केंद्र की 23,500 हज़ार करोड़ की गोवर्धन योजना, लिंक रोड परियोजना के लिए कटेंगें मैंग्रोव, उप्र में बारिश से संबंधित घटना में 9 की मौत, मप्र में बिना बीमारी के करोड़ों रुपये की निकासी। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
केंद्रीय कैबिनेट ने 23,500 करोड़ रुपये से अधिक के परिव्यय के साथ ‘गोवर्धन’ योजना को मंजूरी दी है। इस योजना का लक्ष्य 2026-2036 के बीच घरेलू कंप्रेस्ड बायोगैस उत्पादन को लगभग 10 गुना बढ़ाना है। वित्त वर्ष 2027 में इस बायोगैस सम्मिश्रण का लक्ष्य 3% रखा गया है।
बीएमसी को वर्सोवा से भयंदर लिंक रोड के लिए पर्यावरण मंत्रालय से अंतिम मंजूरी मिल गई है। इस परियोजना के लिए 100 हेक्टेयर से अधिक मैंग्रोव भूमि का डायवर्जन किया जाएगा। परियोजना को दिसंबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसकी भरपाई के लिए 255 हेक्टेयर भूमि पर 1.37 लाख मैंग्रोव लगाए जाएंगे।
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़, बाराबंकी और सहारनपुर में भारी बारिश के कारण मकान गिरने से कुल नौ लोगों की मौत हो गई है। प्रतापगढ़ में एक ही परिवार के छह सदस्यों की जान चली गई।
हिमाचल प्रदेश में जून से अब तक बारिश से संबंधित घटनाओं में 64 लोग मारे गए हैं और राज्य को लगभग 800 करोड़ रु का नुकसान हुआ है। वहीं केरल के तीन जिलों के लिए रेड अलर्ट जारी किया गया है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केन-बेतवा परियोजना के कारण आदिवासियों के विस्थापन और पुनर्वास का मुद्दा उठाया है। 44,605 करोड़ रुपये की यह परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र को प्रभावित करेगी और हजारों परिवारों को विस्थापित करेगी।
मध्य प्रदेश में बिना बीमारी के करोड़ों रुपये की निकासी का संदिग्ध मामला सामने आया है। 2023 से अब तक इस योजना के तहत 741.14 करोड़ रुपये की मदद दी गई है। जांच में 18 ऐसे मोबाइल नंबर मिले हैं जिनका उपयोग कई बार अलग-अलग मरीजों के आवेदन के लिए किया गया।
विस्तृत चर्चा
सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन: सरकारी दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
हिंदी डेली दैनिक भास्कर में चौंकाने वाली रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। यह रिपोर्ट भारत सरकार के 2047 तक देश को सिकल सेल एनीमिया (एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी) से मुक्त करने के लक्ष्य और जमीनी स्तर पर उसकी प्रगति के बीच के भारी अंतर को उजागर करती है।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, मध्य प्रदेश में मार्च 2026 तक लगभग 1.46 करोड़ लोगों को जेनेटिक स्टेटस कार्ड बांटे जाने का दावा किया गया है। यह केंद्र सरकार के राष्ट्रीय लक्ष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भास्कर की रिपोर्ट और जमीनी पड़ताल के निष्कर्ष
दैनिक भास्कर ने मध्य प्रदेश के 9 आदिवासी बहुल जिलों में 109 लोगों का सीधा इंटरव्यू और फिजिकल वेरिफिकेशन किया, जिसके परिणाम चिंताजनक हैं:
कार्डों का अभाव: पड़ताल में शामिल 74% लोगों के पास कोई जेनेटिक कार्ड नहीं मिला, जबकि सरकारी कागजों में उन्हें कार्ड वितरित दिखाया जा चुका है।
शून्य उपलब्धि का उदाहरण: जिन 70 लोगों के विशेष तौर पर इंटरव्यू किए गए, उनमें से एक भी व्यक्ति को कार्ड प्राप्त नहीं हुआ था।
कागजी आंकड़ों में विसंगतियां
रिपोर्ट के मुताबिक, झाबुआ और अलीराजपुर जैसे जिलों में कार्ड वितरण के आंकड़े वहां की कुल आबादी से भी अधिक दर्ज किए गए हैं:
अलीराजपुर का उदाहरण: 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी लगभग 5.86 लाख थी, लेकिन कागजों में 6.35 लाख से ज्यादा कार्ड बांटने का दावा किया गया है। यह संख्या वास्तविक आबादी से करीब 48,000 अधिक है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का पक्ष
जब जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय आदिवासियों से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि:
गांवों में बीमारी की स्क्रीनिंग (जांच) तक नहीं हुई है।
जब जांच ही नहीं हुई, तो कार्ड मिलने की बात तो बहुत दूर है।
ऐसे में बिना वास्तविक जांच के अगर केवल कागजों में ही बीमारी को खत्म दिखाया जाता रहेगा, तो इस जानलेवा बीमारी को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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