यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-153 है। गुरुवार, 26 फरवरी को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए महाराष्ट्र विधानसभा में प्रदूषण और कैंसर पर कौनसे चिंताजनक आंकड़े पेश किए गए और एनजीटी के फैसलों का डेटा क्या कहता है?
मुख्य सुर्खियां
बुधवार शाम अफ़गानिस्तान-ताजिकिस्तान बॉर्डर इलाके में 5.3 मैग्नीट्यूड का भूकंप दर्ज हुआ। इसके झटके अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में महसूस किए गए।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाघों का व्यवहार बदल रहा है — जंगलों के जीवन और इंसानी दबाव की वजह से वे अब पारंपरिक शिकार के बजाय लोगों के करीब आ रहे हैं और कई मामलों में इंसानों व मवेशियों को शिकार बना रहे हैं।
तमिलनाडु में एक निजी कॉलेज के कैंपस में मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के जन्मदिन समारोह के तहत जल्लीकट्टू का आयोजन किया गया। इस दौरान 16 साल के एक लड़के की मौत हो गई, जबकि 53 अन्य घायल हो गए।
नमामि गंगे प्रोग्राम के तहत 2017 से 2025 के बीच 169 वैज्ञानिक रिवर रैंचिंग कार्यक्रमों के जरिए लगभग 205.5 लाख स्वदेशी मछली के अंडे (सीड्स) गंगा और उसकी सहायक नदियों में छोड़े गए हैं। इसका उद्देश्य नदी की पारिस्थितिकी, स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण और मछलियों की तादाद बढ़ाना है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने युगपुरुष धाम से उज्जैन के सेवाधाम आश्रम में भेजे गए 17 बच्चों की मौत के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे पीआईएल के रूप में दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। मीडिया रिपोर्टस में इन मौत का कारण आश्रम में कुप्रबंधन, लापरवाही और चिकित्सा सुविधा का आभाव बताया गया है।
मध्य सरकार ने उज्जैन-इंदौर ग्रीनफील्ड कॉरिडोर रोड की उंचाई कम करने का फैसला लिया है। कल उज्जैन में किसानों ने इसके खिलाफ बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया था मगर भोपाल में सीएम मोहन यादव और किसानों के बीच बातचीत के बाद परियोजना की ऊंचाई और मुआवजे को लेकर सहमती बनी है।
विस्तृत चर्चा
वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट
महाराष्ट्र सरकार ने विधानसभा में स्वीकार किया है कि राज्य में बढ़ते प्रदूषण का सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है, विशेष रूप से कैंसर के मामलों में।
फेफड़ों की बीमारियों और कैंसर का संबंध: रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर के कुल मरीजों में से लगभग 57% मरीजों के फेफड़े बीमार पाए गए हैं। मुंबई में पिछले कुछ सालों में ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
दिल्ली की स्थिति: दिल्ली में पिछले 3 वर्षों में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में करीब 13% की वृद्धि दर्ज की गई है।
पीएम 2.5 (PM 2.5) का खतरा: हवा में मौजूद ये बारीक कण सुरक्षित सीमा से अधिक हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि सीधे फेफड़ों के अंदर पहुंच जाते हैं, जिससे लंबे समय में फेफड़े कमजोर हो जाते हैं और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। जहरीले कण शरीर की कोशिकाओं (cells) को भी प्रभावित करते हैं।
केंद्र सरकार का कहना है कि प्रदूषण और हर बीमारी के बीच सीधा संबंध साबित करना कठिन है, लेकिन बढ़ते आंकड़े चिंताजनक हैं।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की बदलती भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में एनजीटी को पर्यावरण की रक्षा और विकास व पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की मुख्य जिम्मेदारी सौंपी थी। हालांकि, हालिया डेटा एक अलग रुझान दिखा रहा है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 के बाद से एनजीटी के फैसलों में बदलाव आया है:
नागरिकों की अपीलें: नागरिकों द्वारा सरकारी क्लीयरेंस को चुनौती देने वाली 329 अपीलों में से केवल 65 (लगभग 20%) में राहत मिली। 2024-2025 में यह सफलता दर गिरकर मात्र 7% रह गई है।
कंपनियों की अपीलें: कंपनियों द्वारा क्लीयरेंस खारिज होने के खिलाफ की गई 160 अपीलों में से 126 (लगभग 80%) में एनजीटी ने उन्हें राहत दी। 2024-2025 में कंपनियों को 88% मामलों में राहत मिली।
ऐतिहासिक तुलना: 2016 से 2019 के बीच व्यवस्था अधिक संतुलित थी, जहां नागरिकों और कंपनियों दोनों को 18% से 31% के बीच राहत मिलती थी।
आम लोगों के लिए कानूनी चुनौतियां
स्रोतों के अनुसार, नागरिकों के लिए एनजीटी में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्रोजेक्ट्स को चुनौती देना अब और अधिक कठिन हो गया है।
समय सीमा की बाधा: किसी भी क्लीयरेंस को चुनौती देने के लिए 90 दिन की समय सीमा होती है। कंपनियों के पास कानूनी टीमें होती हैं जो हर चीज को ट्रैक करती हैं, लेकिन स्थानीय समुदायों को अक्सर देरी से पता चलता है, जिससे उनकी अपील तकनीकी आधार पर खारिज हो जाती है।
महंगी और लंबी प्रक्रिया: यदि एनजीटी से राहत नहीं मिलती, तो अगला विकल्प हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट होता है, जो बहुत लंबा और महँगा रास्ता है, जिसे ज्यादातर लोग नहीं अपना पाते।
विकास बनाम पर्यावरण: पोर्ट, माइनिंग और पावर प्लांट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के मामलों में नागरिकों को राहत मिलना मुश्किल हो रहा है। यह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि क्या सिस्टम अब पर्यावरण संरक्षण की तुलना में विकास (Development) को अधिक प्राथमिकता दे रहा है।
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