मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ ब्लॉक के पटेलपुरा गाँव में हर घर के सामने सरकारी नल लगा है। जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाई गई, टैंक बनाए गए, कनेक्शन दिए गए। लेकिन इन नलों में सालों से पानी नहीं आया। हर सुबह मजदूर नन्नी बाई काम पर निकलने से पहले दो से तीन घंटे पड़ोसी के ट्यूबवेल पर लाइन में खड़ी रहती हैं। वे कहती हैं, “अगर देर हो जाए तो किसान हमें काम पर नहीं रखते।” यह कोई अपवाद नहीं, यह उस योजना की ज़मीनी सच्चाई है जिस पर सरकार ने 8.69 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का संकल्प लिया है।
15 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री ने जल जीवन मिशन की शुरुआत की, हर ग्रामीण घर को 2024 तक 55 लीटर प्रतिदिन स्वच्छ पेयजल देने का वादा। मिशन की शुरुआत में देश में सिर्फ 3.23 करोड़ यानी 16.72% ग्रामीण घरों में नल कनेक्शन था। जनवरी 2026 तक यह आँकड़ा 15.79 करोड़ यानी 81.57% तक पहुँच गया। राजगढ़ में तो 87% से ज़्यादा घरों में कनेक्शन दिखाया जा रहा है।
लेकिन सरकारी डैशबोर्ड सिर्फ कनेक्शन की संख्या बताता है, यह नहीं बताता कि उन नलों में पानी आता भी है या नहीं।
पटेलपुरा के पूर्व सरपंच मदन सिंह पँवार कहते हैं, “गाँव में 2018-19 का बड़ा टैंक है और 2010-11 की पुरानी संरचना भी, लेकिन किसी भी योजना से पानी नहीं आया।” स्थानीय निवासी लक्ष्मी नारायण पटेल बताते हैं कि नया टैंक लीक करता है, इसलिए कभी पूरा नहीं भरा गया।
पटेलपुरा से करीब 65 से 70 किलोमीटर दूर सोनकच गाँव में हालात और भी बुरे हैं, वहाँ गर्मी आने से पहले ही योजना फेल हो गई। महिलाएँ अब प्राइवेट टैंकरों और मोटरसाइकिल से दूर-दूर से पानी ढो रही हैं। अधिकारी कहते हैं कि भूजल पर्याप्त नहीं है, इसलिए विभाग पानी नहीं दे सकता।
स्रोत सूखे, ज़िम्मेदारी किसकी?
असली संकट पाइप बिछाने का नहीं, पानी के स्रोतों का न टिकना है। PHE विभाग के असिस्टेंट इंजीनियर देवेंद्र सिंह खुद मानते हैं, “भूजल यहाँ है तो कल नहीं भी हो सकता।” लेकिन यह लापरवाही नहीं तो क्या है?
जल जीवन मिशन की गाइडलाइन के पैराग्राफ 9.1 में साफ लिखा है कि हर योजना को 30 साल की स्थायित्व गारंटी के साथ बनाया जाए। इंजीनियरों को बोरवेल के साथ-साथ चेक डैम और रेनवाटर हार्वेस्टिंग जैसी रिचार्ज संरचनाएँ भी बनानी थीं। लेकिन CAG रिपोर्ट 2023 बताती है कि 147 में से 137 ठेकों से रिचार्ज की अनिवार्य शर्तें हटा दी गईं। नतीजा सामने है, अकेले राजगढ़ में 662 बस्तियाँ यानी 31.84% फिर से जल संकट में धँस गईं। पूरे प्रदेश में 2,407 बस्तियाँ वापस पानी की किल्लत में आ गईं।
Central Ground Water Board की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट ने राजगढ़ को “सेमी-क्रिटिकल” श्रेणी में डाल दिया है। नरसिंहगढ़ ब्लॉक “क्रिटिकल” है और सारंगपुर “ओवर-एक्सप्लॉइटेड।” भूजल वैज्ञानिक डॉ. रामगोपाल नागर कहते हैं, “राजगढ़ में 40 से 50 फीट की गहराई पर कठोर चट्टान है जो पानी को नीचे नहीं जाने देती। हमने 300 फीट की गहराई से पुराना संचित पानी निकाल लिया, लेकिन रिचार्ज नहीं किया। जिस तकनीक से पानी खोजा, उसी से रिचार्ज भी करना होगा।”
नवंबर 2025 में राज्य सरकार ने 280 एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट किया और 141 अधिकारियों को नोटिस जारी किए। लेकिन सवाल यह है कि जब नुकसान हो चुका है, तो कार्रवाई का क्या फायदा?
एक गाँव जिसने रास्ता दिखाया
इस पूरी निराशा के बीच राजगढ़ के ही मूंडला बारोल गाँव की कहानी उम्मीद जगाती है। जब यहाँ के नल सूखने लगे, तो पंचायत और विभाग ने मिलकर “कन्वर्जेंस मॉडल” अपनाया। MGNREGA के ज़रिए वैज्ञानिक तरीके से चेक डैम और रिचार्ज संरचनाएँ बनाई गईं। आज गर्मियों में भी सुबह 7 बजे नल चलते हैं। सरपंच रामदयाल और ग्रामीण रुक्मिणी शर्मा कहती हैं, “पानी को वैज्ञानिक तरीके से संजोया, तब जाकर नल चले।”
यह गाँव साबित करता है कि समस्या तकनीक की नहीं, इच्छाशक्ति और सही नियोजन की है।
तकनीक मौजूद है, दिशा-निर्देश मौजूद हैं, विज्ञान मौजूद है, फिर नन्नी बाई जैसे करोड़ों लोग अभी भी दूसरों के ट्यूबवेल पर लाइन में क्यों खड़े हैं? नल लगाना काफी नहीं है। जब तक पानी का स्रोत टिकाऊ नहीं होगा, जब तक रिचार्ज की शर्तें कागज़ से ज़मीन पर नहीं उतरेंगी, जल जीवन मिशन महज़ एक खर्चीला वादा बनकर रह जाएगा।
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