोतों तक पहुंच रहा है। कंपनी इन आरोपों से इनकार करते हुए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज व्यवस्था का दावा कर रही है।
ग्राउंड रिपोर्ट की टीम 11 अगस्त को ग्रामीणों की शिकायतों और फैक्ट्री की स्थिति का जायजा लेने गांव पहुंची। आगर मालवा से करीब 7 से 8 किलोमीटर पहले बाईं तरफ इथेनॉल फैक्ट्री स्थित है। इसी तरफ से गांव का रास्ता जाता है।

गांव में प्रवेश करते ही दुर्गंध महसूस हुई। ग्रामीणों ने बताया कि यह उनके लिए रोजमर्रा की बात है। उन्होंने विरोध प्रदर्शन के दौरान बनाए गए फोटो और वीडियो दिखाते हुए फैक्ट्री की तरफ इशारा किया और कहा कि दूषित पानी नाले में छोड़ा जा रहा है।
कंपनी द्वारा जारी क्रेडिट रेटिंग दस्तावेज़ (CareEdge Ratings) के अनुसार, ज़िरकॉन एडवांस फ्यूल्स प्राइवेट लिमिटेड (ZAFPL) ने आगर मालवा जिले में 190 KLPD क्षमता वाले अपने ग्रीनफील्ड ग्रेन-बेस्ड इथेनॉल प्लांट का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है।
दस्तावेज़ के मुताबिक, 31 मार्च 2025 से इस प्लांट का ट्रायल रन शुरू हो चुका है और जुलाई 2025 से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को इथेनॉल आपूर्ति की प्रक्रिया भी तय की गई है।
ग्रामीणों की शिकायतों के बाद मध्य प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग, स्थानीय प्रशासन और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (Public Health Engineering) विभाग ने मामले में कार्रवाई शुरू की है। इसी बीच प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ऑनलाइन मॉनिटरिंग पोर्टल पर सामने आए आंकड़ों ने पानी के फ्लो मीटर और बॉयलर उत्सर्जन से जुड़े नए सवाल खड़े किए हैं।

नाले तक पहुंचने का रास्ता
ग्रामीण टीम को उस नाले के पास लेकर गए, जिसे लेकर शिकायत की गई थी। 9 और 10 अगस्त को हुई तेज बारिश के बाद नाला काफी हद तक साफ हो चुका था, लेकिन उसमें से दुर्गंध आ रही थी।
फैक्ट्री के आखिरी छोर तक पहुंचने के लिए नाले के पानी में उतरकर कीचड़ और फसलों से ढके रास्ते से करीब 10 मिनट तक चलना पड़ा। जिस स्थान को ग्रामीण पानी छोड़े जाने की जगह बता रहे थे, वहां पानी स्थिर और मटमैला था। हालांकि, उस समय फैक्ट्री से पानी निकलता हुआ दिखाई नहीं दिया।
नाले की रिकॉर्डिंग के दौरान कंपनी के कुछ कर्मचारी टीम की भी रिकॉर्डिंग करने लगे। टीम ने बिना प्रतिक्रिया दिए रिकॉर्डिंग जारी रखी।
नाले की पुलिया पर कुछ ग्रामीण मिले। यह पुलिया गांव के लोगों के आने-जाने का रास्ता है। ग्रामीणों ने बताया कि वे नाले के पानी से हाथ-पैर धोते हैं। उन्होंने हाथों में खुजली और इन्फेक्शन की शिकायत की।
ग्रामीण टीम को पिपल्या कुमार बांध पर भी लेकर गए, जहां से कंपनी के पानी लेने की बात कही गई है।वहां स्थानीय किसान शिव सिंह के अनुसार, सिंचाई विभाग ने कुछ समय के लिए पानी देने पर रोक लगाई थी, लेकिन बाद में फिर पानी देना शुरू कर दिया गया। इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान टीम को नहीं मिला।
शिव सिंह ने बताया कि गर्मी के दौरान किसानों को पानी की समस्या हुई थी।
कंपनी ने आरोपों से इनकार किया
ग्रामीणों की शिकायतों और कंपनी के दावे का भौतिक सत्यापन करने के लिए टीम ने फैक्ट्री के अंदर जाने का प्रयास किया। गेट पर मौजूद सुरक्षा कर्मचारियों ने कंपनी मालिक की अनुमति के बिना प्रवेश देने से इनकार कर दिया।
कंपनी मालिक रकब चंद जैन से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया। बाद में उन्होंने दूसरे नंबर से फोन किया और बताया कि वे बाहर हैं, इसलिए मुलाकात नहीं हो सकती।
फोन पर जैन ने ग्रामीणों के आरोपों को बेबुनियाद बताया। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत के नोटिस और ग्रामीणों की शिकायतें कंपनी को ब्लैकमेल करने की कोशिश हैं। उनका आरोप था कि कुछ ग्रामीण कंपनी में चोरी करते हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई होने पर एफआईआर वापस लेने का दबाव बनाया जाता है।
जैन ने कहा कि फैक्ट्री से पानी बाहर नहीं जाता और प्लांट का पानी रिसाइकल होकर दोबारा इस्तेमाल होता है। उन्होंने कहा कि बारिश का पानी बाहर जाने से रोका नहीं जा सकता।
मौके के फोटो और वीडियो के बारे में पूछे जाने पर जैन ने कहा कि फैक्ट्री से कोई डिस्चार्ज नहीं होता।

ग्राम पंचायत की शिकायत
ग्राम पंचायत सचिव रामबाबू कारपेंटर के अनुसार, पंचायत में सेमली और कुंडला खेड़ा गांव शामिल हैं। दोनों गांवों की अनुमानित आबादी करीब 2,794 है।
रामबाबू ने बताया कि ग्रामीणों को एक वर्ष से अधिक समय से परेशानी हो रही है। उनके मुताबिक, फैक्ट्री की सुरक्षा व्यवस्था के कारण ग्राम पंचायत के अधिकारियों को भी अंदर प्रवेश नहीं दिया जाता।
उन्होंने कहा कि पहले फैक्ट्री से ऐसी शिकायतें नहीं आती थीं, लेकिन बाद में नाले के पिछले हिस्से में पानी छोड़े जाने लगा। रामबाबू के अनुसार, दुर्गंध 24 घंटे बनी रहती है और आगर की कुछ कॉलोनियों तक महसूस होती है।
उन्होंने बताया कि कंपनी को मिली अनुमति में जीरो लिक्विड डिस्चार्ज का उल्लेख है। उनके मुताबिक, फैक्ट्री शुरू होने के लगभग एक से डेढ़ वर्ष बाद डिस्चार्ज से जुड़ी समस्या सामने आई और यह समस्या बारिश शुरू होने से पहले ही शुरू हो गई थी।
रामबाबू ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को मौखिक रूप से शिकायत दी गई, लेकिन अब तक केवल आश्वासन मिला।
तहसीलदार और मानवाधिकार आयोग का निरीक्षण
आगर तहसीलदार विजय सैनी, 21 जुलाई 2026, ने बताया कि ग्रामीणों ने फैक्ट्री का गंदा पानी नाले में जाने और वातावरण दूषित होने के विरोध में चक्काजाम किया था।
मौके के हालात के बारे में तहसीलदार ने कहा कि कंपनी की तरफ से नाले में गंदा पानी छोड़ा गया था। उन्होंने बताया कि उस समय लिखित पंचनामा नहीं बनाया गया, बल्कि पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट एसडीएम को दी गई।
इसके विपरीत, उज्जैन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी दीपक काले ने कहा कि जिरकोन एडवांस्ड फ्यूल्स प्राइवेट लिमिटेड को 24 मार्च 2025 को अनुमति दी गई थी और कंपनी की निगरानी ऑनलाइन पोर्टल के जरिए होती है। हालांकि, पोर्टल पर जानकारी देखने पर कोई डेटा दिखाई नहीं दिया।
ग्रामीणों की शिकायतों के बाद 17 अगस्त को उन्हें सूचना पत्र जारी किया गया और 18 अगस्त को आगर कलेक्ट्रेट में मानवाधिकार आयोग के सामने सुनवाई के लिए बुलाया गया।
जनसुनवाई में मध्य प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष डॉ. अवधेश प्रताप सिंह के सामने ग्रामीणों ने फैक्ट्री से जुड़ी समस्याएं रखीं।
इसके बाद आयोग अध्यक्ष, डीआईजी मुकेश कुमार श्रीवास्तव, आगर कलेक्टर डॉ. शेर सिंह मीणा, एसपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की टीम ने फैक्ट्री का भौतिक निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान उद्योग में इस्तेमाल होने वाले पानी की मात्रा, अपशिष्ट जल के ट्रीटमेंट और निकासी व्यवस्था का जायजा लिया गया। आयोग अध्यक्ष ने अधिकारियों को पानी के सैंपलों की जांच के आधार पर स्वास्थ्य और जन-सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए।




21 जुलाई 2026 को ग्रामीणों के प्रदर्शन के बाद मामले में आधिकारिक हस्तक्षेप हुआ। फ़ोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
जांच में अलग-अलग दावे
18 अगस्त के निरीक्षण के दौरान मौजूद उज्जैन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिक एस.के. गुप्ता ने कहा कि कंपनी में जीरो डिस्चार्ज पाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि इससे पहले की स्थिति के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है।
PHE विभाग के सब इंजीनियर विजय चावड़ा ने बताया कि 23 जुलाई को गांव के अंदर और बाहर के हैंडपंपों तथा एक निजी कुएं से पानी के सैंपल लिए गए थे। उनके अनुसार, जांच में फिलहाल कोई संदूषण नहीं मिला।
चावड़ा ने कहा कि यदि नाले में पानी छोड़े जाने का सिलसिला जारी रहा तो आगे समस्या पैदा हो सकती है। यह नाला नलखेड़ा में लखंदर नदी तक जाता है। नल-जल योजना की ट्यूबवेल की भी जांच की गई है और फिलहाल उसमें संदूषण नहीं मिला।
PHE विभाग ने गांव के पानी को निगरानी में रखने और हर महीने जांच करने की बात कही है।
जीरो लिक्विड डिस्चार्ज, नियम और मानक
नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ प्रेम कुमार कटियार ने बताया कि जीरो लिक्विड डिस्चार्ज व्यवस्था में फैक्ट्री का पानी बाहर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस व्यवस्था में ETP और अन्य उपकरणों के जरिए पानी का ट्रीटमेंट कर उसे प्लांट में ही दोबारा इस्तेमाल किया जाता है।
उनके अनुसार, यदि पानी बाहर छोड़े जाने की शिकायत है तो फैक्ट्री में आने वाले पानी, ट्रीटमेंट के बाद दोबारा इस्तेमाल किए जाने वाले पानी और नाले के अलग-अलग स्थानों से लिए गए सैंपलों की तुलना की जानी चाहिए।
अन्य उद्योगों में करीब आठ वर्ष का अनुभव रखने वाले एक सूत्र ने कहा कि पानी को ट्रीट कर दोबारा इस्तेमाल करना महंगा होता है। उनके मुताबिक, कुछ कंपनियां पानी को स्टोर कर बाद में नदियों या नालों में छोड़ सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऑनलाइन मॉनिटरिंग होने का अर्थ यह नहीं है कि ट्रीटमेंट और डिस्चार्ज की पूरी प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से सत्यापित हो रही है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों के अनुसार धान और अनाज आधारित इथेनॉल फैक्ट्रियां रेड कैटेगरी के उद्योगों में आती हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत डिस्टिलरी उद्योगों में जीरो लिक्विड डिस्चार्ज व्यवस्था लागू है।
इसके तहत फैक्ट्री परिसर से बाहर खुले नाले, नदी, जमीन या भूजल स्रोत में रसायनयुक्त अपशिष्ट जल छोड़ना प्रतिबंधित है। प्लांट से निकलने वाले गाढ़े अपशिष्ट को UASB रिएक्टर के जरिए बायोगैस में बदलने और सुखाकर DDGS यानी पशु आहार में बदलने की व्यवस्था बताई गई है।
ट्रीट किए गए कंडेनसेट पानी के लिए BOD की सीमा 30 मिलीग्राम प्रति लीटर और COD की सीमा 250 मिलीग्राम प्रति लीटर निर्धारित है। निगरानी के लिए OCEMS यानी Online Continuous Effluent Monitoring System का प्रावधान है।

ऑनलाइन डेटा में नए सवाल
ग्राउंड रिपोर्ट की टीम ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम से 1 जुलाई से 23 अगस्त 2026 तक का डेटा देखा।
सरकारी सर्वर के अनुसार, इस अवधि में कंडेनसेट पॉलिशिंग यूनिट यानी CPU से जुड़े सभी 11 वॉटर फ्लो मीटरों की डेटा उपलब्धता लगातार 0.0 प्रतिशत दर्ज थी। इन मीटरों के सामने डेटा की स्थिति NA यानी Not Available दिखाई दे रही थी।
पोर्टल पर 1 से 6 अगस्त और फिर 18 अगस्त 2026 को उद्योग का स्टेटस Site Shutdown दर्ज था। इसी दौरान 50 TPH क्षमता वाले बॉयलर Boiler_50TPH_PM की डेटा उपलब्धता 87.04 प्रतिशत दर्ज हुई।
10 अगस्त 2026 को इसी बॉयलर के उत्सर्जन मापदंड की वैल्यू 32765.0 दर्ज हुई। इस डेटा के संबंध में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया, लेकिन 25 अगस्त तक कोई जवाब नहीं मिला।
भोपाल में पदस्थ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी दीक्षित ने कहा कि इथेनॉल प्लांट रेड कैटेगरी में आते हैं और उन्हें ऑनलाइन जानकारी भेजनी होती है। उन्होंने यह भी कहा कि NA का अर्थ Not Applicable और Not Available दोनों हो सकता है और संबंधित उद्योग की जानकारी क्षेत्रीय कार्यालय से ही स्पष्ट हो सकेगी।
कंपनी का पलटवार
तहसीलदार के बयान के बाद रकब चंद जैन ने कहा कि फैक्ट्री से डिस्चार्ज निकालने का कोई रास्ता नहीं है। उन्होंने कहा कि गांव के लोग नाले में कुछ भी डाल सकते हैं और जरूरी नहीं कि वहां मिली सामग्री फैक्ट्री से आई हो।
जैन ने आरोप लगाया कि सरपंच के भाई ने फैक्ट्री में चार प्लॉट मांगे थे और मांग पूरी नहीं होने पर फैक्ट्री बंद कराने की धमकी दी। उन्होंने ग्रामीणों पर प्लांट में चोरी करने और एफआईआर से नाम हटाने के लिए दबाव बनाने का आरोप भी लगाया।
नाले में मिली चीजों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। उन्होंने फैक्ट्री में फ्लो मीटर लगे होने की बात कही, लेकिन पानी का बिल उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया।
आगर मालवा एसडीएम मिलिंद ने बताया कि तहसीलदार ने जांच रिपोर्ट सौंपी थी। इसके आधार पर कलेक्टर ने जांच दल का गठन किया है। उन्होंने कहा कि जांच में क्या सामने आया है, यह रिपोर्ट मिलने के बाद ही स्पष्ट होगा।
आगर मालवा कलेक्टर से संपर्क करने के लिए टीम ने कई बार फोन किया और संदेश भेजे, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया।
फिलहाल ग्रामीणों के आरोप, कंपनी का जीरो लिक्विड डिस्चार्ज का दावा, प्रशासनिक रिपोर्ट और ऑनलाइन मॉनिटरिंग डेटा—इन सभी के आधार पर जांच जारी है। पानी के सैंपलों और जिला स्तर पर गठित जांच दल की रिपोर्ट आने के बाद ही नाले में पानी छोड़े जाने और पेयजल स्रोतों पर इसके असर की स्थिति स्पष्ट होगी।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
2 दशक से शिप्रा बचाने की लड़ाई लड़ रहे बाकिर अली रंगवाला से मिलिए
तमाम इंडेक्स में आगे होने पर भी भारत पर्यावरण सूचकांक में फिसड्डी क्यों है?
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।
Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India
We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.
Connect With Us
Send your feedback at greport2018@gmail.com
Newsletter
Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.
When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.
Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.




