मध्य प्रदेश के कोठरी और खरगोन के कुछ किसानों के खेतों में तीन यंत्र लगाए गए थे। पहला एक एआई कैमरा है, जो फसल में लगने वाले कीट और बीमारियों पर नज़र रखता है। दूसरा ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन है, जो बारिश और मौसम का पूर्वानुमान देता है। तीसरा मिट्टी की नमी मापने वाला सेंसर है, जो बताता है कि सिंचाई कब और कितनी करनी है। इन तीनों से मिले आंकड़ों की जांच एआई करता है और उसी आधार पर किसानों को सलाह भेजी जाती है।
ये यंत्र इंटरनेशनल सेंटर फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च इन ड्राई एरियाज, यानी इकार्डा (ICARDA) ने लगाए थे। यह सटीक कृषि (प्रिसिशन एग्रीकल्चर) प्रोजेक्ट का हिस्सा था, जो मध्य प्रदेश सरकार के किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के सहयोग से खरगोन और सीहोर जिले में वर्ष 2022 और 2023 में चलाया गया। इसका उद्देश्य छोटे और मध्यम किसानों की खेती की लागत कम करना और सही समय पर सही सलाह देना था।
आइस्काउट (iScout) कैमरे में पीले चिपचिपे पैड लगे होते हैं। कीट इन पैड पर चिपकते हैं तो कैमरा उनकी फोटो लेता है। कैमरे में कीटों और बीमारियों की डिजिटल लाइब्रेरी पहले से डाली गई है। एआई फोटो को इस लाइब्रेरी से मिलाकर पहचान लेता है कि खेत में कौन सा कीट या बीमारी फैल रही है। वेदर स्टेशन करीब 5 किलोमीटर के दायरे में बारिश, तापमान और हवा का पूर्वानुमान देता है। सॉइल मॉइश्चर सेंसर मिट्टी की नमी जांचता है।
तीनों यंत्रों का डेटा एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जाता है। वहां से “आई कृषि” (iKrishi) ऐप और व्हाट्सऐप ग्रुप के ज़रिए किसानों के मोबाइल पर अलर्ट और सलाह पहुंचती है। खेत में कीट या बीमारी मिलने पर किसान को संदेश मिलता है कि कौन सी दवा, कीटनाशक या फफूंदनाशक, कितनी मात्रा में छिड़कनी है। इससे पूरे खेत में बिना ज़रूरत दवा छिड़कने की नौबत नहीं आती और किसान का खर्च घटता है।
मध्य प्रदेश में हर साल सोयाबीन की फसल को येलो मोज़ैक जैसे वायरस से नुकसान होता है। कई किसानों की लागत भी नहीं निकल पाती। कोठरी गांव के किसान दीपेश के खेत में इकार्डा का आइस्काउट कैमरा लगा था। उन्होंने बताया कि येलो मोज़ैक फैलने पर कैमरे से उन्हें समय रहते अलर्ट मिल गया। दीपेश के अनुसार, “मेरे आसपास के सभी किसानों की सोयाबीन की फसल खराब हो गई थी और उन्हें केवल 30 से 40 किलो प्रति एकड़ ही पैदावार मिली। लेकिन अलर्ट मिलते ही मैंने समय पर छिड़काव कर दिया, जिससे मुझे 1 क्विंटल 80 किलो प्रति एकड़ का उत्पादन मिला।”
सिंचाई में भी दीपेश को फायदा हुआ। पहले वे अंदाज़े से गेहूं की फसल में 5 से 6 बार पानी देते थे। सॉइल मॉइश्चर सेंसर और वेदर स्टेशन की जानकारी मिलने के बाद उन्हें पता चला कि पानी कब देना ज़रूरी है। इससे पानी और डीज़ल, दोनों की बचत हुई।
प्रोजेक्ट चलाने वाली टीम के अनुसार शुरुआत में सब कुछ आसान नहीं था। बुज़ुर्ग और छोटे किसानों को नई तकनीक पर भरोसा दिलाना और उन्हें स्मार्टफोन चलाना सिखाना मुश्किल काम था। फिर भी जिन किसानों ने इसे अपनाया, उन्हें लागत में कमी और उत्पादन में बढ़ोतरी का फायदा मिला।
सबसे बड़ी समस्या प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की है। वर्ष 2022-23 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई यह पहल सरकारी बजट और सहयोग के अभाव में अब ठंडे बस्ते में चली गई है। सरकार की ओर से इसे आगे नहीं बढ़ाया गया। जिन किसानों ने इसका फायदा देखा, वे चाहते हैं कि इसे दोबारा शुरू किया जाए, ताकि वे अपनी लागत घटाकर आय बढ़ा सकें।
जलवायु परिवर्तन के दौर में मध्य प्रदेश के किसान हर साल चरम मौसमी घटनाओं की वजह से फसल का नुकसान झेल रहे हैं। बेमौसम बारिश, बदलता तापमान और कीट-रोगों का प्रकोप खेती को जोखिम भरा बना रहा है। ऐसे में एआई और तकनीक पर आधारित खेती किसानों की मदद कर सकती है, बशर्ते सरकार ऐसी तकनीक को लगातार सहयोग दे।
इन यंत्रों की कीमत ज़्यादा है, इसलिए प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों का सुझाव है कि सरकार और कृषि संस्थान इन्हें सैटेलाइट और मोबाइल तकनीक से जोड़ें, ताकि कम दाम में यह सुविधा हर किसान तक पहुंच सके। फिलहाल कोठरी और खरगोन के किसान इस इंतज़ार में हैं कि प्रोजेक्ट दोबारा शुरू होगा या नहीं।
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