‘पर्यावरण आज’ में नेपाल में विनाशकारी बाढ़ से 162 की मौत, 403 लापता; भारत ने राहत सामग्री भेजी, गंडक बैराज से बिहार में हाई अलर्ट। एक अध्ययन में पश्चिमी अमेरिका के जल संकट के लिए 122 फॉसिल फ्यूल कंपनियों को ज़िम्मेदार बताया गया। कूनो नेशनल पार्क में मादा चीता निर्वा एक हफ्ते से लापता, तलाश जारी। मध्य प्रदेश में मूंग जल्दी सुखाने हेतु अत्यधिक पेस्टिसाइड इस्तेमाल से मिट्टी दूषित, हर पाँचवें सैंपल में पुष्टि।
आज की प्रमुख हेडलाईन्स
नेपाल के रसुवा ज़िले में तिब्बत सीमा के पास विनाशकारी बाढ़ के बाद, बचाव दल लापता सैकड़ों लोगों की तलाश कर रहे हैं। नेपाल में कम से कम 162 लोगों की मौत हुई है, बाढ़ ने कई बस्तियों को अपनी चपेट में ले लिया, सड़कों और पुलों को नष्ट कर दिया, पनबिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुँचाया और नेपाल को तिब्बत से जोड़ने वाले एक अहम रास्ते को बाधित कर दिया।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका संभावित कारण ग्लेशियर से जुड़े बर्फ़ और चट्टानों के हिमस्खलन (avalanche) हो सकता है, जो शायद भूकंपीय गतिविधियों के कारण हुआ हो। नेपाल में कम से कम 403 लोगों के लापता होने की खबर है, जिनमें 341 विदेशी नागरिक शामिल हैं।
भारत ने नेपाल में आई भयानक बाढ़ के बाद राहत कार्यों में मदद के लिए 10 टन मानवीय सहायता भेजी है। वहीं नेपाल से बाढ़ का पानी गंडक नदी में आने के बाद बिहार में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया। पानी के बढ़ते दबाव को देखते हुए अधिकारियों को बैराज के सभी 36 गेट खोलने पड़े। रात 11 बजे तक बैराज से लगभग 1.50 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया, जो दिन भर में वहाँ दर्ज किया गया सबसे ज़्यादा डिस्चार्ज था। अधिकारियों का कहना है कि अब पानी का बहाव कम होने की उम्मीद है।
‘कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरनमेंट’ में छपी एक अहम स्टडी में पश्चिमी अमेरिका के आधे जल संकट का संबंध 122 फॉसिल फ्यूल और सीमेंट कंपनियों के उत्सर्जन से जोड़ा गया है।
1950 के बाद से, इन बड़ी कार्बन उत्सर्जक कंपनियों ने जलवायु से जुड़े 64% तक प्रभावों को बढ़ाया है।
कूनो नेशनल पार्क के खुले जंगल से निकली मादा चीता निर्वा एक बार फिर लापता हो गई है। बीते 1 सप्ताह से उसकी लोकेशन नहीं मिल पा रही है। वन विभाग की कई टीमें लगातार मादा चीता निर्वा की तलाश कर रही हैं और एक सर्च ऑपरेशन भी शुरू कर दिया है।
मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग को जल्दी सुखाने के लिए पेस्टिसाइड के ज़्यादा इस्तेमाल का असर अब मिट्टी में भी सामने आया है। मूंग का सबसे ज़्यादा उत्पादन करने वाले 6 जिलों से जून-जुलाई में सॉयल टेस्टिंग के लिए आए 800 सैंपल की जांच में करीब 180 में सिंथेटिक पेस्टिसाइड मिला है। यानी लगभग हर पाँचवें सैंपल में इसकी मौजूदगी मिली है।
ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल करीब 60 दिन में तैयार होती है। मई-जून में फसल हरी रहने पर उसे जल्दी सुखाने के लिए पैराक्वाट डाइक्लोराइड का छिड़काव किया जाता है।
आज की चर्चा
नेपाल बाढ़ में अब तक क्या हुआ
नेपाल से जो खबरें आ रही हैं ना, वो वाकई दिल दहला देने वाली हैं। वहां अचानक आई इस बाढ़ यानी ‘फ्लैश फ्लड’ ने जो तबाही मचाई है, उसके आंकड़े सुनकर आप भी सन्न रह जाएंगे। अगर मैं आपको सीधे [नेपाल पुलिस और प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला दूं, तो बुधवार, 26 अगस्त 2026 की सुबह आई इस जलप्रलय में अब तक कम से कम 157 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जिनके शव मलबे से बरामद किए जा चुके हैं। वहीं, सीमा के उस पार चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 3 लोगों की जान गई है, यानी आधिकारिक तौर पर कुल मिलाकर यह आंकड़ा 160 के पार पहुंच चुका है। लेकिन दुख की बात यह है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है, क्योंकि अभी भी 400 से लेकर 750 से ज्यादा लोग लापता या आउट ऑफ कॉन्टैक्ट बताए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात जानते हैं क्या है? इन लापता लोगों में हमारे देश के करीब 133 से ज्यादा भारतीय तीर्थयात्री और पर्यटक शामिल हैं, जो बेचारे इस सुहावने मौसम में कैलाश मानसरोवर की यात्रा या ट्रैकिंग के लिए वहां गए हुए थे। इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के भी दर्जनों विदेशी नागरिक लापता हैं।
पल्लव आप सोच रहे होंगे कि भाई आखिर पहाड़ों पर अचानक ऐसा क्या हुआ जो इतना बड़ा सैलाब आ गया? क्या कोई बादल फटा था? तो जवाब है—नहीं। वैज्ञानिकों और सैटेलाइट इमेज से जो प्रामाणिक जानकारी मिली है, उसके मुताबिक तिब्बत वाले इलाके में पहले एक हल्का भूकंप आया। उस भूकंप की वजह से पहाड़ों पर भीषण भूस्खलन हुआ और एक बहुत बड़ा ग्लेशियर टूटकर नीचे गिर गया। इस मलबे और बर्फ ने भोटेकोशी नदी के रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया और देखते ही देखते पहाड़ों के पीछे लाखों गैलन पानी जमा हो गया और एक अस्थाई कृत्रिम झील बन गई। अब आप ही सोचिए, पहाड़ों के बीच पानी का दबाव भला कब तक रुकता? जैसे ही पानी का प्रेशर बढ़ा, वो प्राकृतिक बांध एक झटके में फट गया। फिर क्या था, पानी किसी विशालकाय दीवार की तरह मलबे, मिट्टी और भारी पत्थरों को साथ लेकर इतनी तेज रफ्तार से नीचे बहा कि लोगों को भागने या संभलने का एक सेकंड का मौका तक नहीं मिला।
इस मलबे और पानी के थपेड़ों ने नेपाल के रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग और चितवन जैसे जिलों में वो तबाही मचाई है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। सरकारी रिपोर्ट बताती है कि इस बहाव में करीब 13 से ज्यादा बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स मलबे में तब्दील हो गए हैं, 19 से ज्यादा बड़े पक्के पुल बह गए हैं और लगभग 40 किलोमीटर लंबी सड़कें पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। कई छोटे-छोटे गांव और बाजार तो नक्शे से ही मिट गए हैं। इस वक्त ग्राउंड जीरो पर हालात बहुत संवेदनशील हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने भी इस पर गहरा दुख जताया है। नेपाल की सेना और पुलिस के दर्जन भर से ज्यादा हेलीकॉप्टर्स दुर्गम पहाड़ियों और तेज हवाओं के बीच रेस्क्यू ऑपरेशन चला रहे हैं। भारत सरकार ने भी बिना वक्त गंवाए तुरंत मदद का हाथ बढ़ाया है और दवाइयां, टेंट और राहत सामग्री नेपाल भेजी है। हम सब यही दुआ कर रहे हैं कि जो लोग भी वहां फंसे हैं, वो जल्द से जल्द सुरक्षित अपने वतन और अपने परिवारों के पास लौट आएं।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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