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सौ साल बाद मध्य प्रदेश में जंगली भैंसे क्यों बसाए जा रहे हैं?

Wild Buffalo Reintroduction in Madhya Pradesh
Photo Credit: X/Department of Forest, MP

मध्यप्रदेश के जंगलों में एक सदी की चुप्पी के बाद जंगली भैंसे की वापसी हो रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने आज बालाघाट जिले के सुपखार और टोपला क्षेत्र में तीन मादा और एक नर जंगली भैंसे को उनके नए प्राकृतिक आवास में छोड़कर इस ऐतिहासिक पुनर्वास कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

असम से एमपी कितने भैंसे आएंगेदुनिया में कुल आबादीआखिरी बार देखे गए थे
504,000वर्ष 1979 में

जंगली भैंसा (Bubalus arnee) कभी मध्यप्रदेश के मंडला, बालाघाट, अमरकंटक और सतपुड़ा के जंगलों में बड़ी संख्या में पाया जाता था। भीमबेटका की शैलचित्रों में भी इसकी मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं। लेकिन बीते सौ वर्षों में अंधाधुंध शिकार, जंगलों की कटाई और मानवीय अतिक्रमण ने इसे राज्य से पूरी तरह खत्म कर दिया। 1979 में सुपखार में इसे आखिरी बार देखा गया था।

अब असम के काजीरंगा नेशनल पार्क से कुल 50 जंगली भैंसे कान्हा टाइगर रिज़र्व लाए जाएंगे। पहले चरण में इस मौसम में आठ भैंसों का स्थानांतरण होगा। यह पूरी प्रक्रिया दोनों राज्यों के वरिष्ठ वन अधिकारियों और विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की निगरानी में वैज्ञानिक तरीके से की जा रही है। आगामी दस वर्षों में चरणबद्ध तरीके से भैंसे छोड़े जाएंगे ताकि इस आबादी में पर्याप्त आनुवंशिक विविधता बनी रहे।

सुपखार अभयारण्य इस कार्यक्रम के लिए आदर्श स्थान है — यहाँ विस्तृत घास के मैदान, लहरदार भूमि और साल भर बहने वाले जलस्रोत हैं। जंगली भैंसे केवल एक प्रतीकात्मक वापसी नहीं हैं; इनकी मौजूदगी घास के मैदानों को पुनर्जीवित करती है, पोषक चक्र को संतुलित करती है और अन्य शाकाहारी व बड़े शिकारी जीवों के लिए भी पारिस्थितिकी को मज़बूत बनाती है।

यह कार्यक्रम एक व्यापक अंतरराज्यीय वन्यजीव साझेदारी का हिस्सा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बीच हुए समझौते के तहत असम तीन वर्षों में 50 जंगली भैंसे और कुछ अन्य प्रजातियाँ मध्यप्रदेश को देगा। साथ ही भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क के लिए दो जोड़ी गैंडे भी भेजे जाएंगे। बदले में मध्यप्रदेश असम को तीन बाघ और छह मगरमच्छ देगा।

वर्तमान में दुनिया भर में जंगली भैंसों की संख्या 4,000 से भी कम रह गई है और इनका मुख्य ठिकाना असम के काजीरंगा और मानस पार्क ही हैं। चीता परियोजना के बाद यह कार्यक्रम मध्यप्रदेश को देश में वन्यजीव संरक्षण के एक नए अध्याय की ओर ले जाता है।

(IANS इनपुट के साथ)

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