देवखेड़ी के ईश्वर सिंह प्रगतिशील किसानों में से एक हैं। 2016 में उन्हें अपने गांव के पास स्थित कृषि सेवा केंद्र- कृषि से संबंधित कैमिकल उत्पाद और बीज बेचने वाली दुकान- से सोयाबीन की नई वैराइटी ‘जेएस 95-60’ के बारे में पता चला।
उन्होंने लगभग 4500 रूपए प्रति बीघा की लागत के साथ अपने 60 में से 20 बीघा खेत में इस वैराइटी की बोवाई की। उन्हें उम्मीद थी कि इस वैराइटी से उनके उत्पादन में इजाफा होगा। मगर फसल में पीले मोजैक के आक्रमण के बाद लागत निकालना भी मुश्किल हो गया।
उन्होंने 2017 और 2018 में भी इस वेरायटी की बोवनी की, मगर हर बार उन्हें घाटे का सामना करना पड़ा।
जवाहर सोयाबीन (JS) 95-60 राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय (RVSKVV), ग्वालियर द्वारा विकसित एक कम अवधि की सोयाबीन किस्म है। कृषि विज्ञान केंद्र, उज्जैन के अनुसार सोयाबीन के बाद आलू/प्याज या फिर लहसुन लगाने वाले (सोयाबीन-आलू-प्याज/लहसुन प्रणाली) किसानों के लिए यह वैराइटी क्षेत्र की सबसे अच्छी है।
इस वैराइटी के लिए यह दावा किया गया कि यह जेएस-335 वैराईटी की तुलना में बेहतर उत्पादकता, कम पानी में भी उत्पादन और बड़े दाने वाली फसल देगी।
उज्जैन के ज़्यादातर किसान इस वेरायटी की ज्यादा उत्पादकता की पुष्टि करते हैं। वैज्ञानिक शोध भी इसकी कम अवधि में उत्पादन को साबित करते हैं। मगर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि अतिवृष्टि और पीला मोजैक से यह वैराइटी फसल की रक्षा नहीं करती।

कैसे डेवलप हुई यह वैराइटी?
भारत में इस वैराइटी को 20 जुलाई 2007 को पूरे देश के लिए नोटिफाई किया गया। तत्कालीन समय में RVSKVV का हिस्सा रहे डॉ मनोज कुमार श्रीवास्तव वर्तमान में जवाहर नेहरु कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के डिपार्टमेंट ऑफ़ प्लांट ब्रीडिंग एंड जेनेटिक्स में बतौर प्रोफ़ेसर कार्यरत हैं। वो इस वैराइटी को विकसित करने वाली टीम के नेतृत्वकर्ता रहे हैं।
उन्होंने बताया कि इस वैराइटी को जेएस-7322 वैराइटी से सेकेंडरी सिलेक्शन विधि के ज़रिए विकसित किया गया था। सेकेंडरी सिलेक्शन विधि में किसी एक वैराइटी के पौधों को प्रयोग के तौर पर खेत में बोया जाता है। इनके विकास के दौरान अलग ट्रेट्स प्रदर्शित करने वाले पौधों के बीजों को अलग किया जाता है। 4-5 साल तक इस प्रक्रिया को दोहराया जाता है। प्रत्येक साल एक ही तरह के मगर मूल पौधे से अलग ट्रेट प्रदर्शित करने वाले पौधे को एक अलग वैराइटी की मान्यता दी जाती है।
नेशनल सोयाबीन रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-NSRI) के अनुसार जेएस 95-60 वैराइटी का इस्तेमाल देश में बीज की ज़रूरत को पूरा करने के लिए भी किया जाता है। ICAR-NSRI के अनुसार जेएस 95-60 देशभर की ऐसी 30 से भी अधिक सीड चेन का हिस्सा है जिसका इस्तेमाल बीज उत्पादन के लिए होता है।
बेहतर उत्पादकता का दावा
केवीके उज्जैन के अनुसार पहले, फली भरने के स्टेज पर नमी की कमी और टेक्नोलॉजी न अपनाने की वजह से खराब उत्पादकता की बहुत समस्याएं थीं। अब यह पारंपरिक सोया किस्म JS-335 से बेहतर उत्पादकता दे रही है। साल 2007-2010 के दौरान हुए फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन (FLD) में इसकी सर्वाधिक पैदावार 31.25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (लगभग 5 क्विंटल प्रति बीघा) तक हुई।
हालांकि ब्यावरा गांव के रईस पटेल ने कहा कि ऐसा सिर्फ तभी हो सकता है जब किसान चारे को लगातार निकालते रहे। उनके खेत में 2 साल पहले इस वैराइटी से 3।5 क्विंटल प्रति बीघा का उत्पादन हुआ था। मगर यह उनके द्वारा अभी इस्तेमाल की जा रही वैराइटी- 1135 (5 क्विंटल प्रति बीघा) से कम है।
रईस अब 95-60 को पूरी तरह छोड़ चुके हैं। इसकी जगह वो जेएस 2303, जेएस 2433 और ब्लैक बोल्ड वैरायटी लगाते हैं। उनके अनुसार ब्लैक बोल्ड उन्हें सबसे अच्छी उत्पादकता दे रही है इसलिए उन्हें 95-60 कि ज़रूरत नहीं महसूस होती।

कम अवधि की फसल
2018 में नागपुर के कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर में हुए एक अध्ययन के अनुसार, जेएस 95-60 सोयाबीन को पकने में 102 से 107 दिन लगे जबकि एएमएस-1001 को 114-127 और जेएस 335 को 113-121 दिन लगे थे।
देवखेड़ी में 60 बीघा में सोयाबीन उगाने वाले दारा सिंह ने बताया कि लगभग 2 हफ़्तों का यह अंतर आलू की फसल बोने में काम आता है। “सितंबर के अंतिम हफ्ते तक आलू बो देते हैं तो एक से दो हफ्ते का बारिश का पानी भी आलू को मिल जाता है।” दारा ने बताया।
कृषि विज्ञान केंद्र, उज्जैन के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ एके दीक्षित मानते हैं कि इसी कारण बीते एक दशक में उज्जैन में इसका काफी विस्तार हुआ है।
वह कहते हैं कि यह उन खेतों के लिए उपयुक्त है जो थोड़ा उंचाई पर स्थित हैं और जहां पानी की सुविधा कम है।
मगर 2 साल पहले दारा सिंह की फसल पर भी पीले मोजौक का आक्रमण हुआ, जिससे उन्हें भारी घाटा हुआ। अब वो इसकी जगह 90 से 95 दिनों के बीच ही पकने वाली जेएस 2433 की बुवाई करते हैं। उन्होंने कहा कि 95-60 पीला मोज़ेक से नहीं बचाता, इसलिए उसे बोना रिस्क का काम है।

पीला मोजैक और अन्य रोग हैं समस्या
ईश्वर खरीफ के सीजन में केवल सोयाबीन की फसल का उत्पादन करते हैं। इसके बाद वो आलू, प्याज़ और गेहूं की फसल लेते हैं। 2016 के खरीफ सीजन का अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि उस साल कम बारिश के चलते वो ऐसी वैराइटी खोज रहे थे जो कम पानी में बेहतर उत्पादन दे सके। इसीलिए उन्होंने जेएस 95-60 वैराइटी लगाने का निर्णय लिया।
ईश्वर ने बताया कि जब उनकी फसल में पीला मोजैक के लक्षण आना शुरू हुए तो उन्होने इसके नियंत्रण के लिए कई तरह की दवाइयों का भी छिड़काव किया। इसके लिए उन्होंने प्रति बीघा कम से कम 3 हज़ार रुपये और खर्च किए। फिर भी वह रोग नियंत्रित नहीं कर सके और उनके लिए बीज की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया।
सोयाबीन में पीला मोजैक बीमारी दो जेमिनीवायरस– मूंगबीन येलो मोज़ेक इंडिया वायरस (MYMIV) और मूंगबीन येलो मोज़ेक वायरस (MYMV) की वजह से होती है। इसमें पौधे छोटे और पत्तियां छोटी हो जाती हैं। जिससे फूल कम आते हैं और फली कम बनती है।
डॉ दीक्षित ने बताया कि 80% आद्रता और अधिक तापमान व्हाइटफ्लाई (Bemisia tabaci) के लिए अनुकूल होता है जिसके ज़रिए पीला मोजेक बीमारी सोयाबीन में फैलती है। गौरतलब है कि पिछले साल इस बिमारी से मध्य प्रदेश में कम से कम 4,94,605 सोयाबीन किसान येलो मोज़ेक बीमारी और कीड़ों के हमले से प्रभावित हुए थे। इन्हें प्रदेश सरकार ने 322 करोड़ रु का मुआवजा दिया था।
श्रीवास्तव भी कहते हैं कि चूंकि यह वेरायटी 10 साल से भी अधिक पुरानी हो चुकी है इसलिए इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि प्रदेश में कुछ जगहों पर कोलेट्रोट्रीकम ट्रंकैटम (Colletotrichum truncatum) से होने वाली एन्थ्रकनोज़ (Anthracnose) बिमारी और जबलपुर में अफलन की समस्या भी देखी गई है।
वो कहते हैं कि अब किसानों को जेएस 23-03 व जेएस 23-09 और नेशनल रिसर्च सेंटर (NRC) की सबसे नई वेराइटी के बीज ही बोने चाहिए। जबकि आईसीएआर-एनएसआरआई के अनुसार पीएस 1670, एनआरसीएसएल 3, एसएल 958 और एसएल 955 वैराइटी येलो मोजेक वायरस रोधी वेराइटी हैं। जिन इलाकों में इसका प्रकोप पहले देखा गया हो, वहां इस वैरायटी को बोना सही होगा।
उज्जैन के किसान पीला मोजैक को उनकी फसल के लिए सबसे बड़ी समस्या मानते हैं। इसलिए जिन किसानों से हमने बात की वो अब इस वैराइटी के बजाय उन्हीं किस्मों को उगा रहे हैं जो पीला मोजौक से फसलों की रक्षा कर सके।
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