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भील प्रदेश की मांग तेज़ लेकिन सभी भील एकमत नहीं

मानगढ़ धाम से उठी भील प्रदेश की मांग, पर MP के आदिवासी जिलों की जमीनी हकीकत अलग—रोजगार, सिंचाई और स्वास्थ्य अब भी लोगों की प्राथमिकता।
Bhil Pradesh Demand
अलग राज्य की मांग को लेकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपते भील आदिवासी | फोटो: केशूराम निनामा, रतलाम, जिला पंचायत उपाध्यक्ष

राजस्‍थान के ऐत‍िहासिक मानगढ़ धाम से एक बार फिर भील प्रदेश की मांग गूंज उठी है। आंदोलनकारी राजस्‍थान, गुजरात, महाराष्‍ट्र और मध्य प्रदेश के 49 आदिवासी जिलों को मिलाकर नया राज्‍य बनाने की मांग कर रहे हैं। हाल ही में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने भील प्रदेश का प्रस्‍तावित नक्‍शा जारी किया। 15 जुलाई 2026 में चारों राज्‍यों में रैली निकाल कर राष्‍ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपे गए। 18 जुलाई 2026 को मानगढ़ धाम में महासम्‍मेलन में हजारों आदिवासि‍यों ने अलग राज्‍य की मांग दोहराई।  

इस मांग की पड़ताल मध्‍य प्रदेश के भील बहुल जिलाें (खरगोन, बड़वानी, झाबुआ, अलीराजपुर और रतलाम) में गई। तो तस्‍वीर मंचों और रैल‍ियों में दिखाने वाली एकजुटता से अलग नजर आती हैं। कहीं लोग अलग राज्‍य को विकास का रास्‍ता मानते हैं। तो कहीं उनकी प्राथम‍िकता अब भी रोजगार, सिंचाई और स्‍वास्‍थ्‍य जैसी बुन‍ियादी जरूरतें हैं। 

क्‍या है भील प्रदेश की मांग 

भारत आदिवासी पार्टी (BAP) द्वारा जारी किया गया भील प्रदेश का प्रस्‍तावित नक्‍शा
भारत आदिवासी पार्टी (BAP) द्वारा जारी किया गया भील प्रदेश का प्रस्‍तावित नक्‍शा | फोटो: केशूराम निनामा, रतलाम, जिला पंचायत उपाध्यक्ष

भारत के 29वें राज्‍य के रूप में भील प्रदेश की मांग की जा रही हैं। इसमें चार राज्‍यों (राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश, गुजरात और महाराष्‍ट्र) के आदिवासी बहुल ज‍िलों को शामि‍ल किया गया है। मप्र के 13 आदिवासी बहुल जिलों में मुख्‍य रूप से खरगोन, रतलाम, बड़वानी, झाबुआ, अलीराजपुर को इसका हिस्‍सा बताया जा रहा हैं। समर्थक इनको मिलाकर एक अलग भौगोल‍िक व राजनीति इकाई बनाने की मांग कर रहे हैं।

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इसका मुख्‍य आधार सांस्‍कृतिक और भषाई एकरूपता है। आंदोलनकारियों का मानना हैं कि भील समुदाय की भाषा (बोली) और सांस्‍कृतिक प्रथाएं इन चारों राज्‍यों में एक जैसी हैं। समर्थकों का तर्क है कि अलग राज्‍य बनने से आदिवासी क्षेत्रों को प्राथम‍िकता मिलेगी। आंदोलन से जुड़े नेता दावा करते हैं कि यह मांग स्‍वतंत्रता से पहले की है। बाद में अलग-अलग समय पर राजनीतिक रूप से उठती रही।

हालांकि सरकारी अभ‍िलेख बताते हैं कि 1953 में गठित राज्‍य पुनर्गठन आयोग और 1955 की उसकी र‍िपोर्ट में अलग भील प्रदेश के गठन की कोई सिफारिश या उल्‍लेख नहीं मिलता। 

हाल के वर्षों में भारत आदिवासी पार्टी, भील मुक्ति मोर्चा और अन्‍य आदिवासी संगठनों ने इस मांग को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। 

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खरगोन और बड़वानी में पहले रोजगार-पानी, फिर राज्‍य की बात 

मध्‍य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र ( खरगोन जिले भगवानपुरा व‍िकासखंड और बडवानी के राजपुर-सेंधवा) के सुदुर गांवों के ग्रामीणों की चिंताएं अलग है। यहां के अधिकांश ग्रामीणों ने कहा कि उनकी पहली चि‍ंता अलग राज्‍य नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, खेती, सिंचाई और स्‍वास्‍थ्‍य है। 

खरगोन जिले के कोठड़ा गांव के रामलाल भील कहते हैं, ” सबसे बड़ी परेशानी खेती और रोजगार है। हर साल युवाओं को गुजरात और महाराष्‍ट्र मजदूरी करने जाना पड़ता है।” 

उनके साथ बैठे केमराज भील कहते हैं,” सरकार गांव में रोजगार, खेतों में पानी और अस्‍पताल ठीक कर दे। वही हमारे के लिए व‍िकास सबसे बड़ा विकास होगा।” 

रामलाल और केमराज की बात पर अधिकांश ग्रामीणों से सहमति जताई हैं। उनका कहना है कि गांव में भील प्रदेश की चर्चा होती है। मगर मूलभूत सुविधा पहले हैं। 

बड़वानी जिले के राजपुर और सेंधवा क्षेत्र के ग्रामीणों ने लगभग यही राय रखी। 

सेंधवा के बजुर्ग दसरिया भील भी यही कहते हैं, ”हमारी पहचान पर किसी को कोई आपत्ति‍ नहीं है। योजनाएं गांव तक नहीं पहुंचतीं। पहले यह बदले।” 

हालांकि इसी क्षेत्र में अलग राय भी मिलती हैं। भगवनापुरा के जय टटे्या भील आदिवासी युवा संगठन से जुड़े मुकेश वासकले मानते हैं कि अलग राज्‍य से राजनीतिक प्रतिनिध‍ित्‍व मजबूत होगा। 

वे कहते हैं, ”आज हमारी आबादी चार राज्‍यों में बंटी हुई हैं। विधानसभा-संसद में हमारी आवाज बिखर जाती है। भील प्रदेश बनेगा तो सरकार की प्रथामि‍कता हमारे क्षेत्र होंगे।” 

रतलाम, अलीराजपुर और झाबुआ में समर्थन ज्‍यादा 

भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा द्वार अलग राज्य की मांग को लेकर निकाली गई रैली | फोटो: केशूराम निनामा, रतलाम, जिला पंचायत उपाध्यक्ष
भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा द्वार अलग राज्य की मांग को लेकर निकाली गई रैली | फोटो: केशूराम निनामा, रतलाम, जिला पंचायत उपाध्यक्ष

हालांकि पश्चिमी मध्‍य प्रदेश की यह राय पूरे भील समाज की नहीं है। झाबुआ व अलीराजपुर में तस्‍वीर अलग दिखाई देती हैं। यहां आंदोलन से जुड़े युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच भील प्रदेश की मांग को लेकर उत्‍साह है। वहीं रतलाम में 15 जुलाई को कलेक्‍ट्रेट में राष्‍ट्रपति के नाम 42 सूत्रीय मांग का ज्ञापन सौंपा गया। इसमें भील प्रदेश की मांग प्रमुख थी। 

भारत आदिवासी पार्टी के प्रदेश अध्‍यक्ष और रतलाम जिला पंचायत उपाध्‍यक्ष केशूराम (केशू) नि‍नामा कहते हैं, ”यह सिर्फ नया राज्‍य बनाने का आंदोलन नहीं है। यह आदिवासी समाज को राजनीतिक भागीदारी दिलाने की लड़ाई हैं।” 

रतलाम के मेरूगाटा गांव के किसान रमेश खाड़ी, जिन्‍होंने आठ बीघा में सोयाबीन और मूंगफली बोई हैं, कहते हैं, ” हम चाहते हैं। हमारा विकास हमारी जरूरतों के हिसाब से हो। अगर भील प्रदेश बनने से यह संभव है तो इसका समर्थन होना चाहिए।” 

सैलाना के विधायक कमेश्‍वर डोडियार का भी मानना है कि अलग प्रशासन‍िक व्‍यवस्‍था से आदिवासी क्षेत्रों पर ज्‍यादा ध्‍यान दिया जा सकेगा।

झाबुआ और अलीराजपुर में भी कई लोग इस मांग को सांस्‍कृत‍िक पहचान से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि भीली भाषा, संस्‍कृ‍त‍ि और परंपराओं को पर्याप्‍त संरक्षण नहीं मिला। यही इस आंदोलन का सबसे बड़ा आधार है। भील समुदाय भारत की सबसे बड़ी अनुसूचित जनजातियों में शामि‍ल हैं। इसकी आबादी मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, गुजरात और महाराष्‍ट्र में फैली हुई है। इसी भौगोलिक और सांस्‍कृतिक निरंतरता को स‍मर्थक अलग राज्‍य की प्रमुख दलील बताते हैं।

मध्‍य प्रदेश में यह मांग मुख्‍य रूप से उन्‍हीं जिलों में उठ रही है। जहां भील, भि‍लाला समुदाय की आबादी अधिक है। 2011 की जनगणना के अनुसार अलीरापुर में अनुसूचित जनजाति आबादी लगभग 89 प्रतिशत, झाबुआ में 86 प्रतिशत, बड़वानी में 69 प्रतिशत, खरगोन में 44 प्रतिशत और रतलाम में 26 प्रतिशत है। समर्थन इन्‍हीं जनसांख्‍य‍िकीय तथ्‍यों को अलग प्रशासनिक इकाई के पक्ष में रखते हैं। 

मगर इन्‍हीं भील समुदाय में दूसरी राय भी मिलती हैं। बड़वानी के युवा नेता सुभाष पावर डाबर कहते हैं, ”अगर नया राज्‍य बन भी जाए। तो क्‍या गारंटी है कि भ्रष्‍टाचार खत्‍म हो जाएगा। पलायन रूक जाएगा। विकास के लिए राजनीति‍क इच्‍छाशक्ति ज्‍यादा जरूरी हैं।” 

यही सवाल इस मांग की सबसे बड़ी चुनौती है। दरअसल, पश्चिमी मप्र के आद‍िवासी बहुल जिले आज भी कई सामाज‍िक-आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। पलायन, कुपोषण, सिंचाई की कमी, सीम‍ित औद्योगिक निवेश और कमजोर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं यहां की वास्‍तवि‍क समस्‍याएं हैं। 

क्‍या कहता है नियम 

भारतीय संविधान का अनुच्‍छेद 3 संसद को नए राज्‍य बनाने या राज्‍यों की सीमाओं में बदलाव का अधिकार देता है। इसके लिए राष्‍ट्रपति की अनुशंसा पर संसद में विधेयक लाया जाता है। संबंधित राज्‍य विधानसभा से राय मांगी जाती है। उनकी सहमत‍ि संवैधानिक रूप से बाध्‍यकारी नहीं होती। 

भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा के रतलाम, प्रदेश संयोजक दिनेश माल कहते हैं, ”हमारी मांग पूरी तरह से संवैधानिक है। हम चाहते हैं कि आद‍िवासी समाज को अपने जल, जंगल और जमीन पर निर्णय लेने में अधिक भागीदारी मिले।”

हालांकि एडवोकेट राहुल श्रीवास्‍तव का कहना है कि केवल अनुच्‍छेद 3 का हवाला देने से नया राज्‍य नहीं बन जाता है। इसके लिए राजनीत‍िक सहमति, संसद की मंजूरी, प्रशासन‍िक तैयारी और आर्थ‍िक व्‍यवहार्यता जैसे कई चरण पूरे करने होते हैं।  

अब तक केंद्र या किसी भी राज्‍य सरकार ने भील प्रदेश के गठन की व्‍यवहार्यता पर कोई आधिकार‍िक आयोग, सर्वे या नहीं किया। फिलहाल यह मांग राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ रही है। 

पृथक भील प्रदेश की मांग को प्रदेश का भील समुदाय एकमत नहीं है। खरगोन, बड़वानी के अनेक ग्रामीणों की प्राथम‍िकता रोजगार, सिंचाई, शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य है। वहीं रतलाम, झाबुआ और अलीराजपुर में आंदोलन से लोग तेजी से जुड़ रहे है। यह मानते हैं कि इन समस्‍याओं का स्‍थायी समाधान अलग भील प्रदेश बनने से संभव होगा। यानी भील प्रदेश की बहस नए राज्‍य की नहीं है। यह आदिवासी पहचान, राजनीतिक प्रतिनिध‍ित्‍व और विकास के मॉडल की बहस भी है। यही कारण है कि यह मांग समय-समय पर फिर उभरती है। मानगढ़ धाम से लेकर मध्‍य प्रदेश तक के भील आंचल तक इसकी गूंज सुनाई देती है।

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  • Based in Bhopal, this independent rural journalist traverses India, immersing himself in tribal and rural communities. His reporting spans the intersections of health, climate, agriculture, and gender in rural India, offering authentic perspectives on pressing issues affecting these often-overlooked regions.

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